अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 89 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 89/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - सोमः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - प्रीतिसंजनन सूक्त

    इ॒दं यत्प्रे॒ण्यः शिरो॑ द॒त्तं सोमे॑न॒ वृष्ण्य॑म्। ततः॒ परि॒ प्रजा॑तेन॒ हार्दिं॑ ते शोचयामसि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒दम् । यत् ।प्रे॒ण्य: । शिर॑: । द॒त्तम् । सोम॑न । वृष्ण्य॑म् । तत॑: । परि॑ । प्रऽजा॑तेन । हार्दि॑म् । ते॒ । शो॒च॒या॒म॒सि॒ ॥८९.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इदं यत्प्रेण्यः शिरो दत्तं सोमेन वृष्ण्यम्। ततः परि प्रजातेन हार्दिं ते शोचयामसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इदम् । यत् ।प्रेण्य: । शिर: । दत्तम् । सोमन । वृष्ण्यम् । तत: । परि । प्रऽजातेन । हार्दिम् । ते । शोचयामसि ॥८९.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 89; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (प्रेण्यः=प्रेण्याः) तृप्त करनेवाली ओषधि का (यत्) जो (इदम्) यह (शिरः) मस्तकबल और (सोमेन) सब के उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर करके (दत्तम्) दिया हुआ (वृष्ण्यम्) जो वीरत्व है। (ततः) उस से (परि) सब प्रकार (प्रजातेन) उत्पन्न हुए [साहस] से (ते) तेरी (हार्दिम्) हार्दिक शक्ति को (शोचयामसि) हम शोक में डालते हैं ॥१॥

    भावार्थ -
    मनुष्य सोमलता आदि उत्तम ओषधियों के सेवन से और परमेश्वर के दिये बल से शत्रुओं को पीड़ित करें ॥१॥

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