Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 3 के सूक्त 11 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 11/ मन्त्र 3
    ऋषिः - गाथिनो विश्वामित्रः देवता - अग्निः छन्दः - विराड्गायत्री स्वरः - षड्जः

    अ॒ग्निर्धि॒या स चे॑तति के॒तुर्य॒ज्ञस्य॑ पू॒र्व्यः। अर्थं॒ ह्य॑स्य त॒रणि॑॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒ग्निः । धि॒या । सः । चे॒त॒ति॒ । के॒तुः । य॒ज्ञस्य॑ । पू॒र्व्यः । अर्थ॑म् । हि । अ॒स्य॒ । त॒रणि॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्निर्धिया स चेतति केतुर्यज्ञस्य पूर्व्यः। अर्थं ह्यस्य तरणि॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अग्निः। धिया। सः। चेतति। केतुः। यज्ञस्य। पूर्व्यः। अर्थम्। हि। अस्य। तरणि॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 11; मन्त्र » 3
    अष्टक » 3; अध्याय » 1; वर्ग » 9; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    मनुष्यैः के सेवनीया इत्याह।

    अन्वयः

    यो विद्वानग्निरिव केतुस्तरणि पूर्व्यो धिया ह्यस्य यज्ञस्यार्थं चेतति तस्मात्स सेव्योऽस्ति ॥३॥

    पदार्थः

    (अग्निः) पावकइव (धिया) क्रियया प्रज्ञया वा (सः) (चेतति) संजानीते संज्ञापयति वा (केतुः) प्रज्ञापकः (यज्ञस्य) विद्वत्सत्कारादेर्व्यवहारस्य (पूर्व्यः) पूर्वेषु विद्वत्सु कुशलः (अर्थम्) प्रयोजनम् (हि) यतः (अस्य) (तरणि) सन्तारकः। अत्र सुपां सुलुगिति सुलुक् ॥३॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या ये विद्यामयं यज्ञं यथावज्जानन्ति तानेव विद्यावृद्धये सेवध्वम् ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्यों को किनका सेवन करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

    पदार्थ

    जो विद्वान् पुरुष (अग्निः) अग्नि के सदृश तेजस्वी (केतुः) उपदेश द्वारा बुद्धि का प्रकाश करने तथा (तरणि) सद्विद्या से दुःख का छुड़ानेवाला (पूर्व्यः) प्राचीन विद्वानों में चतुर (धिया) कर्म से वा बुद्धि से (हि) जिस कारण से (अस्य) इस (यज्ञस्य) विद्वानों के सत्काररूप व्यवहार को (अर्थम्) प्रयोजन को (चेतति) उत्तम प्रकार जानता वा अन्यों को जनाता है, इससे (सः) वह सेवा करने योग्य है ॥३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो पुरुष विद्यारूप यज्ञ को उत्तम प्रकार से जानते हैं, उन्हीं पुरुषों की विद्या की उन्नति होने के लिये सेवा करो ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    Bhajan

                   वैदिक मन्त्र
    अग्निर्धिया से चेतति केतुर्यज्ञस्य पूर्व्य:।
    अर्थं ह्यस्य तरणि।।ऋ• ३.११.३

              वैदिक भजन १११६वां
                        राग जोग
       गायन समय दिन का द्वितीय प्रहर
                 ताल कहरवा ८ मात्रा

    तुझे देखना है प्रभु दर्शन दे
    मन कब से व्याकुल है
    जी भर के देखन दे
    तुझे देखना है.......
    तुझे देखने के लिए 
    काम इन्द्रियों का क्या?
    ना वाणी से जाना जाए 
    विषय है यह ध्यान का
    हृदय-गुहा के रहवासी 
    अग्नि रूप दर्शन दे।।
    तुझे देखना है.......
    मन रिक्त रखना कठिन है
    पर नहीं है नामुमकिन
    विषयों से मन को हटा के
    ध्यानावस्थित हो प्रतिदिन
    दुर्बल है चञ्चल मनवा
    इसको तू संयम दे।।
    तुझे देखना है......
    एक ब्रह्म तू अविनाशी
    तू सर्वोत्कृष्ट है
    ज्ञानियों के शुद्ध हृदय में
    तू संसृष्ट है
    एक तू ही अमृत सेतु
    कृपा कर शरण दे।।
    तुझे देखना है......
                       शब्दार्थ:-
    गुहा=गुफा
    संसृष्ट= परस्पर हिला- मिला
    सेतु= पुल
    सर्वोत्कृष्ट=सबसे उत्तम
                   १३.२.२००१
                    ८.५० रात्रि

    वैदिक मन्त्रों के भजनों की द्वितीय श्रृंखला का १०९ वां वैदिक भजन ।
    और प्रारम्भ से क्रमबद्ध अबतक का १११६ वां वैदिक भजन 
    वैदिक संगीत प्रेमी श्रोताओं को  हार्दिक शुभकामनाएं !
    🕉️🙏🌷🌺🥀🌹💐

    Vyakhya

    भगवान का ज्ञान तारक

    लोग पूछते हैं, भगवान् कैसा है? हम पूछते हैं, मिठास क्या है? समझा- समझा कर संसार हार गया, मिठास का सार ना बता सका। अन्त में थककर कहा, यह लो,
    यह मिठास वाला पदार्थ है, इसे खाओ, जो स्वाद लगे, वह मिठास है। भौतिक मिठास को भौतिक वाणी न कह सकी और ना कभी कह सकेगी। तुम अभौतिक ब्रह्म की बात पूछते हो, उसे भौतिक वाणी, जो भौतिक पदार्थों के वर्णन में असमर्थ सिद्ध हो चुकी है, कैसे बखान करें? वाणी का व्यापार बन्द करो, वह वाणी से ज्ञेय नहीं है(नहीं जाना जाता)
    ' अग्निर्धिया स चेतति ' वह अगुआ भगवान ध्यान से चिताया जाता है। ध्यान क्या है? ' ध्यानं निर्विषयं मन: '
    सांख्य दर्शन ६/२५) मन की वह दशा, जब उसमें आंख नाक आदि इन्द्रियों से प्रतीत होने वाले विषय हों ही न, वह ध्यान है। आंख नाक कान आदि इन्द्रियां मूंद लो, इनका व्यवहार रोक दो, मन को भी खाली कर दो, तब उस हृदय गुहा में रहने वाले अधूम अग्नि के दर्शन होंगे।
    मन का खाली करना कठिन है। इसे खाली किए बिना उसका चिताना कठिन है। संसार और भगवान का एक साथ ध्यान नहीं किया जा सकता। मन निर्बल है, दुर्बल है। उसमें एक साथ दोनों को धारण करने का सामर्थ्य नहीं है। आपकी इच्छा है, उससे भगवान का ध्यान करो। आपकी इच्छा है, उससे संसार का व्यवहार व्यापार कराओ। यह एक समय में एक ही कार्य करेगा। ज्ञानी-जन उसी का ध्यान करते हैं क्योंकि उन्हें निश्चय है कि:-
    ' अर्थं ह्यस्य तरणि ' इसकी प्राप्ति तारक है। हमने इसी भाव को लेकर कहा:-य: सेतुरोजानानामक्षरं.... कठोपनिषद१/३/२
    जो ब्रह्मयज्ञ करने वालों के लिए पुल है, जो अविनाशी ब्रह्म सबसे उत्कृष्ट है, संसार सागर को पार करने के अभिलाषियों के लिए जो भयरहित पार करने का साधन है, उस नचिकेत=सर्व संशयनाशक ब्रह्म ज्ञान का हम सम्पादन करें।
    इसी कारण औपनिषद् ऋषि उस ब्रह्म के जानने पर अधिक बल देते थे। मुंडक ऋषि ने तो कह दिया--
    तमेवैकं जानय आत्मानमन्या वाचो  विमुंचथामृतस्यैष सेतु: मुंडक•२/२/५
    उसी एक परमात्मा को जानो, अन्य सब बातें छोड़ दो, क्योंकि वही अमृत का सेतु है।
    आओ उसका ध्यान लगाओ और पार हो जाओ।
     

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    प्रभु का स्मरण 'तारक' है

    पदार्थ

    [१] (सः अग्निः) = वह अग्रणी प्रभु ! धिया चेतति बुद्धि द्वारा हमारे में चेतते हैं, अर्थात् बुद्धि द्वारा हमें प्रभु का ज्ञान होता है। वे प्रभु (यज्ञस्य केतुः) = यज्ञों के प्रकाशक हैं, वेद द्वारा यज्ञों का हमें उपदेश देते हैं। (पूर्व्यः) = पालन व पूरण करनेवालों में उत्तम हैं। प्रभु का स्मरण करने से हम (आधि) = व्याधियों से ऊपर उठते हैं । [२] (हि) = निश्चय से (अस्य) = इस प्रभु का (अर्थम्) = गमन [ऋ गतौ] अर्थात् प्रभु की ओर चलना (तरणि) = हमारा तरानेवाला है। प्रभु के स्मरण से हम वासनाओं को तैर जाते हैं, रोगों से भी आक्रान्त नहीं होते।

    भावार्थ

    भावार्थ– स्वाध्याय द्वारा ज्ञान को बढ़ाते हुए हम प्रभु को पाने का प्रयत्न करें। प्रभु की ओर चलना ही हमें वासनाओं से तराता है।

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो! जे पुरुष विद्यारूपी यज्ञ चांगल्या प्रकारे जाणतात, त्याच पुरुषांची विद्या उन्नत होण्यासाठी सेवा करा. ॥ ३ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    That Agni knows and is known by his own intelligence and action. He is the most ancient banner of yajna. His sole aim and purpose is to be a saviour, a redeemer.

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top