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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 39 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 39/ मन्त्र 1
    ऋषिः - प्रस्कण्वः देवता - सुपर्णः, वृषभः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - आपः सूक्त
    76

    दि॒व्यं सु॑प॒र्णं प॑य॒सं बृ॒हन्त॑म॒पां गर्भं॑ वृष॒भमोष॑धीनाम्। अ॑भीप॒तो वृ॒ष्ट्या त॒र्पय॑न्त॒मा नो॑ गो॒ष्ठे र॑यि॒ष्ठां स्था॑पयाति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दि॒व्यम् । सु॒ऽप॒र्णम् । प॒य॒सम् । बृ॒हन्त॑म् । अ॒पाम् । गर्भ॑म् । वृ॒ष॒भम् । ओष॑धीनाम् । अ॒भी॒प॒त: । वृ॒ष्ट्या । त॒र्पय॑न्तम् । आ । न॒: । गो॒ऽस्थे । र॒यि॒ऽस्थाम् । स्था॒प॒य॒ति॒ ॥४०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दिव्यं सुपर्णं पयसं बृहन्तमपां गर्भं वृषभमोषधीनाम्। अभीपतो वृष्ट्या तर्पयन्तमा नो गोष्ठे रयिष्ठां स्थापयाति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    दिव्यम् । सुऽपर्णम् । पयसम् । बृहन्तम् । अपाम् । गर्भम् । वृषभम् । ओषधीनाम् । अभीपत: । वृष्ट्या । तर्पयन्तम् । आ । न: । गोऽस्थे । रयिऽस्थाम् । स्थापयति ॥४०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 39; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    विद्वानों के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (दिव्यम्) दिव्य गुणवाले, (पयसम्) गतिवाले, (बृहन्तम्) विशाल, (अपाम्) अन्तरिक्ष के (गर्भम्) गर्भसमान बीच में रहनेवाले, (ओषधीनाम्) अन्न आदि ओषधियों के (वृषभम्) बरसानेवाले, (अभीपतः) सब ओर जलवाले मेघ से (वृष्ट्या) वृष्टिद्वारा (तर्पयन्तम्) तृप्त करनेवाले, (रयिष्ठाम्) धन के बीच ठहरनेवाले, (सुपर्णम्) सुन्दर किरणोंवाले सूर्य के समान विद्वान् पुरुष को (नः) हमारे (गोष्ठे) गोठ वा वार्तालाप स्थान में (आ) लाकर (स्थापयाति) [यह पुरुष] स्थान देवे ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे सूर्य सब लोकों के बीच ठहर कर भूगोल आदि लोकों को प्रकाश, वृष्टि आदि से सुखी करता है, वैसे ही जो विद्वान् ज्ञान और उपदेश से सब जनों को आनन्दित करे, उसका सब लोग आदर करें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१।१६४।५२ ॥

    टिप्पणी

    १−(दिव्यम्) दिव्यगुणम् (सुपर्णम्) रश्मियुक्तसूर्यतुल्यं विद्वांसम् (पयसम्) पय गतौ-असुन्, अर्शआद्यच्। गतिमन्तम् (बृहन्तम्) महान्तम् (अपाम्) अन्तरिक्षस्य-निघ० १।३। (गर्भम्) गर्भ इव मध्ये स्थितम् (वृषभम्) वर्षयितारं वर्धयितारम् (ओषधीनाम्) अन्नादीनाम् (अभीपतः) ऋक्पूरब्धूः०। पा० ५।४।७४। अभि+अप् शब्दाद्-अ। द्व्यन्तरुपसर्गेभ्योऽप ईत्। पा० ६।३।९७। अकारस्य ईत्वम्। ततस्तसिल्। अभितः सर्वत आपो यस्मिंस्तस्माद् मेघात् (वृष्ट्या) जलवर्षणेन (तर्पयन्तम्) हर्षयन्तम् (आ) आनीय (नः) अस्माकम् (गोष्ठे) वार्तालापस्थाने विद्वत्समाजे (रयिष्ठाम्) धने तिष्ठन्तम् (स्थापयाति) लेटि रूपम्। स्थापयेत् ॥

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    विषय

    'दिव्य सुपर्ण' वेदज्ञान

    पदार्थ

    १. 'सरस्वती' ज्ञान की अधिष्ठात्री देवता है। पुल्लिंग में यही भाव 'सरस्वान्' शब्द से व्यक्त हो रहा है। वह सरस्वान् प्रभु [७.४०.१] (नः गोष्ठे) = हमारे इस इन्द्रियों के निवास स्थानभूत देह में [गाव: तिष्ठन्ति अस्मिन्] (रयिष्ठाम्) = ज्ञानेश्वर्य की आधारभूत इस वेदवाणी को (आस्था पयाति) = स्थापित करता है। यह वेदवाणी (दिव्यम्) = प्रकाशमय है, (सुपर्णम्) = ज्ञान के द्वारा हमारा पालन व पूरण करनेवाली है। (पयसम्) = आप्यायन [वर्धन] की साधनभूत, (बृहन्तम्) = बढ़ानेवाली है। यह हमें सब वासनाओं से बचाकर बढ़ी हुई शक्तिवाला करती है। २. यह वेदवाणी (अपां गर्भम्) = सब कमों को अपने अन्दर धारण करनेवाली है, इसमें हमारे सब कर्तव्य-कर्मों का निर्देश हुआ है। (ओषधीनां वृषभम्) = ओषधियों में यह श्रेष्ठ है। सब काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं को यह विनष्ट करनेवाली है। (अभीपत:) = [अभीपत्] अपनी ओर आते हुए जनों को (वृष्टया तर्पयन्तम्) =  ज्ञानवृष्टि से तृप्त करती हैं।

    भावार्थ

    सरस्वान् प्रभु हमारे हदयों में उस ज्ञानप्रकाश को स्थापित करता है जो सब प्रकार से हमारा वर्धन करता है, हमारे काम-क्रोध आदि शत्रुओं का विनाश करता है।

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    भाषार्थ

    (दिव्यम्) दिण्यगुणों वाले, (सुपर्णम्) उत्तम पंखों वाले पक्षी के सदृश उड़ने वाले, (पयसम्) जलमय, (बृहन्तम्) महाकाय, (अपाम्, गर्भम्) जलों के गर्भ रूप (ओषधीनाम्, वृषभम्) औषधियों पर वर्षा करने वाले, (अभीपतः) सूर्य को अभिमुख करके उसके चारों ओर उड़ने वाले ग्रहों को (वृष्ट्या, तर्पयन्तम्) वृष्टि द्वारा तृप्त करने वाले, (रविष्ठाम्) सम्पत्ति के उत्पादनार्थ [अन्तरिक्ष में] स्थित [मेघ१ को], (नः गोष्ठे) हमारे गोशाला आदि स्थान में [परमेश्वर] (स्थापयाति) स्थापित करे, या करता है।

    टिप्पणी

    [भौमजल की अपेक्षा मेघस्थ जल दिव्यगुणों वाला होता है, उसमें भौम पदार्थ मिश्रित नहीं होते, वह स्वच्छ होता है। अन्तरिक्ष में मेघस्थ जल वायु द्वारा इधर-उधर उड़ता रहता है। मेघ के कारण अन्नादि सम्पत्ति प्राप्त होती है। गोष्ठ पद उपलक्षक है निवास स्थान, खेत आदि का]। [१. पृथिवी से अतिरिक्त अन्य ग्रहों में भी बर्फ के रूप में जल की सत्ता है। प्रत्येक ग्रह का निज वैयक्तिक अन्तरिक्ष है, यहां स्थित मेघों द्वारा उन पर वृष्टि होती है, या हुई है।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Rain

    Meaning

    May the Lord bring in to our land rain showers of the cloud, divine bird like the sun, bearing abundant milk of life, condensed body of waters, life giver of herbs, filling the earth with showers falling in rain, laden with wealth.

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    Subject

    Mantroktäh (Mentioned in the verse)

    Translation

    May the resplendent Lord settle the celestial beauteous flier (supara), laden with water, huge, showerer of waters and impregnator of plants, satisfying all longing for water with rain, standing amid richies, at ours cow-stalls (gosthe).

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.40.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    The man of knowledge and action establish in the heart the home of organs, the notion of God who is the primal ground of knowledge and speech, who is super-natural, intelligent, active, supreme, the spirit of material elements, the mighty power of all the plants and herbs and who dropping rain from clouds moisten the earth.

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    Translation

    May we remember God, realizable in salvation, nicely endowed with knowledge and nourishment, full of spiritual strength, the Almighty, the Recipient of all deeds, the source of the growth of plants through rain, the satisfier with happiness of the souls who seek His shelter, Who establishes life and vigor in our body, the home of organs.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(दिव्यम्) दिव्यगुणम् (सुपर्णम्) रश्मियुक्तसूर्यतुल्यं विद्वांसम् (पयसम्) पय गतौ-असुन्, अर्शआद्यच्। गतिमन्तम् (बृहन्तम्) महान्तम् (अपाम्) अन्तरिक्षस्य-निघ० १।३। (गर्भम्) गर्भ इव मध्ये स्थितम् (वृषभम्) वर्षयितारं वर्धयितारम् (ओषधीनाम्) अन्नादीनाम् (अभीपतः) ऋक्पूरब्धूः०। पा० ५।४।७४। अभि+अप् शब्दाद्-अ। द्व्यन्तरुपसर्गेभ्योऽप ईत्। पा० ६।३।९७। अकारस्य ईत्वम्। ततस्तसिल्। अभितः सर्वत आपो यस्मिंस्तस्माद् मेघात् (वृष्ट्या) जलवर्षणेन (तर्पयन्तम्) हर्षयन्तम् (आ) आनीय (नः) अस्माकम् (गोष्ठे) वार्तालापस्थाने विद्वत्समाजे (रयिष्ठाम्) धने तिष्ठन्तम् (स्थापयाति) लेटि रूपम्। स्थापयेत् ॥

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