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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 101 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 101/ मन्त्र 1
    ऋषिः - यम देवता - दुःष्वप्ननाशनम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - दुःस्वप्न नाशन
    98

    यत्स्वप्ने॒ अन्न॑म॒श्नामि॒ न प्रा॒तर॑धिग॒म्यते॑। सर्वं॒ तद॑स्तु मे शि॒वं न॒हि तद्दृ॒ष्यते॒ दिवा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । स्वप्ने॑ । अन्न॑म् । अ॒श्नामि॑ । न । प्रा॒त: । अ॒ध‍ि॒ऽग॒म्यते॑ । सर्व॑म् । तत् । अ॒स्तु॒ । मे॒ । शि॒वम् । न॒हि । तत् । दृ॒श्यते॑ । दिवा॑ ॥१०६.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यत्स्वप्ने अन्नमश्नामि न प्रातरधिगम्यते। सर्वं तदस्तु मे शिवं नहि तद्दृष्यते दिवा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । स्वप्ने । अन्नम् । अश्नामि । न । प्रात: । अध‍िऽगम्यते । सर्वम् । तत् । अस्तु । मे । शिवम् । नहि । तत् । दृश्यते । दिवा ॥१०६.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 101; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    अविद्या के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (यत्) जो कुछ (अन्नम्) अन्न (स्वप्ने) स्वप्न में (अश्नामि) मैं खाता हूँ, [वह] (प्रातः) प्रातःकाल (न) नहीं (अधिगम्यते) मिलता है। (तत्) वह (सर्वम्) सब (मे) मेरे लिये (शिवम्) कल्याणकारी (अस्तु) होवे, (तत्) वह (दिवा) दिन में (नहि) नहीं (दृश्यते) दीखता है ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे इन्द्रियों की चंचलता से स्वप्न में खाया अन्न शरीरपोषक नहीं होता, वैसे ही अविद्याजन्य सुख इष्टसाधक नहीं होता ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(यत्) यत्किञ्चित् (स्वप्ने) निद्रायाम् (अन्नम्) भोजनम् (अश्नामि) अश भोजने। खादामि (न) निषेधे (प्रातः) प्रभाते (अधिगम्यते) लभ्यते (सर्वम्) (तत्) स्वप्नफलम् (अस्तु) (मे) मह्यम् (शिवम्) मङ्गलकरम् (नहि) नैव (तत्) अन्नम् (दृश्यते) निरीक्ष्यते (दिवा) दिने ॥

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    विषय

    स्वप्न की बात पर विश्वास न करना

    पदार्थ

    १. (यत्) = जो (स्वप्ने) = स्वप्न में (अन्नम् अश्नामि) = अन्न खाता हूँ. प्(रात: न अधिगम्यते) = वह प्रातः जागने पर उपलब्ध नहीं होता। (सर्व तत्) = वह सब स्वप्नभुक्त अन्न (मे) = मेरे लिए (शिवं अस्तु) = कल्याणकर हो, (तद् दिवा नहि दृश्यते) = वह दिन में नहीं दीखता है, अर्थात् 'स्वप्न की बातें सत्य होती हों, ऐसा नहीं है, इससे स्वप्न के कारण घबराना नहीं चाहिए।

    भावार्थ

    स्वप्न देखने पर हम शोक न करें। प्रत्युत अपने चित्त को दृढ़ करके स्वप्न की बात को 'असत्' समझें।

    स्वप्न आदि की बातों से इतना प्रभावित न होनेवाला यह अपने को हिसित होने से बचाता हुआ 'प्रजापति' बनता हैं। अगले सूक्त का यही ऋषि है -

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    भाषार्थ

    (स्वप्ने) स्वप्न में (यत्, अन्नम्, अश्नामि) जो अन्न मैं खाता हूं, और (प्रातः, न अधिगम्यते) प्रातःकाल वह नहीं अधिगत होता, नहीं दीखता [सायण], (तत् सर्वम्) वह सब (मे, शिवम् अस्तु) मेरे लिये मङ्गलकारी हो (हि) यतः (तत्) वह (दिवा) दिन के समय (न दृश्यते) नहीं दीखता।

    टिप्पणी

    [सायण ने "अन्नम्" के सम्बन्ध में कहा कि "अन्नभोजनसदृशम्, अखाद्यभक्षणादिकम", अर्थात् अन्नभोजन के सदृश अखाद्यभक्षण आदि", मांस-शराब आदि। ऐसा स्वप्न अमंगलकारी है, अतः मङ्गल की प्रार्थना की गई है]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Freedom from Illusion

    Meaning

    The delicacies of food I enjoy in dreams is nothing there in the morning, nor is all that seen in the day. May all this experience of illusion and reality, this knowledge, be good and auspicious for me.

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    Subject

    Against evil dreams

    Translation

    What food I eat in my dream, that is not obtained in the morning. May all that be propitious to me; that is not perceived by day.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.106.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    Whatever food I eat in dream or whatever objects I hunt through my organs, is not perceived in rising from dream. Let all this do not agonize me, as that is not perceived in the day or waking phase.

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    Translation

    The food that I eat in a dream is not perceived at early morn. May all that I see or do in a dream be blest to me because it is not seen by day.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(यत्) यत्किञ्चित् (स्वप्ने) निद्रायाम् (अन्नम्) भोजनम् (अश्नामि) अश भोजने। खादामि (न) निषेधे (प्रातः) प्रभाते (अधिगम्यते) लभ्यते (सर्वम्) (तत्) स्वप्नफलम् (अस्तु) (मे) मह्यम् (शिवम्) मङ्गलकरम् (नहि) नैव (तत्) अन्नम् (दृश्यते) निरीक्ष्यते (दिवा) दिने ॥

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