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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 83 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 83/ मन्त्र 6
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - इन्द्र: छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    ब॒र्हिर्वा॒ यत्स्व॑प॒त्याय॑ वृ॒ज्यते॒ऽर्को वा॒ श्लोक॑मा॒घोष॑ते दि॒वि। ग्रावा॒ यत्र॒ वद॑ति का॒रुरु॒क्थ्य१॒॑स्तस्येदिन्द्रो॑ अभिपि॒त्वेषु॑ रण्यति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ब॒र्हिः । वा॒ । यत् । सु॒ऽअ॒प॒त्याय॑ । वृ॒ज्यते॑ । अ॒र्कः । वा॒ । श्लोक॑म् । आ॒ऽघोष॑ते । दि॒वि । ग्रावा॑ । यत्र॑ । वद॑ति । का॒रुः । उ॒क्थ्यः॑ । तस्य॑ । इत् । इन्द्रः॑ । अ॒भि॒ऽपि॒त्वेषु॑ । र॒ण्य॒ति॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    बर्हिर्वा यत्स्वपत्याय वृज्यतेऽर्को वा श्लोकमाघोषते दिवि। ग्रावा यत्र वदति कारुरुक्थ्य१स्तस्येदिन्द्रो अभिपित्वेषु रण्यति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    बर्हिः। वा। यत्। सुऽअपत्याय। वृज्यते। अर्कः। वा। श्लोकम्। आऽघोषते। दिवि। ग्रावा। यत्र। वदति। कारुः। उक्थ्यः। तस्य। इत्। इन्द्रः। अभिऽपित्वेषु। रण्यति ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 83; मन्त्र » 6
    अष्टक » 1; अध्याय » 6; वर्ग » 4; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स कथं कि कुर्यादित्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    यत्र दिव्युक्थ्यः कारुरिन्द्रोऽभिपित्वेषु यद्यस्मै स्वपत्याय बर्हिर्वृज्यतेऽर्को वा श्लोकमाघोषते ग्रावा वदति रण्यति तत्र तस्येदेव विद्या जायते ॥ ६ ॥

    पदार्थः

    (बर्हिः) विज्ञानम् (वा) समुच्चयार्थे। अथापि समुच्चयार्थे। (निरु०१.४) (यत्) यस्मै। अत्र सुपां सुलुगिति ङेर्लुक्। (स्वपत्याय) शोभनान्यपत्यानि यस्य तस्मै (वृज्यते) त्यज्यते (अर्कः) विद्यमानः सूर्यः (वा) विचारणे। (निरु०१.४) (श्लोकम्) विद्यासहितां वाचम् (आघोषते) विद्याप्राप्तय उच्चरति (दिवि) आकाश इव दिव्ये विद्याव्यवहारे (ग्रावा) मेघः। ग्रावेति मेघनाम। (निघं०१.१०) (यत्र) यस्मिन्देशे (वदति) उपदिशति (कारुः) स्तुत्यानां शिल्पकर्मणां कर्त्ता। कारुरहमस्मि स्तोमानां कर्त्ता। (निरु०६.६) (उक्थ्यः) उक्थेषु वक्तव्येषु व्यवहारेषु साधु (तस्य) (इत्) एव (इन्द्रः) परमैश्वर्यप्रदो विद्वान् (अभिपित्वेषु) अभितः सर्वतः प्राप्तव्येषु व्यवहारेषु। अत्र पदधातोर्बाहुलकादौणादिक इत्वन् प्रत्ययो डिच्च। (रण्यति) उपदिशति। अत्र विकरणव्यत्ययः ॥ ६ ॥

    भावार्थः

    विद्वद्भिर्यथा जलं विच्छिद्यान्तरिक्षं गत्वा वर्षित्वा सुखं जनयति तथैव कुव्यसनानि छित्त्वा विद्यामुपगृह्य सर्वे जनाः सुखयितव्याः। यथा सूर्योऽन्धकारं विनाश्य प्रकाशं जनयित्वा सर्वान् प्राणिनः सुखयति दुष्टान् भीषयते, तथैव जनानामज्ञानं विनाश्य ज्ञानं जनयित्वा सदैव सुखं सम्पादनीयम्। यथा मेघो गर्जित्वा वर्षित्वा दौर्भिक्ष्यं विनाश्य सौभिक्ष्यं करोति तथैव सदुपदेशवृष्ट्याऽधर्मं विनाश्य धर्मं प्रकाश्य जनाः सर्वदाऽऽनन्दयितव्याः ॥ ६ ॥ अत्र सेनापत्युपदेशकयोः कृत्यवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह किस प्रकार से क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

    पदार्थ

    (यत्र) जिस (दिवि) प्रकाशयुक्त व्यवहार में (उक्थ्यः) कथनीय व्यवहारों में निपुण प्रशंसनीय शिल्प कामों का कर्त्ता (इन्द्रः) परमैश्वर्य को प्राप्त करनेहारा विद्वान् (अभिपित्वेषु) प्राप्त होने योग्य व्यवहारों में (यत्) जिस (स्वपत्याय) सुन्दर सन्तान के अर्थ (बर्हिः) विज्ञान को (वृज्यते) छोड़ता है (अर्कः) पूजनीय विद्वान् (श्लोकम्) सत्यवाणी को (वा) विचारपूर्वक (आघोषते) सब प्रकार सुनाता है (ग्रावा) मेघ के समान गम्भीरता से (वदति) बोलता है (वा) अथवा (रण्यति) उत्तम उपदेशों को करता है, वहाँ (तस्येत्) उसी सन्तान को विद्या प्राप्त होती है ॥ ६ ॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोगों को योग्य है कि जैसे जल छिन्न-भिन्न होकर आकाश में जा वहाँ से वर्षा से सुख करता है, वैसे कुव्यसनों को छिन्न-भिन्न कर विद्या को ग्रहण करके सब मनुष्यों को सुखी करें। जैसे सूर्य अन्धकार का नाश और प्रकाश करके सब प्राणियों को सुखी और दुष्ट चोरों को दुःखी करता है, वैसे मनुष्यों के अज्ञान का नाश विज्ञान की प्राप्ति करा के सबको सुखी करें। जैसे मेघ गर्जना कर और वर्ष के दुर्भिक्ष को छुड़ा सुभिक्ष करता है, वैसे ही सत्योपदेश की वृष्टि से अधर्म का नाश धर्म के प्रकाश से सब मनुष्यों को आनन्दित किया करें ॥ ६ ॥ इस सूक्त में सेनापति और उपदेशक के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥

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    विषय

    बर्हि, अर्क व ग्रावा

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में वर्णित प्रभु से अपना मेल करनेवाला (बर्हिः वा) = [उद्बर्ह् = विनाश] वासनाओं का विनाश करनेवाला बनता है । (यत्) = चूँकि (स्वपत्याय) = [सु अपत्] पतन को न आने देने के लिए बड़ी उत्तमता से (वृज्यते) = अपने को वासनाओं से दूर रखता है । वासनाओं की ओर गये और गिरे ! संसार के प्रलोभन मनुष्य के पतन का कारण बनते हैं । यह उन प्रलोभनों का वर्जन करता है, उनसे दूर रहता है । २. (अर्कः वा) = व्यसनों से दूर रहने के लिए ही यह प्रभु की अर्चना करनेवाला बनता है [अर्चति इति अर्कः] और (दिवि) = ज्ञान के प्रकाश में (श्लोकम्) = प्रभु के यश का (आघोषते) = ऊंचे स्वर से उच्चारण करता है ; अर्थभावन के साथ स्तुतिमन्त्रों का उच्चारण करता है । यह प्रभुस्तवन उसका प्रलोभनों में न फंसने में बड़ा सहायक होता है । प्रभुस्तवन से जहाँ उच्च लक्ष्यदृष्टि पैदा होती है, वहाँ व्यसनों के आनन्द की तुच्छता का भी आभास होने लगता है । ३. यह पुरुष (ग्रावा) = [गृणाति] उपदेष्टा बनकर (यत्र वदति) = जहाँ बोलता है और (उक्थ्यः) = स्तोत्रों में उत्तम होता है । इस प्रकार इसके जीवन में 'ज्ञान, कर्म व उपासना' का समन्वय हो जाता है । यही उत्तम व प्रभावशाली जीवन है । ४. (इन्द्रः) = यह जितेन्द्रिय पुरुष (तस्य) = उस प्रभु के (इत्) = ही (अभिपित्वेषु) = प्राप्तियों में (रण्यति) = आनन्द [to rejoice] का अनुभव करता है । यह प्रभु = प्राप्ति का आनन्द ही तो उसके लिए अन्य आनन्दों को तुच्छ कर देता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ = हम 'बर्हि, अर्क व ग्रावा' बनें । प्रभुप्राप्ति में ही आनन्द का अनुभव करें ।

    विशेष / सूचना

    विशेष = इस सूक्त के प्रथम मन्त्र में 'भवीयस् वसु' की प्रार्थना है [१] । दूसरे में ब्रह्मप्रिय बनने का उल्लेख है [२] । इस ब्रह्मप्रिय यजमान को भद्रशक्ति प्राप्त होती है [३] । इस भद्रशक्तिवाले अङ्गिरस का जीवन उत्कृष्ट होता है [४] । अथर्वा बनकर यह क्रियाशील व व्रतों का पालक बनता है [५] । यह वासनाओं को नष्ट करने से 'बर्हि', स्तवन करने से 'अर्क' व उपदेष्टा होने से 'ग्रावा' कहलाता है [६] । अब 'शत्रुओं का धर्षण करके हम प्रभु को प्राप्त हों', इन शब्दों से अगला सूक्त आरम्भ होता है -

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    विषय

    उत्तम शासक के कर्तव्य। पक्षान्तर में परमेश्वर का वर्णन। (पृ० ४९५

    भावार्थ

    (वा) जिस प्रकार ( स्वपत्याय ) उत्तम, अविनाशी, नीचे न गिरने देने वाले, श्रेष्ठ यज्ञ कर्म या उत्तम फल के प्राप्त करने के लिये ( बर्हिः ) कुशा-घास ( वृज्यते ) काट ली जाती है उसी प्रकार ( यत् ) जिस राज्य में ( सु-अपत्याय ) उत्तम सन्तान के लिये ( बर्हिः ) यह समस्त भूलोक और उसमें रहने वाले प्रजाजन (वृज्यते) त्यागे जाते है अर्थात् जहां उत्तम सन्तति के लिये मां बाप अपना सर्वस्व त्यागते हैं और जहां (दिवि) आकाश में (अर्कः) सूर्य के समान ( दिवि अर्कः ) ज्ञान प्रकाश में अर्चना करने योग्य ज्ञानवान् पुरुष ( श्लोकम् ) वेदवाणी का (आघोषते) सर्वत्र उपदेश करता है और ( यत्र ) जिस देश में ( उक्थ्यः ) उत्तम उपदेश करने योग्य वचनों में कुशल ( कारुः ) ज्ञानोपदेष्टा पुरुष (ग्रावा) मेघ के समान गंभीर ध्वनि से उपदेश करता हुआ ( वदति ) उपदेश करता है ( तस्य इत् ) उस ही प्रजाजन के हित के लिये ( अभिपित्वेषु ) सब प्रकार के प्राप्त करने योग्य कार्य व्यवहारों में ( इन्द्रः ) उत्तम ऐश्वर्यो-सुखों का दाता पुरुष ( रण्यति ) उपदेश करता है । इति चतुर्थो वर्गः ॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १-६ गोतमो राहूगण ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः—१, ३, ४, ५ निचृज्जगती । २ जगती । ६ त्रिष्टुप् ॥

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    विषय

    विषय (भाषा)- फिर वह इन्द्र किस प्रकार से क्या करे, इस विषय को इस मन्त्र में कहा है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- यत्र दिवि उक्थ्यः कारुः इन्द्रः अभिपित्वेषु यत् यस्मै स्वपत्याय बर्हिः वृज्यते अर्कः वा श्लोकम् आघोषते ग्रावा वदति रण्यति तत्र तस्य इत् एव विद्या जायते ॥६॥

    पदार्थ

    पदार्थः- (यत्र) यस्मिन्देशे=जिस स्थान में, (दिवि) आकाश इव दिव्ये विद्याव्यवहारे= आकाश के समान दिव्य विद्या के व्यवहार में, (उक्थ्यः) उक्थेषु वक्तव्येषु व्यवहारेषु साधु=कहे हुए वचनों में उत्तम, (कारुः) स्तुत्यानां शिल्पकर्मणां कर्त्ता=स्तुतियों को बनानेवाले, (इन्द्रः) परमैश्वर्यप्रदो विद्वान्= परम ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले विद्वान्, (अभिपित्वेषु) अभितः सर्वतः प्राप्तव्येषु व्यवहारेषु=हर ओर से प्राप्त होनेवाले व्यवहारों में, (यत्) यस्मै=जिसके लिये, (स्वपत्याय) शोभनान्यपत्यानि यस्य तस्मै=उत्तम सन्तानोंवाले, (बर्हिः) विज्ञानम्=विशेष ज्ञान को, (वृज्यते) त्यज्यते=छोड़ते हैं, (अर्कः) विद्यमानः सूर्यः=उपस्थित सूर्य, (वा) विचारणे=विचार करके, (श्लोकम्) विद्यासहितां वाचम्= विद्या युक्त वाणी को, (आघोषते) विद्याप्राप्तय उच्चरति= विद्या को प्राप्त करके बोलता है, (ग्रावा) मेघः=बादल, (वदति) उपदिशति=धिक्कारता है, (तत्र)=वहाँ, (तस्य)=उसकी, (इत्) एव= ही, (विद्या)= विद्या, (जायते)=होती है ॥६॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- विद्वान् लोगों के द्वारा जैसे जल को बादल से पृथक करके आकाश में पहुँचा करके वहाँ से वर्षा से सुख उत्पन्न होता है, वैसे कुव्यसनों से पृथक करके विद्या को प्राप्त करके सब मनुष्यों को सुखी करना चाहिए। जैसे सूर्य अन्धकार का नाश करके, प्रकाश पैदा करके सदा सुखी करता है, वैसै ही बादल गरजन करके, वर्षा करके दुर्भिक्ष का नाश करके, भोजन की प्रचुरता कर देता है, वैसे ही सत्योपदेश की वृष्टि से अधर्म का नाश करके धर्म के प्रकाश से सब मनुष्यों को आनन्दित करना चाहिए ॥६॥

    विशेष

    सूक्त के महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस सूक्त में सेनापति और उपदेशक के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥६॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)- (यत्र) जिस स्थान में (दिवि) आकाश के समान दिव्य विद्या के व्यवहार में, (उक्थ्यः) कहे हुए वचनों में उत्तम (कारुः) स्तुतियों को बनानेवाले और (इन्द्रः) परम ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले विद्वान् होते हैं और (अभिपित्वेषु) हर ओर से प्राप्त होनेवाले व्यवहारों में, (यत्) जिस (स्वपत्याय) उत्तम सन्तानोंवाले के लिये (बर्हिः) विशेष ज्ञान को (वृज्यते) त्यागता है और (अर्कः) उपस्थित सूर्य, (वा) विचार करके (श्लोकम्) विद्या युक्त वाणी को (आघोषते) प्राप्त करने के लिये बोलता है और (ग्रावा) बादल (वदति) धिक्कारता है, [अर्थात् गरजता है]। (तत्र) वहाँ (तस्य) उसकी (इत्) ही (विद्या) विद्या (जायते) होती है ॥६॥

    संस्कृत भाग

    ब॒र्हिः । वा॒ । यत् । सु॒ऽअ॒प॒त्याय॑ । वृ॒ज्यते॑ । अ॒र्कः । वा॒ । श्लोक॑म् । आ॒ऽघोष॑ते । दि॒वि । ग्रावा॑ । यत्र॑ । वद॑ति । का॒रुः । उ॒क्थ्यः॑ । तस्य॑ । इत् । इन्द्रः॑ । अ॒भि॒ऽपि॒त्वेषु॑ । र॒ण्य॒ति॒ ॥ विषयः- पुनः स कथं कि कुर्यादित्युपदिश्यते ॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- विद्वद्भिर्यथा जलं विच्छिद्यान्तरिक्षं गत्वा वर्षित्वा सुखं जनयति तथैव कुव्यसनानि छित्त्वा विद्यामुपगृह्य सर्वे जनाः सुखयितव्याः। यथा सूर्योऽन्धकारं विनाश्य प्रकाशं जनयित्वा सर्वान् प्राणिनः सुखयति दुष्टान् भीषयते, तथैव जनानामज्ञानं विनाश्य ज्ञानं जनयित्वा सदैव सुखं सम्पादनीयम्। यथा मेघो गर्जित्वा वर्षित्वा दौर्भिक्ष्यं विनाश्य सौभिक्ष्यं करोति तथैव सदुपदेशवृष्ट्याऽधर्मं विनाश्य धर्मं प्रकाश्य जनाः सर्वदाऽऽनन्दयितव्याः ॥६॥ सूक्तस्य भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र सेनापत्युपदेशकयोः कृत्यवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥६॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसे जल नष्टभ्रष्ट होऊन आकाशात जाऊन तेथून वृष्टी करून सुखी करते तसे विद्वान लोकांनी कुव्यसनांना नष्टभ्रष्ट करून विद्या ग्रहण करून सर्व माणसांना सुखी करावे. जसा सूर्य अंधकाराचा नाश करून प्रकाशाद्वारे सर्व माणसांना सुखी करतो व दुष्ट चोरांना दुःखी करतो. तसे माणसांच्या अज्ञानाचा नाश व विज्ञानाची प्राप्ती करवून सर्वांना सुखी करावे. जसा मेघ गर्जना करून वृष्टीद्वारे दुर्भिक्ष दूर करून सुभिक्ष करतो तसे सत्योपदेशाच्या वृष्टीने अधर्माचा नाश व धर्माचा प्रकाश करून सर्व माणसांना आनंदित करावे. ॥ ६ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Where knowledge and science is collected like holy grass of yajna for the sake of noble posterity, where holy verses illuminating as the sun in heaven are chanted, where the artist carves around the vedi and holy mantras resound as thunder of the clouds, there in the blessed foods and offerings, Indra, lord of yajna, rejoices and speaks.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What should Indra do is taught further in the sixth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    In which sky-like divine act of knowledge a learned person who is admirable, doer of noble industrial works and thus giver of great wealth imparts knowledge to a house holder having good children. On suitable occasions, the sun or the person shining with wisdom utters wise words for the acquisition of knowledge. Where the cloud or the learned person like a cloud preaches to shower happiness to all; it is there that knowledge and wisdom are acquired.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (बर्हि:) विज्ञानम् = Good knowledge. (दिवि) आकाश इव दिव्ये व्यवहारे । = In the divine dealing like the sun (ग्रावा) मेघ:। ग्रावेति मेघनाम (० १.१०) (कारुः) स्तुत्यानां शिल्प्कर्मणा कर्ता । = The doer of admirable works of arts and industries.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    As the water goes to the firmament and makes people happy by raining, so men should cut down all vices, should get knowledge and should gladden all persons. As the sun makes all happy by dispelling darkness and creating light. freightening the wicked, in the same manner, learned men should dispel the darkness of ignorance and by spreading knowledge, should make them happy. As the cloud by thundering and raining drives away famine and produces crops and good luck, in the same manner, by raining down good sermons, wisemen should destroy all un-righteousness and manifest Dharma or righteousness and thereby should gladden all.

    Translator's Notes

    बर्हिः is derived from बृह्-वृद्धौ It is by acquiriug true knowledge that a man grows or his faculties develop, so the interpretation put by Rishi Dayananda Saraswati as quoted above.दिवि (Divi) has been explained by Rishi Dayananda as आकाशो इव दिव्ये व्यवहारे in the sky-like divine act of knowledge. Even Sayanacharya has not taken it here in the usual sense of 'in the sky' but as a ? In the bright Yajna or sacrifice. This hymn is connected with the previous hymn there is mention of the commander of an army and a preacher (as in that hymn.) Here ends the eighty-third hymn of the first Mandala of the Rigveda.

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    Subject of the mantra

    Then, how and what should Indra do? This has been discussed in the mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (yatra) =In which place, (divi)=In the practice of divine knowledge like the sky, (ukthyaḥ) =best in said words, (kāruḥ)=the creator of praises and, (indraḥ) =There are scholars who bestow ultimate wealth and, (abhipitveṣu)=In the dealings received from all sides, (yat) =for whom, (svapatyāya) =for those good children, (barhiḥ) =the special knowledge, (vṛjyate)=repudiates and, (arkaḥ) =present Sun, (vā)=after thinking, (ślokam)=voice full of knowledge, (āghoṣate)=speaks after receiving and, (grāvā) =c;oud, (vadati) =curses, [arthāt garajatā hai]|=that is, it roars, (tatra) =there, (tasya) =his, (it) =only, (vidyā)= vidyā, (jāyate) =is.

    English Translation (K.K.V.)

    knowledge, in the words spoken, who create excellent praises and bestow supreme opulence and in the behaviour received from all sides, for which the good people repudiate special knowledge for the children and is present. The Sun, after thinking, speaks and acquires a voice full of knowledge, and the clouds curse, that is, they roar. His knowledge is there only.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    Just as water is separated from cloud and sent to the space by learned people, rain brings happiness from there, in the same way, all human beings should be made happy by acquiring knowledge by separating it from bad habits. Just as the Sun, by destroying darkness and creating light, gives eternal happiness, in the same way, by thundering clouds and raining, it destroys famine and creates abundance of food, in the same way, by destroying unrighteousness with the rain of truth, with the light of righteousness all human beings should rejoice.

    TRANSLATOR’S NOTES-

    Just as water is separated from cloud and sent to the space by learned people, rain brings happiness from there, in the same way, all human beings should be made happy by acquiring knowledge by separating it from bad habits. Just as the Sun, by destroying darkness and creating light, gives eternal happiness, in the same way, by thundering clouds and raining, it destroys famine and creates abundance of food, in the same way, by destroying unrighteousness with the rain of truth, with the light of righteousness all human beings should rejoice.

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