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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 5/ मन्त्र 1
    ऋषिः - वसुश्रुत आत्रेयः देवता - आप्रियः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    सुस॑मिद्धाय शो॒चिषे॑ घृ॒तं ती॒व्रं जु॑होतन। अ॒ग्नये॑ जा॒तवे॑दसे ॥१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सुऽस॑मिद्धाय । शो॒चिषे॑ । घृ॒तम् । ती॒व्रम् । जु॒हो॒त॒न॒ । अ॒ग्नये॑ । जा॒तऽवे॑दसे ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन। अग्नये जातवेदसे ॥१॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सुऽसमिद्धाय। शोचिषे। घृतम्। तीव्रम्। जुहोतन। अग्नये। जातऽवेदसे ॥१॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
    अष्टक » 3; अध्याय » 8; वर्ग » 20; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ विद्वद्विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे मनुष्या ! यूयं जातवेदसे सुसमिद्धाय शोचिषेऽग्नये तीव्रं घृतं जुहोतन ॥१॥

    पदार्थः

    (सुसमिद्धाय) सुप्रदीप्ताय (शोचिषे) पवित्रकराय (घृतम्) आज्यम् (तीव्रम्) सुशोधितम् (जुहोतन) (अग्नये) पावकाय (जातवेदसे) जातेषु विद्यमानाय ॥१॥

    भावार्थः

    येऽध्यापकाः शुद्धान्तःकरणेषु विद्यां वपन्ति ते सूर्य इव प्रतापयुक्ता भवन्ति ॥१॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब ग्यारह ऋचावाले पञ्चम सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! आप लोग (जातवेदसे) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (सुसमिद्धाय) उत्तम प्रकार प्रदीप्त और (शोचिषे) पवित्र करनेवाले (अग्नये) अग्नि के लिये (तीव्रम्) उत्तम प्रकार शुद्ध अर्थात् साफ किये (घृतम्) घृत का (जुहोतन) होम करो ॥१॥

    भावार्थ

    जो अध्यापक जन पवित्र अन्तःकरणवालों में विद्या का संस्कार डालते हैं, वे सूर्य्य के सदृश प्रताप से युक्त होते हैं ॥१॥

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    विषय

    अग्निहोत्र देवयज्ञ का वर्णन

    भावार्थ

    भा०- ( सुसमिद्धाय ) खूब अच्छी प्रकार प्रदीप्त, तेजस्वी ( शोचिषे ) शुद्ध पवित्र करने वाले ( जातवेदसे ) धन, ज्ञानसम्पन्न और ऐश्वर्य के उत्पादक (अग्नये ) अग्नि के सदृश तेजस्वी, अग्रणी विद्वान् वा विनीत पुरुष के लिये (तीव्रं घृतं ) अग्नि को तीव्र करने वाले घृत के समान उसकी शक्ति और सामर्थ्य की वृद्धि करने वाले घृतयुक्त अन्न, तेज के दायक ज्ञान और प्रकाश को ( जुहोतन ) प्रदान करो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसुश्रुत आत्रेय ऋषिः ॥ आप्री देवता ॥ छन्दः - १, ५, ६, ७, ९, १० गायत्री । ३, ८ निचृद्गायत्री । ११ विराड्गायत्री । ४ पिपीलिकामध्या गायत्री । २ आच्यु॑ष्णिक् ॥ एकादशचं सूक्तम् ॥

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    विषय

    प्रभु प्राप्ति के लिये ज्ञान की साधना

    पदार्थ

    [१] (सुसमिद्धाय) = खूब दीप्त-तेजस्वी, (शोचिषे) = ज्ञानदीप्तिवाले, (अग्नये) = गतिशील अग्रणी, (जातवेदसे) = [जातं वेदः यस्यात्] उत्पन्न धनवाले, सब धनों के दाता उस प्रभु की प्राप्ति के लिये (तीव्रम्) = बड़ी प्रबल (घृतम्) = ज्ञानदीप्ति को (जुहोतन) = अपने में आहुत करो। [२] प्रभु प्राप्ति का मार्ग यही है कि हम ज्ञान को बढ़ायें। जितना जितना ज्ञान बढ़ेगा, उतना उतना प्रभु की महिमा को हम प्रत्येक पदार्थ में देखेंगे। प्रभु के समीप होते हुए हम भी तेजस्वी [समिद्ध] ज्ञानदीप्तिवाले, प्रगतिशील व आवश्यक धनों का अर्जन करनेवाले बनेंगे।

    भावार्थ

    भावार्थ- ज्ञानवृद्धि के द्वारा हम प्रभु के सान्निध्य को प्राप्त करें। यह सान्निध्य हमें तेजस्वी, ज्ञानदीप्त, प्रगतिशील व ऐश्वर्य सम्पन्न बनायेगा।

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    मराठी (1)

    विषय

    या सूक्तात विद्वान, राजा, गृहस्थाश्रम, राजा, प्रजा व विद्याग्रहण यांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.

    भावार्थ

    जे अध्यापक पवित्र अन्तःकरणाच्या लोकांना विद्येचे संस्कार देतात ते सूर्याप्रमाणे पराक्रमी होतात. ॥ १ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    For success and self-fulfilment, ardenly offer hot and sharply catalytic ghrta into the intense fire, lighted, rising and radiant in the vedi, Jataveda, fire of life vibrating in everything in existence including yourself.$For self-realisation in meditation, collect and concentrate your mind and consciousness into focus and direct it into the light of Divinity all pervasive, and shining in the cave of your heart also.

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