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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 1 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 1/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - आत्मा छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - आत्मा सूक्त
    12

    धी॒ती वा॒ ये अन॑यन्वा॒चो अग्रं॒ मन॑सा वा॒ येऽव॑दन्नृ॒तानि॑। तृ॒तीये॑न॒ ब्रह्म॑णा वावृधा॒नास्तु॒रीये॑णामन्वत॒ नाम॑ धे॒नोः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    धी॒ती । वा॒ । ये । अन॑यन् । वा॒च: । अग्र॑म् । मन॑सा । वा॒ । ये । अव॑दन् । ऋ॒तानि॑ । तृ॒तीये॑न । ब्रह्म॑णा । व॒वृ॒धा॒ना: । तु॒रीये॑ण । अ॒म॒न्व॒त॒ । नाम॑ । धे॒नो: ॥.१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    धीती वा ये अनयन्वाचो अग्रं मनसा वा येऽवदन्नृतानि। तृतीयेन ब्रह्मणा वावृधानास्तुरीयेणामन्वत नाम धेनोः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    धीती । वा । ये । अनयन् । वाच: । अग्रम् । मनसा । वा । ये । अवदन् । ऋतानि । तृतीयेन । ब्रह्मणा । ववृधाना: । तुरीयेण । अमन्वत । नाम । धेनो: ॥.१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (ये) जिन लोगों ने [एक] (धीती) अपने कर्म से (वाचः) वेदवाणी के (अग्रम्) श्रेष्ठपन को (वा) निश्चय करके (अनयन्) पाया है, (वा) और (ये) जिन्होंने [दूसरे] (मनसा) विज्ञान से (ऋतानि) सत्य वचन (अवदन्) बोले हैं और जो (तृतीयेन) तीसरे [हमारे कर्म और विज्ञान से परे] (ब्रह्मणा) प्रवृद्ध ब्रह्म [परमात्मा] के साथ (वावृधानाः) वृद्धि करते रहे हैं, उन लोगों ने (तुरीयेण) चौथे [कर्म विज्ञान और ब्रह्म से अथवा धर्म, अर्थ और काम से प्राप्त मोक्ष पद] के साथ (धेनोः) तृप्त करनेवाली शक्ति, परमात्मा के (नाम) नाम अर्थात् तत्त्व को (अमन्वत) जाना है ॥१॥

    भावार्थ - जो योगी जन वेद के तत्त्व को जानकर कर्म करते, और विज्ञानपूर्वक सत्य का उपदेश करके परमेश्वर की अपार महिमा को खोजते आगे बढ़ते जाते हैं, वे ही मोक्ष पद पाकर परमात्मा की आज्ञा में विचरते हुए स्वतन्त्रता से आनन्द भोगते हैं ॥१॥


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    Meaning -
    Those who reach to the origin and the original of the Word or highest language through meditation, and who speak but only and exclusively of the law and spirit of Reality, grow on from the objective and the psychic phases of reality and consciousness to the third phase of consciousness and reality, and by the grace of the third phase, the Spirit Divine and the Vedic vision, reach to the fourth, absolute state of Turiya, and through the Turiya attain to the origin and the original of the Word, Brahma, where the Name, Aum, and the named, Akshara Brahma, are one and the same. (For further understanding of this mantra reference may be made to Atharva-vediya Mandukyo- panishad.)


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