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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 15 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 15/ मन्त्र 4
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    अ॒यं यः सृञ्ज॑ये पु॒रो दै॑ववा॒ते स॑मि॒ध्यते॑। द्यु॒माँ अ॑मित्र॒दम्भ॑नः ॥४॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒यम् । यः । सृञ्ज॑ये । पु॒रः । दै॒व॒ऽवा॒ते । स॒म्ऽइ॒ध्यते॑ । द्यु॒ऽमान् । अ॒मि॒त्र॒ऽदम्भ॑नः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अयं यः सृञ्जये पुरो दैववाते समिध्यते। द्युमाँ अमित्रदम्भनः ॥४॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अयम्। यः। सृञ्जये। पुरः। दैवऽवाते। सम्ऽइध्यते। द्युऽमान्। आमित्रऽदम्भनः ॥४॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 15; मन्त्र » 4
    अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 15; मन्त्र » 4
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ राजविषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे राजन् ! योऽयं द्युमानमित्रदम्भनः पुरो दैववाते सृञ्जये समिध्यते स एव त्वया सत्कर्त्तव्यः ॥४॥

    पदार्थः

    (अयम्) (यः) (सृञ्जये) यः प्राप्ताञ्छत्रून् जयति तस्मिन् (पुरः) पुरस्तात् (दैववाते) देवानां प्राप्ते भवे (समिध्यते) प्रदीप्यते (द्युमान्) बहुविद्याप्रकाशयुक्तः (अमित्रदम्भनः) शत्रूणां हिंसकः ॥४॥

    भावार्थः

    हे नृप ! ये महति सङ्ग्रामे तेजस्विनो निर्भयाः पुरोगामिनः शत्रुविदारका भृत्याः स्युस्तानेव भवान् पुत्रवत् पालयतु ॥४॥

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    हिन्दी (2)

    विषय

    अब राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे राजन् ! (यः) जो (अयम्) यह (द्युमान्) बहुत विद्या के प्रकाश से युक्त (अमित्रदम्भनः) शत्रुओं का नाशकर्त्ता (पुरः) प्रथम (दैववाते) विद्वान् जनों के प्राप्तसुख में (सृञ्जये) पाये हुए शत्रुओं को जिसमें जीतता है, उस संग्राम में (समिध्यते) प्रकाशित होता है, वही आपके सत्कार करने योग्य है ॥४॥

    भावार्थ

    हे राजन् ! जो लोग बड़े संग्राम में तेजस्वी, भयरहित, आगे चलनेवाले और शत्रुओं के नाशकर्त्ता नौकर हों, उनका ही आप पुत्र के सदृश पालन करो ॥४॥

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    विषय

    'सृञ्जय व दैववात' में प्रभु का प्रकाश

    पदार्थ

    [१] (अयम्) = यह (यः) = जो प्रभु हैं वे (घुमान्) = ज्योतिर्मय हैं, सम्पूर्ण ज्ञान के आधार हैं । (अमित्रदम्भनः) = अमित्रों का हिंसन करनेवाले हैं। वस्तुतः ज्ञान को प्राप्त कराके ही प्रभु हमारे कामक्रोध आदि शत्रुओं का संहार किया करते हैं। इस ज्ञानाग्नि में वासनाओं के सब मल भस्म हो जाते हैं । [२] ये प्रभु (पुर:) = सब से प्रथम (सृञ्जये) = [ प्राप्तान् शत्रून् जयति इति सृञ्जय: द०] हमारे में प्रविष्ट हो जानेवाले काम-क्रोध-लोभ रूप शत्रुओं को पराजित करनेवाले पुरुष में (समिध्यते) = दीप्त होते हैं। (दैववाते) = [देववातस्य अपत्यम्] उस व्यक्ति में दीप्त होते हैं, जो कि सूर्य, चन्द्र, विद्युत् आदि देवों से प्रेरणा को प्राप्त करता है [देवेभ्यः वातं अस्ति अस्य] । सूर्य से यह गति द्वारा दीप्ति को प्राप्त करने का पाठ पढ़ता है। चन्द्रमा से सदा शान्त सौम्य बनने की शिक्षा लेता है तथा विद्युत् से वासना-वृक्षों को भस्म करने का पाठ पढ़ता है। इसी प्रकार सब देवों से प्रेरणा को लेता हुआ यह अपने में प्रभु को दीप्त कर पाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम प्राप्त शत्रुओं का नाश करनेवाले 'सञ्जय' बनें, सूर्यादि देवों से प्रेरणा को प्राप्त करनेवाले 'दैववात' हों। ताकि हमारे हृदयों में प्रभु का प्रकाश हो ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे राजा! जे लोक मोठ्या युद्धात तेजस्वी, निर्भय पुरोगामी व शत्रूंचे विनाशक सेवक असतील तर तुम्ही त्यांचे पुत्राप्रमाणे पालन करा. ॥ ४ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    This is he, that fiery and brilliant Agni, leader of yajna, vanquisher of the enemies of life and society, who is lighted and joined first of all in corporate struggles for the attainment of the holy gifts of Divinity.

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