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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 50 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 50/ मन्त्र 10
    ऋषिः - प्रस्कण्वः काण्वः देवता - सूर्यः छन्दः - निचृदनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः

    उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ ज्योति॒ष्पश्य॑न्त॒ उत्त॑रम् । दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उत् । व॒यम् । तम॑सः । परि॑ । ज्योतिः॑ । पश्य॑न्तः । उत्ऽत॑रम् । दे॒वम् । दे॒व॒ऽत्रा । सूर्य॑म् । अग॑न्म । ज्योतिः॑ । उ॒त्ऽत॒मम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरम् । देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत् । वयम् । तमसः । परि । ज्योतिः । पश्यन्तः । उत्तरम् । देवम् । देवत्रा । सूर्यम् । अगन्म । ज्योतिः । उत्तमम्॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 50; मन्त्र » 10
    अष्टक » 1; अध्याय » 4; वर्ग » 8; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    (उत्) ऊर्ध्वेर्थे (वयम्) विद्वांसः (तमसः) आवरकादज्ञानादन्धकारात् (परि) परितः (ज्योतिः) ईश्वररचितं प्रकाशस्वरूपं सूर्य्यलोकं (पश्यन्तः) प्रेक्षमाणाः (उत्तरम्) सर्वोत्कृष्टं प्रलयादूर्ध्वं वर्त्तमानं संप्लवकर्त्तारम् (देवम्) दातारम् (देवत्रा) देवेषु विद्वत्सु मनुष्येषु पृथिव्यादिषु वा वर्त्तमानम् (सूर्य्यम्) सर्वात्मानम् (अगन्म) प्राप्नुयाम (ज्योतिः) प्रकाशम् (उत्तमम्) उत्कृष्टगुणकर्मस्वभावम् ॥१०॥

    अन्वयः

    पुनस्तं विद्वांसः कीदृशं जानीयुरित्युपदिश्यते।

    पदार्थः

    हे मनुष्या ! यथा ज्योतिः पश्यन्तो वयं तमसः पृथग्भूते ज्योतिरुत्तमं देवत्रा देवमुत्तमं ज्योतिः सूर्य्यं परात्मानं पर्य्युदगन्मोत्कृष्टतया प्राप्नुयाम तथा यूयमप्येतं प्राप्नुत ॥१०॥

    भावार्थः

    मनुष्यैर्नहि परमेश्वरेण सदृशः कश्चिदुत्तमः प्रकाशकः पदार्थोऽस्ति न खल्वेतत्प्राप्तिमन्तरेण मुक्तिसुखं प्राप्तुं कोऽपि मनुष्योऽर्हतीति वेद्यम् ॥१०॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर उसको विद्वान्लोग किस प्रकार का जानें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

    पदार्थ

    हे मनुष्यों ! जैसे (ज्योति) ईश्वर ने उत्पन्न किये प्रकाशमान सूर्य्य को (पश्यन्तः) देखते हुए (वयम्) हम लोग (तमसः) अज्ञानान्धकार से अलग होके (ज्योतिः) प्रकाशस्वरूप (उत्तरम्) सबसे उत्तम प्रलय से ऊर्ध्व वर्त्तमान वा प्रलय करनेहारा (देवत्रा) देव मनुष्य पृथिव्यादिकों में व्यापक (देवम्) सुख देने (उत्तमम्) उत्कृष्ट गुण कर्म स्वभाव युक्त (सूर्य्यम्) सर्वात्मा ईश्वर को (पर्युदगन्म) सब प्रकार प्राप्त होवें वैसे तुम भी उस को प्राप्त होओ ॥१०॥

    भावार्थ

    इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर के सदृश कोई भी उत्तम पदार्थ नहीं और न इसकी प्राप्ति के विना मुक्ति सुख को प्राप्त होने योग्य कोई भी मनुष्य हो सकता है ऐसा निश्चित जानें ॥१०॥

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    विषय

    अग्नि - विद्युत् - सूर्य

    पदार्थ

    १. (वयम्) = हम तमसः (परि) = अन्धकार से परे (उत्) = उत्कृष्ट ज्योति अग्नि को तथा (उत्तरम्) = उद्गततर ज्योति, अधिक उत्कृष्ट (ज्योतिः) = विद्युत् को (पश्यन्तः) देखते हुए (देवं देवत्रा) = देवों में भी देव, प्रकाशमान पदार्थों में भी प्रकाशमान (उत्तम ज्योतिः) = सर्वोत्तम ज्योति (सूर्यम्) = सूर्य को (अगन्म) = प्राप्त हों । २. हम अग्नि का ज्ञान प्राप्त करें, विद्युत् - तत्त्व को समझने का यत्न करें और सूर्य के विज्ञान को अपनाएँ । ये ही तीन ज्योतियाँ अध्यात्म में शरीर, हृदय व मस्तिष्क में निवास करती हैं । इन ज्योतियों के अध्यात्म में ठीक कार्य करने पर हमारी वाणी, मन व मस्तिष्क सभी सुन्दर होते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ - अग्नि उत्कृष्ट ज्योति है, विद्युत् उत्कृष्टतर है और सूर्य उत्कृष्टतम है । ये क्रमशः पार्थिव, अन्तरिक्ष व दिव्य ज्योतियाँ हैं ।

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    विषय

    सूर्य के सात अश्वों का रहस्य ।

    भावार्थ

    (वयम्) हम लोग ( तमसः परि) समस्त अन्धकार, शोक दुःख, सबसे ऊपर और सबसे परे वर्त्तमान (उत्तरम्) इन लौकिक पदार्थों की अपेक्षा उच्च, संसार के प्रलय के भी बाद में भी विद्यमान रहने वाले एवं प्रलयकारी (ज्योतिः) प्रकाशवान् सूर्य को ( पश्यन्तः ) साक्षात् दर्शन करते हुए (देवत्रा ) समस्त सुखों के देने वाले, एवं प्रकाशमान पदार्थों में से भी सबसे ( उत्तमम् ) उत्तम गुण कर्म और स्वभाव वाले परम आत्मा रूप ( ज्योतिः ) परम ज्योति को ( अगन्म ) हम प्राप्त हो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १–१३ प्रस्कण्वः काण्व ऋषिः । सूर्यो देवता ॥ छन्दः—१, ६ निचृद्गायत्री । २, ४, ८,९ पिपीलिकामध्या निचृद्गायत्री । ३ गायत्री । ५ यवमध्या विराङ्गायत्री । विराङ्गायत्री । १०, ११ निचृदनुष्टुप् । १२,१३ अनुष्टुप् ।

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    विषय

    फिर उसको विद्वान लोग किस प्रकार का जानें, इस विषय का उपदेश इस मंत्र में किया है।

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    हे मनुष्या ! यथा ज्योतिः पश्यन्तः वयं तमसः पृथग्भूते ज्योतिः उत्तमं देवत्रा देवम् उत्तमं ज्योतिः सूर्य्यं परात्मानं परि उत् अगन्म उत्कृष्टतया प्राप्नुयाम तथा यूयम् अपि एतं प्राप्नुत ॥१०॥

    पदार्थ

    हे (मनुष्या)= मनुष्यो ! (यथा)=जैसे, (ज्योतिः) ईश्वररचितं प्रकाशस्वरूपं सूर्य्यलोक=ईश्वर के द्वारा रचित प्रकाशस्वरूप सूर्य्यलोक, (पश्यन्तः) प्रेक्षमाणाः=देखते हुए, [उत्तरम्] सर्वोत्कृष्टं प्रलयादूर्ध्वं वर्त्तमानं संप्लवकर्त्तारम्= प्रलय के बाद वर्त्तमान सर्वोत्कृष्ट रूप से नीचे बहाते हुए, (वयम्) विद्वांसः=विद्वान्, (तमसः) आवरकादज्ञानादन्धकारात्=अज्ञान और अन्धकार के आवरण से, (पृथग्भूते)=अलग होते हुए, (ज्योतिः) प्रकाशम्=प्रकाश, (उत्तमम्) उत्कृष्टगुणकर्मस्वभावम्= उत्कृष्ट गुण, कर्म और स्वभाव के, (देवत्रा) देवेषु विद्वत्सु मनुष्येषु पृथिव्यादिषु वा वर्त्तमानम्=देवताओं, विद्वानों, मनुष्यों और पृथिवी आदि में वर्त्तमान, (देवम्) दातारम् =दाता, (उत्तमम्) उत्कृष्टगुणकर्मस्वभावम्= उत्कृष्ट गुण, कर्म और स्वभाव के, (ज्योतिः) प्रकाशम्=प्रकाश को, (सूर्य्यम्) सर्वात्मानम्= सार्वभौमिक आत्मा, अर्थात् (परात्मानम्)= परमात्मा को, (परि) परितः=हर ओर से, (उत्) ऊर्ध्वेर्थे =ऊपर, (अगन्म) प्राप्नुयाम=हम प्राप्त करें, (उत्कृष्टतया)= उत्कृष्ट रूप से, (प्राप्नुयाम)= हम प्राप्त करें, (तथा)=वैसे ही, (यूयम्)=तुम सब, (अपि)= भी, (एतम्)=इसको, (प्राप्नुत)= प्राप्त करो॥१०॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    मनुष्यों के लिये परमेश्वर के सदृश कोई भी उत्तम पदार्थ नहीं और न इसकी प्राप्ति के विना मुक्ति सुख को प्राप्त करने के योग्य किसी भी मनुष्य को जानना चाहिए ॥१०॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    हे (मनुष्या) मनुष्यो ! (यथा) जैसे (ज्योतिः) ईश्वर के द्वारा रचित प्रकाशस्वरूप सूर्य्यलोक को (पश्यन्तः) देखते हुए, (वयम्) विद्वानों [के अनुसार] [उत्तरम्] प्रलय के बाद वर्त्तमान सर्वोत्कृष्ट रूप से नीचे बहाते हुए, (तमसः) अज्ञान और अन्धकार के आवरण से (पृथग्भूते) अलग होते हुए, (ज्योतिः) प्रकाश से (उत्तमम्) उत्कृष्ट गुण, कर्म और स्वभाव के (देवत्रा) देवताओं, विद्वानों, मनुष्यों और पृथिवी आदि में वर्त्तमान (देवम्) दाता के (उत्तमम्) उत्कृष्ट गुण, कर्म और स्वभाव के, (ज्योतिः) प्रकाश से, (सूर्य्यम्) सार्वभौमिक आत्मा अर्थात् (परात्मानम्) परमात्मा को, (परि) हर ओर से (उत्कृष्टतया) उत्कृष्ट रूप से (प्राप्नुयाम) हम प्राप्त करें, (तथा) वैसे ही (यूयम्) तुम सब (अपि) भी (एतम्) इसको (प्राप्नुत) प्राप्त करो॥१०॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (उत्) ऊर्ध्वेर्थे (वयम्) विद्वांसः (तमसः) आवरकादज्ञानादन्धकारात् (परि) परितः (ज्योतिः) ईश्वररचितं प्रकाशस्वरूपं सूर्य्यलोकं (पश्यन्तः) प्रेक्षमाणाः (उत्तरम्) सर्वोत्कृष्टं प्रलयादूर्ध्वं वर्त्तमानं संप्लवकर्त्तारम् (देवम्) दातारम् (देवत्रा) देवेषु विद्वत्सु मनुष्येषु पृथिव्यादिषु वा वर्त्तमानम् (सूर्य्यम्) सर्वात्मानम् (अगन्म) प्राप्नुयाम (ज्योतिः) प्रकाशम् (उत्तमम्) उत्कृष्टगुणकर्मस्वभावम् ॥१०॥ विषयः- पुनस्तं विद्वांसः कीदृशं जानीयुरित्युपदिश्यते। अन्वयः- हे मनुष्या ! यथा ज्योतिः पश्यन्तो वयं तमसः पृथग्भूते ज्योतिरुत्तमं देवत्रा देवमुत्तमं ज्योतिः सूर्य्यं परात्मानं पर्य्युदगन्मोत्कृष्टतया प्राप्नुयाम तथा यूयमप्येतं प्राप्नुत ॥१०॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- मनुष्यैर्नहि परमेश्वरेण सदृशः कश्चिदुत्तमः प्रकाशकः पदार्थोऽस्ति न खल्वेतत्प्राप्तिमन्तरेण मुक्तिसुखं प्राप्तुं कोऽपि मनुष्योऽर्हतीति वेद्यम् ॥१०॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. परमेश्वरासारखा कोणताही पदार्थ उत्तम नाही व त्याच्या प्राप्तीशिवाय कोणताही मनुष्य मुक्तिसुख प्राप्त करू शकत नाही, हे निश्चित जाणावे. ॥ १० ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Let us rise beyond the dark seeing the light higher and still higher and reach the sun, the highest light and Lord Supreme of the divinities of the universe.

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    Subject of the mantra

    Then how should learned people know him, this subject has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (manuṣyā) =humans, (yathā) =like, (jyotiḥ)=the Sun sphere created by God as light, (paśyantaḥ)=seeing, (vayam) =learned, [dekhate haiṃ ki]=see that, [uttaram]=shedding down the present quintessentially after the doomsday, (tamasaḥ) from the cover of ignorance and darkness, (pṛthagbhūte) =being apart, (jyotiḥ) =by light, [ke anusāra]=according to, (uttamam)= of excellent qualities, deeds and nature, (devatrā)= present in gods, scholars, humans and earth etc., (devam) =of the provider, (uttamam)=of excellent qualities, deeds and nature, (jyotiḥ) =by light, (sūryyam) =universal soul ie, (parātmānam) =to God, (pari) =from all sides, (utkṛṣṭatayā)=excellently, (prāpnuyāma) =we must obtain, (tathā) =in the same way, (yūyam) =all of you, (api) =also, (etam) =to this, (prāpnuta) =attain.

    English Translation (K.K.V.)

    O humans! Just as looking at the Sun created by God as the form of light, according to the scholars, after the dissolution, shedding the present supreme form, separating from the veil of ignorance and darkness, by the light of the excellent qualities, deeds and nature of the giver present in deities, scholars, humans and the earth etc., from the light of excellent qualities, deeds and nature, may we attain the universal soul i.e. the Supreme God in an excellent form from all sides, in the same way all you may attain it as well.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There is nothing better for humans than the Supreme Lord, and without its attainment, no one should be able to know the happiness of liberation.

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