अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 10 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 9/ सूक्त 10/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - गौः, विराट्, अध्यात्मम् छन्दः - जगती सूक्तम् - आत्मा सूक्त
    पदार्थ -

    (यत्) क्योंकि (गायत्रम्) स्तुति करनेवालों का रक्षक [ब्रह्म] (गायत्रे) स्तुति योग्य गुण में (अधि) ऐश्वर्य के साथ (आहितम्) स्थापित है, (वा) और (त्रैष्टुभम्) तीन [सत्त्व, रज और तम] के बन्धनवाले [जगत्] को (त्रैष्टुभात्) तीन [ऋषियों ने] पृथक् किया है। (वा) और (यत्) क्योंकि (जगत्) जानने योग्य (पदम्) प्रापणीय [मोक्षपद] (जगति) संसार के भीतर (आहितम्) स्थापित है, (ये इत्) जो ही [पुरुष] (तत्) उस [ब्रह्म] को (विदुः) जानते हैं, (ते) उन्होंने (अमृतत्वम्) अमरपन (आनशुः) पाया है ॥१॥

    भावार्थ -

    संसार के भीतर परमात्मा अपने गुणों से सर्वव्यापक है, जो योगी जन उसे साक्षात् करते हैं, वे मोक्ष के भागी होते हैं ॥१॥ मन्त्र १-८ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं-म० १।१६४।२३−३० ॥

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