अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 33 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 33/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - मरुद्गणः, पूषा, बृहस्पतिः छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - दीर्घायु सूक्त
    पदार्थ -

    (मरुतः) वायु के झोंके (मा) मुझे (सम्) भले प्रकार (सिञ्चन्तु) सींचे, (पूषा) पृथिवी (सम्) भले प्रकार और (बृहस्पतिः) बड़े-बड़ों का रक्षक सूर्य [वा मेघ] (सम्) भले प्रकार [सींचे]। (अयम्) यह (अग्निः) अग्नि [शारीरिक अग्नि वा बल] (मा) मुझको (प्रजया) सन्तान भृत्य आदि (च) और (धनेन) धन से (सम्) भले प्रकार (सिञ्चतु) सींचे (च) और (मा) मेरी (आयुः) आयु को (दीर्घम्) दीर्घ (कृणोतु) करे ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य वायु आदि सब पदार्थों से उपकार लेकर शारीरिक आत्मिक बल, सन्तान भृत्य आदि बढ़ा कर यश प्राप्त करें ॥१॥

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