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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 118 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 118/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वाङ्गिराः देवता - चन्द्रमाः, वरुणः, देवगणः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - वर्मधारण सूक्त
    97

    मर्मा॑णि ते॒ वर्म॑णा छादयामि॒ सोम॑स्त्वा॒ राजा॒मृते॒नानु॑ वस्ताम्। उ॒रोर्वरी॑यो॒ वरु॑णस्ते कृणोतु॒ जय॑न्तं॒ त्वानु॑ दे॒वा म॑दन्तु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मर्मा॑णि । ते॒ । वर्म॑णा । छा॒द॒या॒मि॒ । सोम॑: । त्वा॒ । राजा॑ । अ॒मृते॑न । अनु॑ । व॒स्ता॒म् । उ॒रो: । वरी॑य: । वरु॑ण: । ते॒ । कृ॒णो॒तु॒ । जय॑न्तम् । त्वा॒ । अनु॑ । दे॒वा: । म॒द॒न्तु॒ ॥१२३.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम्। उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मर्माणि । ते । वर्मणा । छादयामि । सोम: । त्वा । राजा । अमृतेन । अनु । वस्ताम् । उरो: । वरीय: । वरुण: । ते । कृणोतु । जयन्तम् । त्वा । अनु । देवा: । मदन्तु ॥१२३.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 118; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे शूरवीर !] (ते) तेरे (मर्माणि) मर्मों को (वर्मणा) कवच से (छादयामि) मैं [सेनापति] ढाँकता हूँ, (सोमः) ऐश्वर्यवान् (राजा) राजा [कोशाध्यक्ष] (त्वा) तुझको (अमृतेन) अमृत [मृत्युनिवारक, शस्त्र, अस्त्र, वस्त्र, अन्न, औषध आदि] से (अनु) निरन्तर (वस्ताम्) ढके। (वरुणः) श्रेष्ठ पुरुष [चतुर मार्गदर्शक] (ते) तेरे लिये (उरोः) चौड़े से (वरीयः) अधिक चौड़ा [स्थान] (कृणोतु) करे, (जयन्तम्) विजयी (त्वा अनु) तेरे पीछे (देवाः) विजय चाहनेवाले पुरुष (मदन्तु) आनन्द पावें ॥१॥

    भावार्थ

    सर्वाधीश मुख्य सेनापति अधिकारियों द्वारा योद्धाओं को समस्त आवश्यक सामग्री देकर उत्साहित करे, जिससे सब वीर आनन्दध्वनि करते हुए विजयी होवें ॥१॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-म० ६।७५।१८; यजुः०−१७।४९; साम० उ० ९।३।८ ॥ इति दशमोऽनुवाकः ॥ इति सप्तदशः प्रपाठकः ॥ इति सप्तमं काण्डम् ॥ इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिमश्रीसयाजीरावगायकवाड़ाधिष्ठितबड़ोदेपुरीगतश्रावणमासपरीक्षायाम् ऋक्सामाथर्ववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेन श्रीपण्डितक्षेमकरणदासत्रिवेदिना कृते अथर्ववेदभाष्ये सप्तमं काण्डं समाप्तम् ॥

    टिप्पणी

    १−(मर्माणि) सर्वधातुभ्यो मनिन्। उ० ४।१४५। मृङ् प्राणत्यागे-मनिन्। शरीरसन्धिस्थानानि (ते) तव (वर्मणा) कवचेन (छादयामि) संवृणोमि (सोमः) ऐश्वर्यवान् (राजा) शासकः कोशाध्यक्षः (अमृतेन) मृत्युनिवारकेण शस्त्रास्त्रवस्त्रान्नौषधादिना वस्तुना (अनु) निरन्तरम् (वस्ताम्) आच्छादयतु (उरोः) उरुणः। विस्तृतात् (वरीयः) उरुतरं (स्थानम्) (वरुणः) श्रेष्ठो मार्गदर्शकः (कृणोतु) करोतु (जयन्तम्) अ० ६।९७।३। विजयिनम् (त्वा) (अनु) अनुलक्ष्य (देवाः) विजिगीषवो वीराः (मदन्तु) हृष्यन्तु ॥

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    विषय

    वर्म, सोम, वरुण

    पदार्थ

    १. जिन स्थानों पर बिद्ध होकर मनुष्य शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होता है, उन्हें मर्म कहते हैं। (ते मर्माणि) = तेरे मर्मस्थलों को (वर्मणा छादयामि) = कवच के द्वारा आच्छादित करता हूँ। कवच से आछादित मर्मस्थल शत्रुओं से शीर्ण नहीं किये जाते। अब (राजा) = जीवन को दीप्त करनेवाला (सोम:) = सोम [वीर्य] (त्वा) = तुझे (अमृतेन अनुवस्ताम्) = नीरोगता से आच्छादित करे, अर्थात् सोम का रक्षण तुझे नीरोग बनाए। २. (वरुण:) = द्वेष निवारण की देवता (ते) = तेरे लिए (उरो: वरीयः) = विशाल से भी विशालतर सुख (कृणोतु) = करे । (जयन्तम्) = राग-द्वेषादि सब शत्रुओं को पराजित करते हुए (स्वा) = तुझे (देवा:) = सब देव, सब दिव्यभाव, (अनुमदन्त) = अनुकूलता से हर्षित करनेवाले हों।

    भावार्थ

    ज्ञानरूप कवच हमारे मर्मों का रक्षण करे। सुरक्षित सोम हमें नीरोगता प्रदान करे और निषता की देवता हमें आनन्दित करनेवाली हो।

     

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    भाषार्थ

    हे सम्राट् ! (ते) तेरे (मर्माणि) मर्मस्थानों को (वर्म॑णा) कवच द्वारा (छादयामि) मैं आच्छादित करता हूं, (अनु) तत्पश्चात् (राजा) अस्त्र-शस्त्रों से प्रदीप्त (सोमः) सेनानायक (अमृतेन) जो मारे नहीं जा सकते अर्थात् अति शूरवीर सैनिक वर्ग द्वारा (त्वा) तुझे (वस्ताम्) आच्छादित करे। (ते) तेरे सत्कार के लिये (वरुणः) राष्ट्र का राजा (उरोः वरीय) विस्तृत से भी विस्तृत अर्थात विशाल स्थान (कृणोतु) तय्यार करे, (जयन्तम्) और विजय प्राप्त करते हुए (त्वा) तुझे (अनु) लक्षित करके (देवाः) साम्राज्य के दिव्य सज्जन तथा अधिकारी (मदन्तु) प्रसन्न हों।

    टिप्पणी

    ["वरुणः" पद द्वारा साम्राज्य के अङ्गभूत राष्ट्र का राजा अभिप्रेत होता है। "इन्द्रश्च सम्राड्वरुणश्च राजा (यजु० ८।३७)। सम्राट् है संयुक्त राष्ट्रों का अधिपति, जिसके अङ्ग हैं राष्ट्राधिपति वरुण नामक राजा। मर्मों का आच्छादन करने वाला है "बृहस्पतिः" साम्राज्य की बृहती सेना का अधिपति। सोम है सेनानायक जो कि सेना के आगे होकर चलता है, (देखो यजु० १७।४०)। साम्राज्य के जिस राष्ट्र पर शत्रु ने आक्रमण किया है, उस शत्रु के पराजित हो जाने पर उस राष्ट्र का अधिपति वरुण राजा सम्राट् के सत्कार के लिये विशाल स्थान का प्रबन्ध करता है। 'अमृतेनानु वस्ताम्' द्वारा यह दर्शाया है कि सेनानायक ही सम्राट की रक्षा के लिये व्यूह को रचना करता है, जिस व्यूह में सम्राट् आच्छादित रहता है]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    On Way to Victory

    Meaning

    Noble warrior, I cover your vital limbs with an armour. May Soma, lord of health and well being, wrap you round with immortal cover against death. May Varuna, lord supreme, vest you with honour greater than greatness itself. May all noble powers of the world bless you and celebrate you with joy, victorious one.

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    Subject

    Somah, Varunah and Devah

    Translation

    I cover your vital parts with armour; may the royal Lord of bliss (Somaraja) invest you with ambrosia; may the venerable Lord (Indra) give you what is more than ample; may the divinities rejoice and revel your victory. (Also Rg. VI. 75.18)

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.123.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    O myself! or the ruler! I cover all your vital parts with coat of mail or armor (of Divine effulgence), may the Imperial Ruler Soma (the All creating God) sprinkle you with the nectar (of His grace) and may Varuno, the only object of our choice, grant the great falicity and excessive delight and may all the Divine attributes encourage you whilst you are engaged in gaining victory (over your evil propensities).

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    Translation

    O valiant warrior, thy vital parts I cover with armor. May this calm, considerate king protect thee with invincible strength. May the Exalted God give thee a very long life. May the learned enjoy thy triumph over the wicked.

    Footnote

    I refers to the Commander-in-chief.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(मर्माणि) सर्वधातुभ्यो मनिन्। उ० ४।१४५। मृङ् प्राणत्यागे-मनिन्। शरीरसन्धिस्थानानि (ते) तव (वर्मणा) कवचेन (छादयामि) संवृणोमि (सोमः) ऐश्वर्यवान् (राजा) शासकः कोशाध्यक्षः (अमृतेन) मृत्युनिवारकेण शस्त्रास्त्रवस्त्रान्नौषधादिना वस्तुना (अनु) निरन्तरम् (वस्ताम्) आच्छादयतु (उरोः) उरुणः। विस्तृतात् (वरीयः) उरुतरं (स्थानम्) (वरुणः) श्रेष्ठो मार्गदर्शकः (कृणोतु) करोतु (जयन्तम्) अ० ६।९७।३। विजयिनम् (त्वा) (अनु) अनुलक्ष्य (देवाः) विजिगीषवो वीराः (मदन्तु) हृष्यन्तु ॥

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