अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 1 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 9/ सूक्त 1/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - मधु, अश्विनौ छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - मधु विद्या सूक्त
    पदार्थ -

    (दिवः) सूर्य से, (पृथिव्याः) पृथिवी से, (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष [मध्यलोक] से, (समुद्रात्) समुद्र [जलसमूह] से, (अग्नेः) अग्नि से और (वातात्) वायु से (मधुकशा) मधुकशा [मधुविद्या अर्थात् वेदवाणी] (हि) निश्चय करके [जज्ञे] प्रकट हुई है। (अमृतम्) अमरण [पुरुषार्थ] की (वसानाम्) पहरनेवाली (ताम्) उस को (चायित्वा) पूजकर (सर्वाः) सब (प्रजाः) प्रजाएँ [जीव-जन्तु] (हृद्भिः) [अपने] हृदयों से (प्रति) प्रत्यक्ष (नन्दन्ति) आनन्द करते हैं ॥१॥

    भावार्थ -

    विद्वान् लोग सूर्य, पृथिवी आदि कार्यपदार्थों से आदिकारण परमेश्वर की परम विद्वत्ता विचारकर आनन्दित होते हैं ॥१॥ मधु, उणादि १।१८। मन ज्ञाने-उ, न=ध। ज्ञान। कशा=वाक्-निघण्टु १।११ ॥ ऋग्वेद १।२२।३। में [मधुमती कशा] का वर्णन इस प्रकार है। या वां॒ कशा॒ मधु॑म॒त्यश्वि॑ना सू॒नृता॑वती। तया॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षतम् ॥ (अश्विना) हे शिक्षक और शिष्य ! (वाम्) तुम दोनों की (या) जो (मधुमती) मधुर गुणवाली, (सूनृतावती) प्रिय सत्य बुद्धिवाली (कशा) वाणी है, (तया) उससे (यज्ञम्) यज्ञ [श्रेष्ठ व्यवहार] को (मिमिक्षतम्) तुम दोनों सींचने की इच्छा करो ॥

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