अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 15 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 15/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - भृगुः देवता - सविता छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सविता सूक्त
    पदार्थ -

    (सवितः) हे सब ऐश्वर्यवाले आचार्य ! (ताम्) उस (सत्यसवाम्) सत्य ऐश्वर्यवाली, (सुचित्राम्) बड़ी विचित्र, (विश्ववाराम्) सब से स्वीकार करने योग्य (सुमतिम्) सुमति [यथावत् विषयवाली बुद्धि] को (अहम्) मैं (आ) आदरपूर्वक (वृणे) माँगता हूँ, (याम्) जिस (प्रपीनाम्) बहुत बढ़ी हुई, (सहस्रधाराम्) सहस्रों विषयों की धारण करनेवाली [सुमति] को (अस्य) इस [जगत्] के (भगाय) ऐश्वर्य के लिये (कण्वः) मेधावी, (महिषः) पूजनीय परमात्मा ने (अदुहत्) परिपूर्ण किया है ॥१॥

    भावार्थ -

    तपस्वी ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी योगी, आप्त विद्वान् पुरुषों से संसार के हित के लिये परमेश्वरदत्त वेद द्वारा अपनी बुद्धि को बढ़ाते रहें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद में है-अ० १७।७४ ॥

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