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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 56 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 56/ मन्त्र 5
    ऋषिः - श्यावाश्व आत्रेयः देवता - मरुतः छन्दः - विराट्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    उत्ति॑ष्ठ नू॒नमे॑षां॒ स्तोमैः॒ समु॑क्षितानाम्। म॒रुतां॑ पुरु॒तम॒मपू॑र्व्यं॒ गवां॒ सर्ग॑मिव ह्वये ॥५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उत् । ति॒ष्ठ॒ । नू॒नम् । ए॒षा॒म् । स्तोमैः॑ । सम्ऽउ॑क्षितानाम् । म॒रुता॑म् । पु॒रु॒ऽतम॑म् । अपू॑र्व्यम् । गवा॑म् । सर्ग॑म्ऽइव । ह्वये ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत्तिष्ठ नूनमेषां स्तोमैः समुक्षितानाम्। मरुतां पुरुतममपूर्व्यं गवां सर्गमिव ह्वये ॥५॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत्। तिष्ठ। नूनम्। एषाम्। स्तोमैः। सम्ऽउक्षितानाम्। मरुताम्। पुरुऽतमम्। अपूर्व्यम्। गवाम्। सर्गम्ऽइव। ह्वये ॥५॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 56; मन्त्र » 5
    अष्टक » 4; अध्याय » 3; वर्ग » 19; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे विद्वन् ! यथाहं गवां सर्गमिव पुरुतममपूर्व्यं ह्वये तथैषां समुक्षितानां मरुतां स्तोमैर्नूनमुत्तिष्ठ ॥५॥

    पदार्थः

    (उत्) (तिष्ठ) ऊर्द्ध्वं गच्छ (नूनम्) निश्चयेन (एषाम्) (स्तोमैः) प्रशंसाभिः (समुक्षितानाम्) सम्यक् सेक्तॄणाम् (मरुताम्) मनुष्याणाम् (पुरुतमम्) बहुतमम् (अपूर्व्यम्) अपूर्वे भवम् (गवाम्) धेनूनाम् (सर्गमिव) उदकमिव (ह्वये) ॥५॥

    भावार्थः

    मनुष्यैः सृष्टिक्रमं विज्ञाय सर्वानन्द आप्तव्यः ॥५॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे विद्वान् ! जैसे मैं (गवाम्) गौओं के (सर्गमिव) जल के सदृश (पुरुतमम्) अत्यन्त बहुत (अपूर्व्यम्) अपूर्व में हुए को (ह्वये) पुकारता हूँ वैसे (एषाम्) इन (समुक्षितानाम्) उत्तम प्रकार से सींचनेवाले (मरुताम्) मनुष्यों की (स्तोमैः) प्रशंसाओं से (नूनम्) निश्चय से (उत्, तिष्ठ) ऊपर पहुँचिये ॥५॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिये कि सृष्टि के क्रम को जानकर सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त हों ॥५॥

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    विषय

    प्रमुख नायक ।

    भावार्थ

    भा०-हे राजन् ! सेनापते ! तू ( एषाम् ) इन ( समुक्षितानाम् ) अच्छी प्रकार से अभिषिक्त, ( मरुतां ) वायुवत् बलवान् पुरुषों के ( स्तोमैः) उत्तम बलवीयों द्वारा ( नूनम् ) निश्चय से ( उत् तिष्ठ ) सब से उच्च पद पर विराज । मैं तुझको ( गवां सर्गम् इव ) गौओं के बीच में सृष्टि उत्पादक वृषभ के समान वा ( गवां सर्गम् ) समस्त वाणियों, आज्ञाओं का दाता एवं समस्त भूमिवासी प्रजाओं के बीच, विधाता, शासक और ( पुरुतमम् ) सब प्रजाओं में श्रेष्ठ, ( अपूर्व्यम् ) अपूर्व, सर्वोत्कृष्ट पद के योग्य ( ह्वये ) कहता हूं । उत्तम पद के योग्य बतलाता हूं । ( २ ) हे विद्वान् ! शिष्य ! तू सम्यक् स्नात, निष्णात विद्वानों के ( स्तोमैः) उपदेशों से ऊंचा उठ । पूर्व के जनों से अप्राप्त सर्वश्रेष्ठ, वाणियों के उत्पन्न पुत्रवत् वा सूर्य की किरणों से उत्पन्न जलवत् जानकर तुझको ( ह्वये) मैं गुरु उपदेश करूं । इत्येकोनविशो वर्गः ॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्यावाश्व आत्रेय ऋषिः ॥ मरुतो देवताः ॥ छन्दः- १, २, ५ निचृद् बृहती ४ विराड्बृहती । ८, ९ बृहती । ३ विराट् पंक्तिः । ६, ७ निचृत्पंक्ति: ॥ नवर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    सर्वश्रेष्ठ पद पर प्राणों का अभिषेक

    पदार्थ

    [१] प्रभु जीव से कहते हैं कि (उत्तिष्ठ) = तू उठ खड़ा हो, आलस्य को छोड़कर उत्साहमय जीवनवाला हो । (नूनम्) = निश्चय से (एषाम्) = इन (स्तोमैः) = स्तुतियों के द्वारा (समुक्षितानाम्) = शरीर में सम्यक् अभिषिक्त (मरुताम्) = प्राणी के शरीर में प्राण ही सर्वश्रेष्ठ हैं, इनका मानो सर्वश्रेष्ठ पद पर अभिषेक होता हो, (सर्गम्) = उत्पादन [creation] को (ह्वये) = पुकारता हूँ। [२] इन प्राणों के उत्पादन को इस प्रकार करता हूँ (इव) = जैसे कि (पुरुतमम्) = अतिशयेन पालक व पूरक (अपूर्व्यम्) = अद्भुत (गवां सर्गम्) = इन्द्रियों के उत्पादन को। एक-एक इन्द्रिय अद्भुत रचनावाली हो । परन्तु प्राण इन इन्द्रियों के द्वारा भी स्तुति के योग्य होते हैं । इन्द्रियों में जो भी श्रेष्ठता है, वह सब इन प्राणों के कारण है। इन्द्रियाँ अपने सर्वश्रेष्ठ पद पर इन प्राणों का अभिषेक करती हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु शरीर में इन्द्रियों को निर्मित कर उनके सर्वश्रेष्ठ पद पर प्राणों को स्थापित करते हैं। जीव को चाहिये कि उठे और इनकी साधना में प्रवृत्त हो ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी सृष्टिक्रम जाणून संपूर्ण आनंद घ्यावा. ॥ ५ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O ruler, O citizen, rise up with joy and confidence, for, as we call in or call out of the stalls a herd of cows, so I call upon and arouse the ancient and abundant host of these mighty Maruts exalted by songs of praise.

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