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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 10
    ऋषिः - भृगुः देवता - अजः पञ्चौदनः छन्दः - जगती सूक्तम् - अज सूक्त
    77

    अ॒जस्त्रि॑ना॒के त्रि॑दि॒वे त्रि॑पृ॒ष्ठे नाक॑स्य पृ॒ष्ठे द॑दि॒वांसं॑ दधाति। पञ्चौ॑दनो ब्र॒ह्मणे॑ दी॒यमा॑नो वि॒श्वरू॑पा धे॒नुः का॑म॒दुघा॒स्येका॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒ज: । त्रि॒ऽना॒के । त्रि॒ऽदि॒वे । त्रि॒ऽपृ॒ष्ठे । नाक॑स्य । पृ॒ष्ठे । द॒दि॒ऽवांस॑म् । द॒धा॒ति॒ । पञ्च॑ऽओदन: । ब्र॒ह्मणे॑ । दी॒यमा॑न: । वि॒श्वऽरू॑पा । धे॒नु: । का॒म॒ऽदुघा॑ । अ॒सि॒ । एका॑ ॥५.१०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अजस्त्रिनाके त्रिदिवे त्रिपृष्ठे नाकस्य पृष्ठे ददिवांसं दधाति। पञ्चौदनो ब्रह्मणे दीयमानो विश्वरूपा धेनुः कामदुघास्येका ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अज: । त्रिऽनाके । त्रिऽदिवे । त्रिऽपृष्ठे । नाकस्य । पृष्ठे । ददिऽवांसम् । दधाति । पञ्चऽओदन: । ब्रह्मणे । दीयमान: । विश्वऽरूपा । धेनु: । कामऽदुघा । असि । एका ॥५.१०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 5; मन्त्र » 10
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।

    पदार्थ

    (ब्रह्मणे) ब्रह्म [परमेश्वर] को (दीयमानः) दिया जाता हुआ, (पञ्चौदनः) पाँच भूतों [पृथिव्यादि-म० ८] से सींचा हुआ (अजः) अजन्मा वा गतिशील जीवात्मा (त्रिनाके) तीन [शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक] सुखोंवाली, (त्रिदिवे) तीन [आय, व्यय और वृद्धि] व्यवहारोंवाली, (त्रिपृष्ठे) तीन [धर्म, अर्थ और काम] से सींची हुई (नाकस्य पृष्ठे) सुख की सिंचाई [वृद्धि] में (ददिवांसम्) दे चुकनेवाले [अपने आत्मा] को (दधाति) धरता है”-यह (एका) एक (विश्वरूपा) संसार को रूप देनेवाली (कामदुघा) कामनाएँ पूरी करनेवाली (धेनुः) तृप्त करनेवाली वेदवाणी (असि=अस्ति) है ॥१०॥

    भावार्थ

    वेद पुकार-पुकार कहता है कि परोपकारी आत्मदानी मनुष्य सब प्रकार परमेश्वर की आज्ञापालन में मोक्षसुख पाता है ॥१०॥

    टिप्पणी

    १०−(अजः) जीवात्मा (त्रिनाके) त्रीणि शारीरिकात्मिकसामाजिकसुखानि यस्मिन् तस्मिन् (त्रिदिवे) इगुपधज्ञेति दिवु व्यवहारे-क। त्रयो दिवा आयव्ययवृद्धिव्यवहारा यस्मिन् तस्मिन् (त्रिपृष्ठे) तिथपृष्ठगूथयूथप्रोथाः। उ० २।१२। पृथु सेवने-थक्। त्रयाणां धर्म्मार्थकामानां सेचनं वर्धनं यस्मिन् तस्मिन् (नाकस्य) अ० १।९।२। सुखस्य (पृष्ठे) सेचने वर्धने (ददिवांसम्) ददातेः क्वसु। दत्तवन्तम् (दधाति) स्थापयति (विश्वरूपा) जगतो रूपदात्री (धेनुः) अ० ३।१०।१। वाक्-निघ–० १।११। तर्पयित्री वेदवाणी (कामदुघा) अ० ४।३४।८। कामानां प्रपूरयित्री (एका) अद्वितीया ॥

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    विषय

    कामदुघा धेनुः

    पदार्थ

    १. (अजः) = गति के द्वारा बुराइयों को परे फेंकनेवाला यह जीव। (ददिवांसम) = प्रभु के प्रति दे डालनेवाले अपने को (नाकस्य पृष्ठे) = आनन्दमय लोक के आधार में (दधाति) = स्थापित करता है। उस आनन्दमय लोक के आधार में स्थापित करता है जोकि (त्रिनाके) = आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक कष्टों से शून्य है [न+अक दुःख], (त्रिदिवे) = 'प्रकृति, जीव व परमात्मा' तीनों के प्रकाशवाला है, (त्रिपृष्ठे) = शरीर, मन व बुद्धि तीनों का आधार है। २. यह (पञ्चौदन:) = पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान का भोजन ग्रहण करनेवाला जीव (ब्रह्मणे दीयमान:) = उस ब्रह्म के लिए दिया जाता है, यह ब्रह्म के प्रति अपना अर्पण कर डालता है। यह उस ब्रह्म का साक्षात् करते हुए कह उठता है कि हे प्रभो! आप तो (विश्वरूपा) = सारे ब्रह्माण्ड के पदार्थों का निरूपण करनेवाली (एका धेनुः असि) = वह अद्वितीय धेनु हो, जोकि (कामदुघा) = सब कामनाओं को पूरण करनेवाली हैं।

    भावार्थ

    हम गति द्वारा बुराइयों को परे फेंकते हुए अपने को प्रभु के प्रति अर्पित करें और इसप्रकार अपने को मोक्ष-सुख में स्थापित करें। हम ब्रह्म को इसी रूप में अनुभव करें कि प्रभु 'विश्वरूपा कामधेनु' हैं। वे सब पदार्थों का ज्ञान देनेवाले व सब कामनाओं को पूरण करनेवाले हैं।

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    भाषार्थ

    [हे मुमुक्षुः] (पच्चौदनः) पांच इन्द्रिय-भोगों वाला जो तू था, वह तू (ब्रह्मणे दीयामानः) जब ब्रह्म के प्रति दिया जाने वाला अर्थात् समर्पित किया जाने वाला हो जाता है, तब तू (एका) एक (कामदुघा असि) यथेच्छ-दुही-जाने-वाली गौ के सदृश हो जाता है, जो कामदुघा कि (विश्वरूपा) विश्व को रूपवान् बना देती है। और जब तू (अजः) पुनर्जन्म से मुक्त हुआ जीवन्मुक्त हो जाता है, तब (अजः) अज एकपाद् परमेश्वर (ददिवांसम्) ब्रह्म के प्रति दे चुके हुए तुझ को, (त्रिनाके, त्रिदिवे, त्रिपृष्ठे नाकस्य पृष्ठे) त्रिविभक्त नाक में, जोकि ब्रह्म के प्रकाश द्वारा द्योतमान होता है, और जिस की तीन पीठें हैं, ऐसे नाक की किसी एक पृष्ठ पर (दधाति) स्थापित कर देता है।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में “दीयमानः और ददिवांसम्” द्वारा मुमुक्ष की दो अवस्थाओं का वर्णन किया है। मुमुक्षु जब ब्रह्म के प्रति निज को दिये जाने की अवस्था में होता है। तब वह कामदुधा गौ के सदृश हुआ-हुआ मानुष जगत् की कामनाओं को सफल कर के, मानुष-जगत् को एक नया रूप दे देता है, निज सदुपदेशों द्वारा उनके जीवनों में परिवर्तन पैदा कर उन के जीवनों को सुधार देता है, जैसे कि गौ निज दुग्ध द्वारा दुग्धसेवियों को रूपवान् कर देती है। परन्तु जो जीवन्मुक्त अपने आप को पूर्णरूप से ब्रह्म के प्रति समर्पण कर चुका होता है उसकी आत्मा को ‘अज’ परमेश्वर या ब्रह्म उस के देहावसान पर नाक के किसी एक पृष्ठ पर उसकी योग्यता के अनुसार, स्थापित कर देता है। योगी तीन प्रकार के होते हैं, विदेह, प्रकृतिलीन, समाधिसिद्ध (योग० १।१९,२०)। तीन प्रकार के योगियों में से प्रत्येक योगी, निजकर्मानुसार, विविध नाकों में किसी एक नाक के पृष्ठ पर जाने का अधिकारी होता है। “भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्” (योग० ३।२६) इस के भाष्य में व्यासमुनि ने एक प्राचीन श्लोक उद्धृत किया है। यथा – ब्राह्मस्त्रिभूमिको लोको बार्हस्पत्यस्ततो महान्। माहेन्द्रश्च स्वरित्युक्तो दिवि तारा भुवि प्रजाः॥ श्लोकपठित “ब्राह्मः त्रिभूमिको लोकः” और मन्त्रपठित “त्रिनाके” में आर्थिक और भाव सम्बन्धी समता प्रतीत होती है। श्लोक में ७ भुवनों का निर्देश भी प्राप्त होता है, तीन तो “ब्राह्मस्त्रिभूमिकलोकः” एक बार्हस्पत्य लोक “महान्,” एक माहेन्द्र लोक “स्वः”, द्युलोक, तथा भूलोक१।] [१.येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा, येन स्वः स्तभितं येन नाकः। योऽअन्तरिक्षे रजसो विमानः, कस्मै देवाय हविषा विधेम” (यजु० ३२‌।६) में (१) द्यौः, (२) पृथिवी, (३) स्वः, (४) नाकः, (५) अन्तरिक्ष का वर्णन है। परन्तु व्याख्येय मन्त्र १० में यतः"नाकः" को “त्रिनाके” कहा है, अतः “नाकः” को त्रिविभक्त मान कर मन्त्र ३२।६ में भी सात भुवनों का ही वर्णन जानना चाहिये। नाक भी ब्रह्माण्ड का एक भाग है, लोक है। इस नाक में मुक्तात्माओं का निवास होता है। इस में निम्नलिखित मन्त्र प्रमाण है। यथा “यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तनि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः“ (यजु० ३१।१६)। मन्त्र में “साध्य देवों” की स्थिति “नाक” में दर्शाई है। “साध्याः देवाः” है योगसाधना द्वारा सम्पन्न दिव्य मुक्तात्मा। नाक में मुक्तात्मा ब्रह्म में विचरते हुए ब्रह्मानन्द रस का पान करते हैं। इस भावना को दर्शाने के लिये त्रिभुमिकलोक को “ब्राह्मः” कहा है (योग ३।२६)। त्रिनाके को त्रिदिवे कहा है। यह त्रिनाक ब्राह्मी द्युति द्वारा द्योतमान होता है।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Soul, the Pilgrim

    Meaning

    Aja, immortal soul, bears itself, self- surrendered, Self established in the essence, and holds on to the divine Giver, in the third, highest, heaven of light, secure in the third, highest, state of stability beyond disturbance and fear of dislodgement, in the third, highest, state of divine bliss. O soul, dedicating yourself to Divinity in the state of five-element existence and five-fold pleasure of experience, you are, in reality, the universal treasure-hold of self-fulfilment, the one unique mother cow for the self.

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    Translation

    The pancaudana aja (the unborn, made of five-fold pulp of meshed grain) places the donor in the world free from three sorrows, on the third firmament, on the-three tiered top of the sorrowless world; being presented to an intellectual person, O unborn, you are a milch-cow, wearing all forms and yielding as milk all that we desire.

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    Translation

    The eternal soul flourishing in the body of five elements surrendered to Brahmana, the Supreme Being holds firm contact with its surrendering self in the third Ashrama which is the state blessed with the trio of pleasure, material, physical and spiritual, trio of thought, act and speech and trio of knowledge, action and mediation. This Ashram is an all-purposed cow which yields all wishes.

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    Translation

    The Unborn God, sets an aspirant after salvation on the pitch of heavenly felicity, free from spiritual elemental, and physical woes, full of three lights, and equipped with three joys. The soul is fit to be dedicated to God. This convincing Vedic speech is the unique bestower of all joys, and the fulfiller of all desires.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १०−(अजः) जीवात्मा (त्रिनाके) त्रीणि शारीरिकात्मिकसामाजिकसुखानि यस्मिन् तस्मिन् (त्रिदिवे) इगुपधज्ञेति दिवु व्यवहारे-क। त्रयो दिवा आयव्ययवृद्धिव्यवहारा यस्मिन् तस्मिन् (त्रिपृष्ठे) तिथपृष्ठगूथयूथप्रोथाः। उ० २।१२। पृथु सेवने-थक्। त्रयाणां धर्म्मार्थकामानां सेचनं वर्धनं यस्मिन् तस्मिन् (नाकस्य) अ० १।९।२। सुखस्य (पृष्ठे) सेचने वर्धने (ददिवांसम्) ददातेः क्वसु। दत्तवन्तम् (दधाति) स्थापयति (विश्वरूपा) जगतो रूपदात्री (धेनुः) अ० ३।१०।१। वाक्-निघ–० १।११। तर्पयित्री वेदवाणी (कामदुघा) अ० ४।३४।८। कामानां प्रपूरयित्री (एका) अद्वितीया ॥

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