ऋग्वेद मण्डल - 2 के सूक्त 2 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 2/ सूक्त 2/ मन्त्र 1
    ऋषि: - गृत्समदः शौनकः देवता - अग्निः छन्दः - विराड्जगती स्वरः - निषादः
    पदार्थ -

    हे विद्वान् जनो ! तुम (तना) विस्तृत (गिरा) वाणी से (वृजनेषु) जिन मार्गों में जन जाते हैं उनमें (धूर्षदम्) विमानादिकों की धुरियों को ले जाने तथा (होतारम्) पदार्थों को ग्रहण करनेवाले (समिधानम्) प्रचण्ड दीप्तियुक्त (सुप्रयसम्) सुन्दर मनोहर (द्युक्षम्) प्रकाशमान (स्वर्णरम्) सुख की प्राप्ति करानेहारे (जातवेदसम्) उत्तम होता है धन जिससे उस (अग्निम्) अग्नि को (हविषा) दान से (यजध्वम्) प्राप्त होओ और उस (यज्ञेन) यज्ञ से (वर्द्धत) बढ़ो ॥१॥

    भावार्थ -

    जो मनुष्य शिल्प-क्रिया से बिजुली आदि के रूप को यान-विमान आदि के कार्य्य में अच्छे प्रकार युक्त करें, वे ऐश्वर्य को प्राप्त हों ॥१॥

    अन्वय -

    हे विद्वांसो जना यूयं तना गिरा वृजनेषु धूर्षदं होतारं समिधानं सुप्रयसं द्युक्षं स्वर्णरं जातवेदसमग्निं हविषा यजध्वमनेन यज्ञेन वर्द्धत ॥१॥

    पदार्थ -

    (यज्ञेन) सङ्गतिकरणेन (वर्द्धत) (जातवेदसम्) जातवित्तम् (अग्निम्) (यजध्वम्) सङ्गच्छध्वम् (हविषा) दानेन (तना) विस्तृतया (गिरा) वाण्या (समिधानम्) सम्यक् प्रदीप्तम् (सुप्रयसम्) सुष्ठु कमनीयम् (स्वर्णरम्) सुखस्य नेतारम् (द्युक्षम्) प्रकाशमानम् (होतारम्) आदातारम् (वृजनेषु) ब्रजन्ति जना येषु मार्गेषु (धूर्षदम्) यानानां धुरं गमयितारम् ॥१॥

    भावार्थ -

    ये मनुष्या शिल्पक्रियया विद्युदादिस्वरूपं यानादिषु कार्येषु संप्रयुञ्जीरंस्त ऐश्वर्यं लभेरन् ॥१॥

    भावार्थ -

    भावार्थ - जी माणसे शिल्पविद्येद्वारे विद्युत इत्यादीला यानांमध्ये चांगल्याप्रकारे युक्त करतात त्यांना ऐश्वर्य लाभते. ॥ १ ॥

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