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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 78 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 78/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - चन्द्रमाः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - धनप्राप्ति प्रार्थना सूक्त
    27

    तेन॑ भू॒तेन॑ ह॒विषा॒यमा प्या॑यतां॒ पुनः॑। जा॒यां याम॑स्मा॒ आवा॑क्षु॒स्तां रसे॑ना॒भि व॑र्धताम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तेन॑ । भू॒तेन॑ । ह॒विषा॑ । अ॒यम् । आ । प्या॒य॒ता॒म् । पुन॑: । जा॒याम् । याम् । अ॒स्मै॒ । आ॒ऽअवा॑क्षु: । ताम् । रसे॑न । अ॒भि । व॒र्ध॒ता॒म् ॥७८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तेन भूतेन हविषायमा प्यायतां पुनः। जायां यामस्मा आवाक्षुस्तां रसेनाभि वर्धताम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तेन । भूतेन । हविषा । अयम् । आ । प्यायताम् । पुन: । जायाम् । याम् । अस्मै । आऽअवाक्षु: । ताम् । रसेन । अभि । वर्धताम् ॥७८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 78; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (अयम्) यह पुरुष (तेन) उस [प्रसिद्ध] (भूतेन) बहुत (हविषा) ग्राह्य अन्न के साथ (आ) सब ओर से (पुनः) अवश्य (प्यायताम्) बढ़ती करे। (अस्मै) इस पुरुष को (याम् जायाम्) जो वीरों को उत्पन्न करनेवाली पत्नी (आवाक्षुः) उन लोगों ने प्राप्त करायी है, (ताम् अभि) उस पत्नी के लिये वह [पति] (रसेन) अनुराग से वा पराक्रम से (वर्धताम्) बढ़े ॥१॥

    भावार्थ - अन्न आदि पदार्थों के उपार्जन का पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त करके माता, पिता, आचार्य आदि की अनुमति से स्त्री-पुरुष गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके पुरुषार्थपूर्वक उन्नति करें ॥१॥


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    Meaning -
    Let this couple grow to prosperity by the liberal havi they offer into the home yajna, let it grow continuously. Let the wife that the community has given to the husband, let her too grow by love in the family.


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