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ऋग्वेद मण्डल - 2 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 2/ सूक्त 32/ मन्त्र 8
    ऋषिः - गृत्समदः शौनकः देवता - लिङ्गोक्ताः छन्दः - निच्रृदनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः

    या गु॒ङ्गूर्या सि॑नीवा॒ली या रा॒का या सर॑स्वती। इ॒न्द्रा॒णीम॑ह्व ऊ॒तये॑ वरुणा॒नीं स्व॒स्तये॑॥

    स्वर सहित पद पाठ

    या । गु॒ङ्गूः । या । सि॒नी॒वा॒ली । या । रा॒का । या । सर॑स्वती । इ॒न्द्रा॒णीम् । अ॒ह्वे॒ । ऊ॒तये॑ । व॒रु॒णा॒नीम् । स्व॒स्तये॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    या गुङ्गूर्या सिनीवाली या राका या सरस्वती। इन्द्राणीमह्व ऊतये वरुणानीं स्वस्तये॥

    स्वर रहित पद पाठ

    या। गुङ्गूः। या। सिनीवाली। या। राका। या। सरस्वती। इन्द्राणीम्। अह्वे। ऊतये। वरुणानीम्। स्वस्तये॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 2; सूक्त » 32; मन्त्र » 8
    अष्टक » 2; अध्याय » 7; वर्ग » 15; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह।

    अन्वयः

    हे पुरुषा यथाऽहं या गुङ्गूर्या सिनीवाली या राका या च सरस्वती वर्त्तते तामिन्द्राणीमूतयेऽह्वे तां वरुणानीं स्वस्तयेऽह्वे तथा यूयमपि स्वकीयां स्वकीयां स्त्रियमाह्वयत ॥८॥

    पदार्थः

    (या) (गुङ्गूः) अव्यक्तोच्चारणा (सिनीवाली) प्रेमास्पदप्रवणा (या) (राका) पौर्णमासीवद्वर्त्तमाना (या) (सरस्वती) विद्यासुशिक्षासहितया वाचा युक्ता (इन्द्राणीम्) परमैश्वर्ययुक्ताम् (अह्वे) आह्वयामि (ऊतये) रक्षणाद्याय (वरुणानीम्) श्रेष्ठस्य स्त्रियम् (स्वस्तये) सुखाय ॥८॥

    भावार्थः

    यदि काचित् स्त्री मूका काचिच्छ्रेष्ठा सर्वलक्षणसंपन्ना विदुषी भवेत्तयैश्वर्यसुखे सततं वर्द्धनीये इति ॥८॥ अत्र विद्वन्मित्रस्त्रीगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम् ॥ इति द्वात्रिंशत्तमं सूक्तं पञ्चदशो वर्गस्तृतीयोऽनुवाकश्च समाप्तः ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

    पदार्थ

    हे पुरुषो ! जैसे मैं (या) जो (गुङ्गूः) गुङ्गमुङ्ग बोले वा (या) जो (सिनीवाली) प्रेमास्पद को प्राप्त हुई (या) जो (राका) पौर्णमासी होती वैसी पूर्ण कान्तिमती और (या) जो (सरस्वती) विद्या तथा सुन्दर शिक्षा सहित वाणी से युक्त वर्त्तमान है, उस (इन्द्राणीम्) परमैश्वर्य्ययुक्त को (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (अह्वे) बुलाता हूँ उस (वरुणानीम्) श्रेष्ठ की स्त्री को (स्वस्तये) सुख के लिये बुलाता हूँ, वैसे तुम भी अपनी-अपनी स्त्री को बुलाओ ॥८॥

    भावार्थ

    यदि कोई स्त्री गूँगी और कोई उत्तम सर्वलक्षणसम्पन्न विदुषी हो, उसे ऐश्वर्य और सुख निरन्तर बढ़ाने चाहिये ॥८॥ इस सूक्त में विद्वानों की मित्रता और स्त्री के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ के साथ पिछले सूक्तार्थ की संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह बत्तीसवाँ सूक्त पन्द्रहवाँ वर्ग और तीसरा अनुवाक समाप्त हुआ ॥

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    विषय

    आदर्श पत्नी

    पदार्थ

    १. (या) = जो (गुगूः) = अव्यक्त, अर्थात् न बहुत ऊँचा बोलनेवाली है— उचित लज्जा modesty वाली है। (या) = जो (सिनीवाली) = उत्तम व्रतों के बन्धनवाली व उत्तम अन्नादि की व्यवस्थावाली है। (या राका) = जो पूर्णचन्द्रनिशा के समान रमयित्री है। (या सरस्वती) = जो ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी के समान है— खूब उत्कृष्ट ज्ञानवाली है। २. उस (इन्द्राणीम्) = इन्द्रियों की स्वामिनी-जितेन्द्रिय पत्नी को (ऊतये) = रक्षण के लिए (अह्वे) = पुकारता हूँ। ऐसी पत्नी ही इन्द्रियों की शक्ति के रक्षण के अनुकूल होती है। भोगप्रधानवृत्तिवाली पत्नी पति को क्षीणशक्ति बना देती है। २. (वरुणानीम्) = द्वेष का निवारण करनेवाली पत्नी को (स्वस्तये) = उत्तम स्थिति के लिए पुकारते हैं। पत्नी वही ठीक है, जिसके कारण भाइयों में परस्पर ईर्ष्या, द्वेष व क्रोध बढ़ न जाएँ ।

    भावार्थ

    भावार्थ- पत्नी को 'गुड्गू-सिनीवाली सरस्वती - इन्द्राणी व वरुणानी' बनना चाहिए । सूक्त का भाव यह है कि हम प्रभु की मित्रता द्वारा जीवन को पवित्र बनाएँ । उत्तम पत्नी प्राप्त करके घर को सद्गृह बना पाएँ । अगले में जीवन की उत्तमता के लिए सूक्त रुद्र से आराधना करते हैं ।

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    विषय

    राका, सिनीवाली, गुड्डू, सरस्वती नाम उत्तम महिलाओं का वर्णन ।

    भावार्थ

    ( या ) जो ( गुंगूः ) प्रेमवश अव्यक्त, अस्फुट शब्द कहने वाली, अतिलज्जाशील, ( या सिनीवाली ) जो अति प्रेम वाली, ( या राका ) जो सुख देनेवाली, चांदनी रात्रि के समान मनोहर, और ( या ) जो ( सरस्वती ) उत्तम ज्ञानवाली हो उस ऐसी ( इन्द्राणीं ) ऐश्वर्यवाली, और ( वरुणानीं ) समस्त दुःख वारने वाली, या स्वतः श्रेष्ठ स्त्री को ( ऊतये ) आत्मसुख, तृप्ति, और ( स्वस्तये ) कल्याण, सुख प्राप्त करने के लिये ( अह्वे ) अपने समीप बुलाऊं । ऐसी स्त्री को स्वीकार करूं । इति पञ्चदशो वर्गः ॥ इति तृतीयोऽनुवाकः ॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गृत्समद ऋषिः ॥ १, द्यावापृथिव्यौ । २, ३ इन्द्रस्त्वष्टा वा । ४,५ राका । ६,७ सिनीवाली । ८ लिङ्कोत्का देवता ॥ छन्दः– १ जगती । ३ निचृज्जगती । ४,५ विराड् जगती । २ त्रिष्टुप् ६ अनुष्टुप् । ७ विराडनुष्टुप् । ८ निचृदनुष्टुप् ॥ अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जर एखादी स्त्री मुकी वा एखादी उत्तम सर्व लक्षणसंपन्न विदुषी असेल तर तिच्याद्वारे ऐश्वर्य व सुख निरंतर वाढवावे. ॥ ८ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    She is the first night of the new moon, cooing with amour, she is lovely and passionate, she is night of the full moon, she is the mistress of exuberant speech and noble knowledge, she is the lady of power and prosperity, and she is the love of my first choice. I invoke her, I solicit her, I love her for safety, security and all round well-being.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The attributes of woman are further stated.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    One who speaks indistinctly when joined in love-making and is exceptionally beautiful like a full moon night, and one who is blessed with learning, education and culture. O man! I seek company of such an acceptable woman for seeking pleasures. That you also emulate it.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    If the wife is mute or dumb, but otherwise she is blessed with nice virtues and symptoms, one should exchange happiness and pleasures towards her.

    Foot Notes

    (गुङ्ग:) अव्यक्तोच्चारणा। = With indistinct voice. (सिनीवाली) प्रेमास्पदप्रवणा । = Joining in loving making. (अह्वे) आह्वयामि। = I call upon. (वरुणानीम् ) श्रेष्ठस्य स्त्रियम् । = To a woman of noble person. (स्वस्तये ) सुखाय। = For happiness.

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