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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 36
    ऋषिः - भृगुः देवता - अजः पञ्चौदनः छन्दः - दशपदाकृतिः सूक्तम् - अज सूक्त
    54

    यो वा अ॑भि॒भुवं॒ नाम॒र्तुं वेद॑। अ॑भि॒भव॑न्तीमभिभवन्तीमे॒वाप्रि॑यस्य॒ भ्रातृ॑व्यस्य॒ श्रिय॒मा द॑त्ते। ए॒ष वा अ॑भि॒भूर्नाम॒र्तुर्यद॒जः पञ्चौ॑दनः। निरे॒वाप्रि॑यस्य॒ भ्रातृ॑व्यस्य॒ श्रियं॑ दहति॒ भव॑त्या॒त्मना॑। यो॒जं पञ्चौ॑दनं॒ दक्षि॑णाज्योतिषं॒ ददा॑ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । वै । अ॒भि॒ऽभुव॑म् । नाम॑ । ऋ॒तुम् । वेद॑ । अ॒भि॒भव॑न्तीम्ऽअभिभवन्तीम् । ए॒व । अप्रि॑यस्य । भ्रातृ॑व्यस्य । श्रिय॑म् । आ । द॒त्ते॒ । ए॒ष: । वै । अ॒भि॒ऽभू: । नाम॑ । ऋ॒तु: । यत् । अ॒ज: । पञ्च॑ऽओदन: । नि: । ए॒व । अप्रि॑यस्य । भ्रातृ॑व्यस्य । श्रिय॑म् । द॒ह॒ति॒ । भव॑ति । आ॒त्मना॑ । य: । अ॒जम् । पञ्च॑ऽओदनम् । दक्षि॑णाऽज्योतिषम् । ददा॑ति ॥५.३६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यो वा अभिभुवं नामर्तुं वेद। अभिभवन्तीमभिभवन्तीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते। एष वा अभिभूर्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः। निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना। योजं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । वै । अभिऽभुवम् । नाम । ऋतुम् । वेद । अभिभवन्तीम्ऽअभिभवन्तीम् । एव । अप्रियस्य । भ्रातृव्यस्य । श्रियम् । आ । दत्ते । एष: । वै । अभिऽभू: । नाम । ऋतु: । यत् । अज: । पञ्चऽओदन: । नि: । एव । अप्रियस्य । भ्रातृव्यस्य । श्रियम् । दहति । भवति । आत्मना । य: । अजम् । पञ्चऽओदनम् । दक्षिणाऽज्योतिषम् । ददाति ॥५.३६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 5; मन्त्र » 36
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जो [परमेश्वर] (वै) निश्चय करके (अभिभुवम्) [दुःखों के] हरानेवाले (नाम) प्रसिद्ध (ऋतुम्) ऋतु को (वेद) जानता है और [जो] (अप्रियस्य) अप्रिय (भ्रातृव्यस्य) शत्रु की (अभिभवन्तीमभिवन्तीम्) अत्यन्त हरा देनेवाली (श्रियम्) श्री को (एव) निश्चय करके (आ दत्ते) ले लेता है। (एषः वै) वही (अभि भूः) [शत्रुओं का] हरा देनेवाला (नाम) प्रसिद्ध (ऋतुः) ऋतु [के समान] (यत्) पूजनीय ब्रह्म (अजः) अजन्मा (पञ्चौदनः) पञ्चभूतों [पृथिवी आदि] का सींचनेवाला [परमेश्वर] है। वह [मनुष्य अपने] (एव) निश्चय करके (अप्रियस्य) अप्रिय (भ्रातृव्यस्य) शत्रु की (श्रियम्) श्री को (निर्दहति) जला देता है और (आत्मना) अपने आत्मबल के साथ (भवति) रहता है। (यः) जो [पुरुष] (पञ्चौदनम्) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] के सींचनेवाले, (दक्षिणाज्योतिषम्) दानक्रिया की ज्योति रखनेवाले (अजम्) अजन्मे वा गतिशील परमात्मा को [अपने आत्मा में] (ददाति) समर्पित करता है ॥३६॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य दुःखहर्ता परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे दुःखों से छूटकर आनन्दयुक्त होते हैं ॥३६॥

    टिप्पणी

    ३६−(अभिभुवम्) अभिभवितारम्। दुःखनाशकम् (अभिभवन्तीमभिभवन्तीम्) अतिशयेन पराजयन्तीम् (अभिभूः) भू सत्तायाम्-क्विप्। अभिभविता। कष्टहर्ता। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    पिन्वन्, उद्यन्, अभिभूः

    पदार्थ

    १. (य:) = जो (वै) = निश्चय से (पिन्वन्तं नाम ऋतुं वेद) = पिन्वन् नामक ऋतु को जानता है, (यत्) = कि (एष:) = यह (पञ्चौदन:) = पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान के भोजन को ग्रहण करनेवाला (अज:) = गति के द्वारा बुराइयों को परे फेंकनेवाला जीव ही (पिन्वन् नाम ऋतु:) = पिन्वन् नामक ऋतु है। नियमित गतिवाला होने से 'ऋतु' है और वृद्धि को प्राप्त होनेवाला होने से 'पिन्वन्' है। यह (अप्रियस्य भ्रातव्यस्य) = अप्रीतिवाले शत्रुभूत 'मोह' की (पिन्वती पिन्वतीम्) = निरन्तर बढ़ती हुई (एव) = भी (श्रियम्) = श्री को आदत्ते छीन लेता है। मोह को श्रीशून्य [विनष्ट] करके यह वस्तुतः वृद्धि को प्राप्त होता हुआ 'पिन्वन्' बनता है। २. (य:) = जो (वै) = निश्चय से (उद्यन्तं नाम ऋतु वेद) = उद्यन् नामक ऋतु को जानता है, (यत्) = कि (एष:) = यह (पञ्चौदन: अज: वै) = पञ्चौदन अज ही (उद्यन् नाम ऋतु) = उद्यन् नामक ऋतु है। यह 'उद्यन् ऋतु' (अप्रियस्य भ्रातव्यस्य) = मदरूप शत्रु की (उद्यतीम् उद्यतीम् एव श्रियम् आदत्ते) = उन्नत होती हुई श्री को छीन लेता है। मद को विनष्ट करके ही यह उत्थान को प्राप्त होता है। अभिमान ही तो पतन का हेतु बनता है। ३. (य:) = जो (वै) = निश्चय से (अभिभुवं नाम ऋतु वेद) = अभिभू नामक ऋतु को जानता है, यत्-कि एषः यह पञ्चौदन: अज: वै-पञ्चौदन अज ही निश्चय से अभिभूः नाम ऋतु: अभिभू नामक ऋतु है, वह 'अभिभू ऋतु' अप्रियस्य भ्रातृव्यस्य अप्रीतिकर मत्सररूप शत्रु की (अभिभवन्तीम् अभिभवन्तीम् एव श्रियम् आदत्ते) = अभिभूत करती हुई श्री को छीन लेता है। मात्सर्य को अभिभूत करके ही शत्रुओं का अभिभव कर पाते हैं।

    भावार्थ

    हम शक्तियों का वर्धन करते हुए 'पिन्वन्' बनें, उन्नत होते हुए 'उद्यन्' हों और सब शत्रुओं का अभिभव करके 'अभिभू' नामवाले हों। पिन्वन् बनकर मोह को परास्त करें, 'उद्यन्' होते हुए 'मद' को नष्ट करें तथा 'अभिभू' बनकर 'मत्सर' से ऊपर उठे।

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    भाषार्थ

    (यः) जो पुरोहित या अध्यात्म गुरु (अभिभुवम् नाम ऋतुम्) पराभव करने वाली ऋतु को उस के नामानुरूप (वेद) जानता है वह (अप्रियस्य भ्रातृव्यस्य) अप्रिय भ्रातृव्य की (अभिभवन्तीम् अभिभवन्तीम् एव) पराभव करती हुई [बड़ती हुई] प्रत्येक (श्रियम्) शोभा सम्पत्ति को (आदत्ते) हर लेता है, स्वायत्त कर लेता है। (एषः वा अभि भूः नाम ऋतुः) यह है वस्तुतः पराभव करने वाली ऋतु (यद् अजः पञ्चौदनः) जो कि पांच इन्द्रियभोगों का स्वामी अजन्मा परमेश्वर है। (अप्रियस्य भ्रातृव्यस्य) वह पुरोहित या अध्यात्म गुरु अप्रिय भ्रातृव्य की (श्रियम्) शोभा सम्पत्ति को (निर्दहति) दग्ध कर देता है, (भवति आत्मना) और स्वयं उस पर प्रभुता पा लेता है (यः) जोकि (पञ्चौदनम् अजम्) पांच इन्द्रिय भोगों के स्वामी अजन्मा परमेश्वर को, (दक्षिणा ज्योतिषम्) दक्षिणा के फलस्वरूप पारमेश्वरीय ज्योति के रूप में, गृहस्थी के प्रति (ददाति) प्रदान करता है।

    टिप्पणी

    [अभि भूः ऋतु है, वसन्त; जोकि शिशिर ऋतु के (मन्त्र ३५) पश्चात् आती है। निज शोभा के कारण शेष सब ऋतुओं पर यह ऋतु विजय पाती है। गीता में श्री कृष्ण ने अपनी श्रेष्ठता दर्शाने के लिये अपने आप को “ऋतूनां कुसुमाकरः” (१०।३५) कहा है। कुसुमाकर का अर्थ है कुसुमों अर्थात् फूलों की खान। इस ऋतु में वृक्षों में भी नवाङ्कुर पैदा होने लगते हैं। इस ऋतु को मन्त्र में “पञ्चौदन-अज” कहा है। जैसे बसन्त निज शोभा द्वारा अन्य ऋतुओं का पराभव करती हुई नवाङ्कुरों को पैदा करती है, वैसे “पञ्चौदन-अज” भी तामस राजस विचारों तथा कर्मों का पराभव कर, ध्याता में सात्विक नवाङ्कुरों को पैदा करता है। शेष अभिप्राय पूर्ववत मन्त्र ३१]।

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    विषय

    अज के दृष्टान्त से पञ्चौदन आत्मा का वर्णन।

    भावार्थ

    (यः वै अभिभुवं नाम ऋतुं वेद) जो पुरुष ‘अभिभू’ नामक ऋतु अर्थात् जाड़े को परास्त कर देने वाली वसन्त ऋतु को जान लेता है वह (अप्रियस्य भ्रातृव्यस्य अभिभवन्तीम्-अभिभवन्तीम् एव श्रियम् आदत्ते) अपने अप्रिय शत्रु अर्थात् काम क्रोध आदि को परास्त करनेवाली प्रत्येक शक्ति को हर लेता है। (यत् अज पंचौदनः एषः वा अभिभूः नाम ऋतुः) क्योंकि जो पञ्चौदन अजन्मा परमात्मा है वह ‘अभिभू’ नामक ऋतु है, अर्थात् परास्त करनेवाली परम शक्ति है, (अप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं निर्दहति आत्मना भवति। (यः अजं पचौदनं दक्षिणा ज्योतिषं ददाति) इसलिये जो पुरुष उस ज्योतिर्मय तथा पंचभूतों के संहार करने वाले वह अपने अप्रिय शत्रु की शक्ति को सर्वथा भस्म कर देता है, (आत्मना भवति) और वह अपने सामर्थ्य से युक्त एवं परमात्मा में लीन रहता हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृगुर्ऋषिः। अजः पञ्चोदनो देवता। १, २, ५, ९, १२, १३, १५, १९, २५, त्रिष्टुभः, ३ चतुष्पात् पुरोऽति शक्वरी जगती, ४, १० नगत्यौ, १४, १७,२७, ३०, अनुष्टुभः ३० ककुम्मती, २३ पुर उष्णिक्, १६ त्रिपाद अनुष्टुप्, १८,३७ त्रिपाद विराड् गायत्री, २४ पञ्चपदाऽनुपटुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्बर्हता विराड् जगती २०-२२,२६ पञ्चपदाउष्णिग् गर्भोपरिष्टाद्बर्हता भुरिजः, ३१ सप्तपदा अष्टिः, ३३-३५ दशपदाः प्रकृतयः, ३६ दशपदा प्रकृतिः, ३८ एकावसाना द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप, अष्टात्रिंशदर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Soul, the Pilgrim

    Meaning

    Whoever the immortal soul conditioned in the five-fold state of mortality that attains to the life season named victory and excellence, and knows for certain that this is the time and season for victory and excellence, who surrenders his mortal identity of the immortal in dedication to the home, the family and the Lord Divine, steals every step of the victory and excellence of his hateful rival, in fact bums and destroys the power and fortune of his hostile adversary and rises in life by the sheer strength of his own soul.

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    Translation

    He, who surely knows the season called, ‘overcoming’, (abhibhuvam), takes to himself each and every overcoming (abhibhuvanti) splendour in making, of his hated enemy. This, indeed, is the season called overcoming (abhibhuvam), that is the pancaudan aja. He burns out the splendour of his hated enemy and prospers by himself; whoso offers a panaudana aja brightened with sacrificial gifts.

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    Translation

    He who knows the season called the surpassing (The Spring) takes to himself the surpassing fame, his hated rivals surpassing fame Really this eternal soul living in the body of five elements is the surpassing season. He burns up the glory of his hated rival certainly and decidedly lives with his spirit if he surrenders the soul living in the body of five elements and possessing the light of knowledge to God.

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    Translation

    He, who knows the spring season, that lowers the intensity of winter, overcomes the surpassing force of his unfriendly foes like lust and anger. This spring season is another beauty of the Unborn God. He who dedicates himself to the Unborn God, the Absorber of five elements at the time of Dissolution, Illumined with charity, rests on the strength of his soul, and eclipses the force of his unfriendly foes like lust, anger and avarice.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३६−(अभिभुवम्) अभिभवितारम्। दुःखनाशकम् (अभिभवन्तीमभिभवन्तीम्) अतिशयेन पराजयन्तीम् (अभिभूः) भू सत्तायाम्-क्विप्। अभिभविता। कष्टहर्ता। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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