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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 78 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 78/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - चन्द्रमाः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - धनप्राप्ति प्रार्थना सूक्त
    83

    तेन॑ भू॒तेन॑ ह॒विषा॒यमा प्या॑यतां॒ पुनः॑। जा॒यां याम॑स्मा॒ आवा॑क्षु॒स्तां रसे॑ना॒भि व॑र्धताम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तेन॑ । भू॒तेन॑ । ह॒विषा॑ । अ॒यम् । आ । प्या॒य॒ता॒म् । पुन॑: । जा॒याम् । याम् । अ॒स्मै॒ । आ॒ऽअवा॑क्षु: । ताम् । रसे॑न । अ॒भि । व॒र्ध॒ता॒म् ॥७८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तेन भूतेन हविषायमा प्यायतां पुनः। जायां यामस्मा आवाक्षुस्तां रसेनाभि वर्धताम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तेन । भूतेन । हविषा । अयम् । आ । प्यायताम् । पुन: । जायाम् । याम् । अस्मै । आऽअवाक्षु: । ताम् । रसेन । अभि । वर्धताम् ॥७८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 78; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    गृहस्थ के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (अयम्) यह पुरुष (तेन) उस [प्रसिद्ध] (भूतेन) बहुत (हविषा) ग्राह्य अन्न के साथ (आ) सब ओर से (पुनः) अवश्य (प्यायताम्) बढ़ती करे। (अस्मै) इस पुरुष को (याम् जायाम्) जो वीरों को उत्पन्न करनेवाली पत्नी (आवाक्षुः) उन लोगों ने प्राप्त करायी है, (ताम् अभि) उस पत्नी के लिये वह [पति] (रसेन) अनुराग से वा पराक्रम से (वर्धताम्) बढ़े ॥१॥

    भावार्थ

    अन्न आदि पदार्थों के उपार्जन का पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त करके माता, पिता, आचार्य आदि की अनुमति से स्त्री-पुरुष गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके पुरुषार्थपूर्वक उन्नति करें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(तेन) प्रसिद्धेन (भूतेन) प्रभूतेन (हविषा) ग्राह्येण, अन्नेन (अयम्) वरः। उपलक्षणेन कन्यापि (आ) समन्तात् (प्यायताम्) वर्धताम् (पुनः) अवधारणे (जायाम्) अ० ३।४।३। जनयति वीरान् तां वीरजननीं पत्नीम् (याम्) (अस्मै) वराय (आवाक्षुः) वह प्रापणे लुङि रूपम्। प्रापितवन्तः, मातापित्राचार्यादयः (ताम्) पत्नीम् (रसेन) अनुरागेण। वीरभावेन (अभि) अभिरभागे। पा० १।४।९१। इति इत्थं भूताख्याने कर्मप्रवचनीयत्वम्। प्रति (वर्धताम्) प्रवृद्धो भवतु ॥

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    विषय

    हविषा रसेन

    पदार्थ

    १. (तेन) = उस (भूतेन) = [भू प्रासी] भूति व समृद्धि की कारणभूत (हविषा) = हूयमान यजिय पदार्थों से (अयम्) = यह (पुन:) = फिर (आप्यायताम्) = वृद्धि को प्राप्त करे। गृहपति यज्ञशील हो, यज्ञशेष का ही सेवन करनेवाला हो। इस यज्ञशेष का सेवन अमृत का सेवन है। इससे उसका जीवन बड़ा नीरोग बना रहेगा। २. (याम्) = जिस (जायाम्) = पत्नी को (अस्मै) = इसके लिए (आवाक्षः) = कन्या के माता-पिता आदि प्राप्त कराते हैं, (ताम्) = उस पत्नी को (रसेन अभिवर्धताम्) = प्रेम के द्वारा यह बढ़ानेवाला हो। पत्नी को पति का उचित प्रेम प्रास होता है तो वह सब प्रकार से बढ़ती ही है।

    भावार्थ

    एक उत्तम गृहपति यज्ञ के द्वारा यज्ञशेष का सेवन करता हुआ दृाङ्ग बने। पत्नी को यह उचित प्रेम प्राप्त कराता हुआ बढ़ानेवाला हो।

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    भाषार्थ

    (तेन) उस (भूतेन) प्रभूत (हविषा) हवि:रुप अन्न द्वारा (अयम्) यह पति (पुनः) फिर-फिर सेवन से (आप्यायताम्) वृद्धि प्राप्त करे, बढ़े। (याम् जायाम्) जिस पत्नी को (अस्मै) इस पति के लिये (आवाक्षुः) माता-पिता ने प्राप्त कराया है (ताम्) उसे (रसेन) दुग्ध, दधि, घृत तथा नानाविध रसों द्वारा (अभिवर्धताम्) पति बढ़ाए।

    टिप्पणी

    [भोज्य अन्न,को हविः कहा है। इसे जाठराग्नि को यज्ञाग्नि समझकर उस में आहुतिरूप में आहुत करना चाहिये। और एक बार प्रभूत अन्न न खा कर बार-बार इसका सेवन करना चाहिये। ऐसे सेवक को 'आत्मयाजी' कहते हैं। पत्नी ने सन्तानोत्पादन करना है, अतः उस का पोषण रसदार पौष्टिक भोज्यों द्वारा करते रहना पति का कर्तव्य है। अभिवर्धताम्= अभिवर्धयतु, णिलोपः (सायण)]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Wedded Couple

    Meaning

    Let this couple grow to prosperity by the liberal havi they offer into the home yajna, let it grow continuously. Let the wife that the community has given to the husband, let her too grow by love in the family.

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    Subject

    Candramih

    Translation

    With that sumptuous sacrificial offering, may this man thrive again. May he enrich with happiness the bride, whom they have brought for him

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    Translation

    Let this husband be strong with the cooked food and let him with juice of fruit make strong wife who is given in-marriage to him by the parents of both parties.

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    Translation

    Let this husband be endowed with sufficient food again and again. Let him strengthen the woman with whom his parents have married him, with curd, honey and butter.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(तेन) प्रसिद्धेन (भूतेन) प्रभूतेन (हविषा) ग्राह्येण, अन्नेन (अयम्) वरः। उपलक्षणेन कन्यापि (आ) समन्तात् (प्यायताम्) वर्धताम् (पुनः) अवधारणे (जायाम्) अ० ३।४।३। जनयति वीरान् तां वीरजननीं पत्नीम् (याम्) (अस्मै) वराय (आवाक्षुः) वह प्रापणे लुङि रूपम्। प्रापितवन्तः, मातापित्राचार्यादयः (ताम्) पत्नीम् (रसेन) अनुरागेण। वीरभावेन (अभि) अभिरभागे। पा० १।४।९१। इति इत्थं भूताख्याने कर्मप्रवचनीयत्वम्। प्रति (वर्धताम्) प्रवृद्धो भवतु ॥

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