ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 154 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 154/ मन्त्र 1
    ऋषि: - दीर्घतमा औचथ्यः देवता - विष्णुः छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    हे मनुष्यो ! (यः) जो (पार्थिवानि) पृथिवी में विदित (रजांसि) लोकों को अर्थात् पृथिवी में विख्यात सब स्थलों को (नु) शीघ्र (विममे) अनेक प्रकार से रचता वा (यः) जो (उरुगायः) बहुत वेदमन्त्रों से गाया जाता वा स्तुति किया जाता (उत्तरम्) प्रलय से अनन्तर (सधस्थम्) एक साथ के स्थान को (त्रेधा) तीन प्रकार से (विचक्रमाणः) विशेषकर कँपाता हुआ (अस्कभायत्) रोकता है उस (विष्णोः) सर्वत्र व्याप्त होनेवाले परमेश्वर के (वीर्याणि) पराक्रमों को (प्र वोचम्) अच्छे प्रकार कहूँ और उससे (कम्) सुख पाऊँ वैसे तुम करो ॥ १ ॥

    भावार्थ -

    जैसे सूर्य अपनी आकर्षण शक्ति से सब भूगोलों को धारण करता है, वैसे सूर्य्यादि लोक, कारण और जीवों को जगदीश्वर धारण कर रहा है। जो इन असंख्य लोकों को शीघ्र निर्माण करता और जिसमें प्रलय को प्राप्त होते हैं, वही सबको उपासना करने योग्य है ॥ १ ॥

    अन्वय -

    हे मनुष्या यः पार्थिवानि रजांसि नु विममे य उरुगाय उत्तरं सधस्थं त्रेधा विचक्रमाणोऽस्कभायत्तस्य विष्णोर्वीर्याणि प्रवोचमनेन कं प्राप्नुयां तथा यूयमपि कुरुत ॥ १ ॥

    पदार्थ -

    (विष्णोः) वेवेष्टि व्याप्नोति सर्वत्र स विष्णुस्तस्य (नु) सद्यः (कम्) सुखम् (वीर्याणि) पराक्रमान् (प्र) (वोचम्) वदेयम् (यः) (पार्थिवानि) पृथिव्यां विदितानि (विममे) (रजांसि) लोकान् (यः) (अस्कभायत्) स्तभ्नाति (उत्तरम्) प्रलयादनन्तरं कारणाख्यम् (सधस्थम्) सहस्थानम् (विचक्रमाणः) विशेषेण प्रचालयन् (त्रेधा) त्रिभिः प्रकारैः (उरुगायः) य उरुभिर्बहुभिर्मन्त्रैर्गीयते स्तूयते वा ॥ १ ॥

    भावार्थ -

    यथा सूर्यः स्वाकर्षणेन सर्वान् भूगोलान् धरति तथा सूर्यादींल्लोकान् कारणं जीवांश्च जगदीश्वरो धत्ते य इमानसंख्यलोकान् सद्यो निर्ममे यस्मिन्निमे प्रलीयन्ते च स एव सर्वैरुपास्यः ॥ १ ॥

    Meanings -

    Let me well recite the grand acts of Vishnu, lord immanent, all pervasive, of the universe, who creates all worlds of the universe, who sustains the high regions of light in upper space and, having created, maintains it three ways, i.e., as a system, as part of the cosmic system, and in relation to the other systems, the lord who is sung and celebrated everywhere.

    भावार्थ -

    भावार्थ - जसा सूर्य आपल्या आकर्षणशक्तीने संपूर्ण भूगोलाला धारण करतो तसे सूर्य इत्यादी लोक, कारण व जीव यांना जगदीश्वर धारण करीत आहे. जो या असंख्य लोकांना निर्माण करतो, ज्याच्यात प्रलय होतो त्याचीच सर्वांनी उपासना केली पाहिजे. ॥ १ ॥

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