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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 5
    ऋषिः - शुक्रः देवता - कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः छन्दः - भुरिक्संस्तारपङ्क्तिः सूक्तम् - प्रतिसरमणि सूक्त
    49

    तद॒ग्निरा॑ह॒ तदु॒ सोम॑ आह॒ बृह॒स्पतिः॑ सवि॒ता तदिन्द्रः॑। ते मे॑ दे॒वाः पु॒रोहि॑ताः प्र॒तीचीः॑ कृ॒त्याः प्र॑तिस॒रैर॑जन्तु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तत् । अ॒ग्नि: । आ॒ह॒ । तत् । ऊं॒ इति॑ । सोम॑: । आ॒ह॒ । बृह॒स्पति॑: । स॒वि॒ता । तत् । इन्द्र॑: । ते । मे॒ । दे॒वा: । पु॒र:ऽहि॑ता: । प्र॒तीची॑: । कृ॒त्या: । प्र॒ति॒ऽस॒रै: । अ॒ज॒न्तु॒ ॥५.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तदग्निराह तदु सोम आह बृहस्पतिः सविता तदिन्द्रः। ते मे देवाः पुरोहिताः प्रतीचीः कृत्याः प्रतिसरैरजन्तु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तत् । अग्नि: । आह । तत् । ऊं इति । सोम: । आह । बृहस्पति: । सविता । तत् । इन्द्र: । ते । मे । देवा: । पुर:ऽहिता: । प्रतीची: । कृत्या: । प्रतिऽसरै: । अजन्तु ॥५.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 5; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    हिंसा के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (तत्) यह [पूर्वोक्त] (अग्निः) अग्नि [समान तेजस्वी पुरुष] (आह) कहता है, (तत् उ) यही (सोमः) चन्द्र [समान पोषक] (आह) कहता है, (तत्) वही (बृहस्पतिः) बड़ी विद्याओं का स्वामी, (सविता) सब का प्रेरक (इन्द्रः) प्रतापी पुरुष। (ते) वे (देवाः) व्यवहारकुशल (पुरोहिताः) पुरोहित [अग्रगामी पुरुष] (प्रतिसरैः) अग्रगामी पुरुषों सहित (मे) मेरे लिये (कृत्याः) हिंसाओं को (प्रतीचीः) प्रतिकूल गतिवाली करके (अजन्तु) हटावें ॥५॥

    भावार्थ

    विद्वान् पुरुष वेदविद्या का मान करते हैं और विद्वान् ही मनुष्यों को विघ्न से बचाते हैं ॥५॥

    टिप्पणी

    ५−(तत्) पूर्वोक्तम् (अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी पुरुषः (आह) ब्रवीति (तदु) तदेव (सोमः) चन्द्रवत् पोषकः (आह) (बृहस्पतिः) बृहतीनां विद्यानां स्वामी (सविता) सर्वप्रेरकः (तत्) (इन्द्रः) प्रतापी जनः (ते) प्रसिद्धाः (मे) मह्यम् (देवाः) व्यवहारिणः (पुरोहिताः) अ० ३।१९।१। अग्रगामिनः पुरुषाः (प्रतीचीः) प्रतिकूलगतीः कृत्वा (कृत्याः) म० २। हिंसाः (प्रतिसरैः) अग्रेसरैः सह (अजन्तु) क्षिपन्तु ॥

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    विषय

    'अग्रि-सोम' आदि का महत्त्वपूर्ण कथन

    पदार्थ

    १. सोम-[वीर्य]-रक्षण के द्वारा मनुष्य उन्नति करता हुआ 'अग्नि' बनता है। इससे शक्तिशाली बनकर 'सोम'-शान्त स्वभाववाला होता है। निर्बलता हो चिड़चिड़ेपन को पैदा करती है। वीर्य ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर हमें 'बृहस्पति' बनाता है। वीर्यरक्षण करनेवाला पुरुष निर्माण के कार्यों में प्रवृत्त 'सबिता' होता है, और शक्तिशाली बनकर शत्रुओं को दूर भगानेवाला "इन्द्र' होता है। वीर्यरक्षक पुरुष ही दिव्य वृत्तियोंवाले 'देव' बनते हैं और सबका हित करनेवाले 'पुरोहित' होते हैं [पुरोहितवत् हितकारिणः]।२. यह (अग्नि:) = अग्रणी पुरुष (तत् आह) = वही बात कहता है, (उ) = और (सोमः) = शान्त पुरुष भी (तत् आह) = वही बात कहता है। (बृहस्पतिः) = ज्ञानी, (सविता) = निर्माणकार्य-प्रवृत्त, (इन्द्रः) = शत्रुविद्रावक पुरुष भी (तत्) = उस बात को ही कहता है। (ते) = वे (पुरोहिता:) = सबका पूर्ण हित करनेवाले (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष मे मेरे लिए यही कहते हैं कि लोगों को चाहिए कि (प्रतीची:) = अपनी ओर आनेवाली (कृत्या:) = सब हिंसन-क्रियाओं को (प्रतिसरैः) = शत्रुओं पर आक्रमण करनेवाली वीर्यमणियों द्वारा (अजन्तु) = दूर भगा दें। सुरक्षित वीर्य ही हमें सब हिंसनों से बचाता है। यही हमें अग्नि आदि बनने की क्षमता प्रदान करता है।

    भावार्थ

    वीर्यरक्षण द्वारा सब हिंसकतत्त्वों को दूर करके हम 'अग्नि,सोम,बृहस्पति, सविता, इन्द्र, देव व पुरोहित' बनते हैं।

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    भाषार्थ

    (तत्) [१-४ मन्त्रों में] उक्त तत्त्व को (अग्निः) अग्रणी प्रधानमन्त्री ने (मे) मुझे (आह) कहा है (तदु) उसे ही (सोमः) सेनाध्यक्ष ने (आह) कहा है, (बृहस्पतिः) बृहती सेना के अधिपति ने, (सविता) सविर्ताने, (इन्द्रः) सम्राट् ने (तत्) उसे कहा है। (ते) वे (देवाः) दिव्यगुणों वाले अधिकारी (मे) मेरे लिये (पुरोहिताः) पुरोहित रूप में हैं, या मेरे पुरोगामी रूप में हितकारी हैं, वे (प्रतीचीः) मेरे प्रति आने वाली (कृत्याः) शत्रुसेनाओं को, [मन्त्र ८, पृतनाः] (प्रतिसरैः) उन के प्रति सरण करने वाले सैनिकों द्वारा (अजन्तु) धकेल दें।

    टिप्पणी

    [पूर्व के मन्त्रों में राष्ट्रपति राजा और संयुक्त राष्ट्रों अर्थात् साम्राज्य के अधिपति इन्द्र का वर्णन हुआ है। अग्नि आदि हैं साम्राज्य के अधिकारी और मन्त्रप्रवक्ता है राष्ट्रपति राजा। अग्नि है अग्रणी प्रधानमन्त्री। सोम है सेनाध्यक्ष। बृहस्पति है साम्राज्य की समग्र सेना का अधिपति। सविता है वित्ताधिकारी और इन्द्र है सम्राट्। सविता "षु प्रसवैश्वर्ये" (भ्वादिः) के अनुसार ऐश्वर्य अर्थात् साम्राज्य के वित्त का अधिकारी है। मन्त्रप्रवक्ता राष्ट्रपति विश्वास प्रकट करता है कि ये साम्राज्याधिकारी युद्धावस्था में मुझे सहायता देकर आक्रान्ताओं को मेरे राष्ट्र से धकेल देगा। अजन्तु = "अज गतिक्षेपणयोः" (भ्वादिः)। यहां क्षेपणार्थ में "अज" धातु है। "अजन्तु" में णिजर्थ अन्तर्भावित है]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Pratisara Mani

    Meaning

    This is what Soma, the sage of peace, Brhaspati, the eminent scholar, Savita, the inspiring spirit, and Indra, the mighty ruler, all say. May all Devas, brilliant leaders and sages of the nation, leading lights of life, turn off the onslaughts of violence against life and humanity by the noble force of distinguished heroes.

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    Translation

    This is what the fire-divine has declared, the blissful Lord has declared; the Lord supreme, the impeller Lord, the resplendent Lord has declared the same. May those enlightened ones, placed in my forefront drive the evil plottings back with the counter-acting blessings.

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    Translation

    The enlightened man describe this aspect of Mani, the man of genial temperament describes this aspect of Mani, the master of Vedic speech, describes this merit of Mani, the man of constructive geneus admires this aspect of Mani, the mighty King describes this aspect of Mani, and let these men of merit do the strategies of enemies useless by their encountering attacks.

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    Translation

    The Commander-in-chief hath declared the Lord of justice declared it, the Vedic scholar and King, the urger of all, hath declared it, that all learned military officials under my command, should render ineffective, with the help of valiant soldiers, the evil designs of the enemy.

    Footnote

    My: Ruler.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(तत्) पूर्वोक्तम् (अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी पुरुषः (आह) ब्रवीति (तदु) तदेव (सोमः) चन्द्रवत् पोषकः (आह) (बृहस्पतिः) बृहतीनां विद्यानां स्वामी (सविता) सर्वप्रेरकः (तत्) (इन्द्रः) प्रतापी जनः (ते) प्रसिद्धाः (मे) मह्यम् (देवाः) व्यवहारिणः (पुरोहिताः) अ० ३।१९।१। अग्रगामिनः पुरुषाः (प्रतीचीः) प्रतिकूलगतीः कृत्वा (कृत्याः) म० २। हिंसाः (प्रतिसरैः) अग्रेसरैः सह (अजन्तु) क्षिपन्तु ॥

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