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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 26
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - शाला छन्दः - एकावसाना साम्नी त्रिष्टुप् सूक्तम् - शाला सूक्त
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    दक्षि॑णाया दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑ दे॒वेभ्यः॑ स्वा॒ह्येभ्यः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दक्षि॑णाया: । दि॒श: । शाला॑या: । नम॑: । म॒हि॒म्ने । स्वाहा॑ । दे॒वेभ्य॑: । स्वा॒ह्ये᳡भ्य:॥३.२६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दक्षिणाया दिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    दक्षिणाया: । दिश: । शालाया: । नम: । महिम्ने । स्वाहा । देवेभ्य: । स्वाह्येभ्य:॥३.२६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 26
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

    पदार्थ

    (दक्षिणायाः दिशः) दक्षिण दिशा से.... म० २५ ॥२६॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को योग्य है कि पूर्वादि सब दिशाओं से पुष्कल अन्न आदि पदार्थ संग्रह करके शाला में रक्खें, जिस में विद्वान् लोग वेदों का विचार करते रहें ॥२५-३१॥

    टिप्पणी

    २६−(दक्षिणायाः) अ० ३।२६।२। दक्षिणदिशासकाशात् ॥

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    विषय

    प्रभु-नमन-देववन्दन

    पदार्थ

    १. (शालाया:) = इस शाला की (प्राच्याः दिश:) = पूर्व दिशा से (महिने नमः) = उस प्रभु की महिमा के लिए हम नतमस्तक हों और साथ ही (स्वाहोभ्य:) = [सु आह] उत्तम शब्द बोलने योग्य-प्रशस्य (देवेभ्यः) = देववृत्ति के विद्वान् पुरुषों के लिए (स्वाहा) = हम प्रशस्त शब्दों को कहें विद्वानों का समुचित आदर करें। २. इसी प्रकार (शालाया:) = शाला की दक्षिण दिशा से, (प्रतीच्याः दिश:) = पश्चिम दिशा से (उदिच्याः दिश:) = उत्तर दिशा (ध्रुवायाः दिश:) =  ध्रुव [नीचे की] दिशा से (ऊर्ध्वाया: दिश:) = ऊर्ध्वा दिक् से तथा (दिश:दिशः) = सब दिशाओं-प्रदिशाओं से हम उस प्रभु की महिमा के लिए नतमस्तक हों और प्रशंसनीय देवों के लिए प्रशंसा के शब्दों को कहें।

    भावार्थ

    हमारे घरों में सर्वत्र प्रभु की महिमा के प्रति नमन हो तथा वन्दनीय विद्वानों का उचित समादर हो।

    विशेष

    विशेष-घर में ब्रह्म की महिमा के प्रति सदा नतमस्तक होता हुआ तथा देववन्दन करता हुआ यह उन्नत होता हुआ 'ब्रह्मा' बनता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है। यह ऋषभ नाम से प्रभु-स्तवन करता है

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    भाषार्थ

    दक्षिण दिशा से, शाला के महत्व१ या महिमा के लिये हम अन्नाहुतियां देते हैं, अर्थात् स्वाहा२ योग्य देवों के प्रति, स्वाहा पद के उच्चारणपूर्वक अन्नाहुतियां देते है।

    टिप्पणी

    [१. शाला के परिमाण की दृष्टि से। २. शाला प्रवेश संस्कार में जिस-जिस दिशा के जो-जो देव हैं उनके प्रति।]

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    विषय

    शाला, महाभवन का निर्माण और प्रतिष्ठा।

    भावार्थ

    शाला के भीतर प्रवेश करके गृहपति प्रत्येक दिशा से परमात्मा और देवों की अर्चना किया करे। (शालायाः) शाला के (प्राच्याः दिशः) प्राची, पूर्वाभिमुख दिशा से (महिम्ने नमः) उस महामहिम परमात्मा का शुभ गुणानुवाद करें, और (स्वाह्येभ्यः) उत्तम रीति से स्तुति अर्चा करने योग्य (देवेभ्यः) देव, विद्वान् पुरुषों का भी हम गुणानुवाद और आदर सत्कार करें। इसी प्रकार (दक्षिणायाः) दक्षिण, (प्रतीच्याः) पश्चिम, (उदीच्याः) उत्तर, (ध्रुवायाः) ध्रुवा अर्थात् नीचे की और (ऊर्ध्वायाः) ऊपर की (दिशः) दिशाओं से भी हम परमात्मा को नमस्कार और पूज्य विद्वान् पुरुषों की पूजा सत्कार करें। इसी प्रकार (दिशः दिशः) शाला की सब दिशाओं से (नमो महिम्ने देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः स्वाहा) परमेश्वर और पूजनीय विद्वानों की पूजा हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वङ्गिरा ऋषिः। शाला देवता। १, ५ , ८, १४, १६, १८, २०, २२, २४ अनुष्टुभः। ६ पथ्यापंक्तिः। ७ परा उष्णिक्। १५ त्र्यवसाना पञ्चपदातिशक्वरी। १७ प्रस्तारपंक्तिः। २१ आस्तारपंक्तिः। २५, ३१ त्रिपादौ प्रजापत्ये बृहत्यौ। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। २७, २८, २९ प्रतिष्ठा नाम गायत्र्यः। २५, ३१ एकावसानाः एकत्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Good House

    Meaning

    Honour and homage to the grandeur of the south direction of the home, and to all these divinities and nobilities in truth of word and faith.

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    Translation

    From the southern sides, let our homage be to the grandeur of the mansion. Svaha to the enlightened ones, to whom Svaha is due.

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    Translation

    May from the south side of this house we attain grandeur. Whatever is uttered herein is true. Let this be the resort of the learned scholars performing yajna and propagating the knowledge of the Vedic speech.

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    Translation

    Now from the south side ofthe house to the Almighty God be homage paid. Reverence to the learned whom reverence is due.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २६−(दक्षिणायाः) अ० ३।२६।२। दक्षिणदिशासकाशात् ॥

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