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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 90 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 90/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - रुद्रः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - इषुनिष्कासन सूक्त
    77

    यां ते॑ रु॒द्र इषु॒मास्य॒दङ्गे॑भ्यो॒ हृद॑याय च। इ॒दं ताम॒द्य त्वद्व॒यं विषू॑चीं॒ वि वृ॑हामसि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    याम् । ते॒ । रु॒द्र: । इषु॑म् । आस्य॑त् । अङ्गे॑भ्य: । हृद॑याय: । च॒ । इ॒दम् । ताम् । अ॒द्य । त्वत् । व॒यम् । विषू॑चीम् । वि । वृ॒हा॒म॒सि॒ ॥९०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यां ते रुद्र इषुमास्यदङ्गेभ्यो हृदयाय च। इदं तामद्य त्वद्वयं विषूचीं वि वृहामसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    याम् । ते । रुद्र: । इषुम् । आस्यत् । अङ्गेभ्य: । हृदयाय: । च । इदम् । ताम् । अद्य । त्वत् । वयम् । विषूचीम् । वि । वृहामसि ॥९०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 90; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    कर्म के फल का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे मनुष्य !] (रुद्रः) पापियों के रुलानेवाले परमेश्वर ने (ते) तेरे (अङ्गेभ्यः) अङ्गों [शरीर] को पीड़ा देने (च) और (हृदयाय) हृदय [आत्मा] दुखाने के लिये (याम्) जिस (इषुम्) बरछी [पीड़ा] को (आस्यत्) छोड़ा है। (इदम्) सो (अद्य) अब (विषूचीम्) नाना गतिवाली (ताम्) उस [बरछी] को (वयम्) हम लोग (त्वत्) तुझ से (वि वृहामसि=०−मः) उखाड़ते हैं ॥१॥

    भावार्थ

    परमेश्वर अपनी न्यायव्यवस्था से पापियों को शारीरिक और आत्मिक दुःख देता और सुकर्म करने पर उन्हें उस क्लेश से छुड़ाकर आनन्दित करता है ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(याम्) (ते) तव (रुद्रः) अ० १।१९।३। पापिनां रोदयिता (इषुम्) अ० १।१३।४। शक्तिनामायुधम्। पीडाम् (आस्यत्) असु क्षेपणे−लङ्। अक्षिपत् (अङ्गेभ्यः) क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः। पा० २।३।१४। इत्यप्रयुज्यमानस्य धातोः कर्मणि चतुर्थी। अङ्गानि पीडयितुम्। (हृदयाय) हृदयं दुःखयितुम् (च) (इदम्) तत्प्रतीकारार्थम् (ताम्) इषुम् (अद्य) इदानीम् (त्वत्) त्वत्तः (वयम्) सुकर्मिणः (विषूचीम्) अ० १।१९।१। विषु+अञ्चु गतिपूजनयोः−क्विन्। ङीप्। नानागतिम् (वि वृहामसि) वृहू उद्यमने। विवृहामः। उत्क्षिपामः ॥

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    विषय

    इषु निष्कासन

    पदार्थ

    १. (रुद्रः) = [रोदयति] प्रबल आक्रमण के द्वारा रुलानेवाले शत्रु-सेनानी ने (याम् इषुम्) = जिस बाण को (ते) = तेरे (अंगेभ्य:) = अङ्गों के लिए-अंगों की पीड़ा के लिए हृदयाय (च) = और हृदय की पीड़ा के लिए (आस्यत्) = फेंका है, (अद्य) = आज इदम् उसके प्रतीकार के लिए (वयम्) = हम (ताम्) = उस इषु को (त्वत् विषूचीम्) = तुझसे विरुद्ध दिशा में-तुझसे दूर (विवृहामसि) = उत्क्षिप्त करते हैं|

    भावार्थ

    युद्ध में अस्त्र-शस्त्रों से घायल शरीर को स्वस्थ करने के लिए शरीर में रह गये बाण आदि को निकाल फेंकने की व्यवस्था अत्यन्त आवश्यक है।

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    भाषार्थ

    [हे वाण विद्ध !] (ते) तेरे (अङ्गेभ्यः) अङ्गों के लिये (च) और (हृदयाय) हृदय के लिये, (रुद्रः) रुद्र ने (याम्, इषुम्) जिस वाण को (आस्यत्) फैंका है, (ताम्) उसे (इदम) यह (अद्य) आज या इस समय (त्वत्) तुझ से (विषूचीम्) विमुख करके (वयम् विवृहामसि) हम निकाल देते हैं।

    टिप्पणी

    [रुद्र है परमेश्वर जोकि कर्मानुसार रुलाता है, "रोदयतेर्वा" (निरुक्त १०॥१॥६) तथा (यजु० अध्याय १६)। रोगादि रुद्र के इषु अर्थात् वाण हैं]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Extraction of the ‘arrow’

    Meaning

    The arrow which Rudra, lord of justice, punishment and remorse, has shot into your heart and all other body parts, we now extract from you out of the heart and the entire body.

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    Subject

    Rudrah

    Translation

    The arrow, which the terrible punisher has shot at your limbs and at your heart, that we now draw backward from you.

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    Translation

    O man! the shaft (in the form of disease) which Rudra, the disturbed entropy of the universe shoots against your body parts and heart, here do we draw away from you today and turn it from here to every side.

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    Translation

    O man, whatever pain, God, the Chastiser of the sinners creates in thy organs or the heart, the same do we draw from thee today, and turn it hence to every side!

    Footnote

    We: Noble persons. By doing good deeds and listening to the instructions of virtuous, learned persons can a man be relieved of physical and mental anguish, which he falls a prey to, through his misdeeds. A painful disease has been spoken of as a shaft.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(याम्) (ते) तव (रुद्रः) अ० १।१९।३। पापिनां रोदयिता (इषुम्) अ० १।१३।४। शक्तिनामायुधम्। पीडाम् (आस्यत्) असु क्षेपणे−लङ्। अक्षिपत् (अङ्गेभ्यः) क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः। पा० २।३।१४। इत्यप्रयुज्यमानस्य धातोः कर्मणि चतुर्थी। अङ्गानि पीडयितुम्। (हृदयाय) हृदयं दुःखयितुम् (च) (इदम्) तत्प्रतीकारार्थम् (ताम्) इषुम् (अद्य) इदानीम् (त्वत्) त्वत्तः (वयम्) सुकर्मिणः (विषूचीम्) अ० १।१९।१। विषु+अञ्चु गतिपूजनयोः−क्विन्। ङीप्। नानागतिम् (वि वृहामसि) वृहू उद्यमने। विवृहामः। उत्क्षिपामः ॥

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