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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 56 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 56/ मन्त्र 7
    ऋषिः - श्यावाश्व आत्रेयः देवता - मरुतः छन्दः - निचृद्बृहती स्वरः - मध्यमः

    उ॒त स्य वा॒ज्य॑रु॒षस्तु॑वि॒ष्वणि॑रि॒ह स्म॑ धायि दर्श॒तः। मा वो॒ यामे॑षु मरुतश्चि॒रं क॑र॒त्प्र तं रथे॑षु चोदत ॥७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒त । स्यः । वा॒जी । अ॒रु॒षः । तु॒वि॒ऽस्वणिः॑ । इ॒ह । स्म॒ । धा॒यि॒ । द॒र्श॒तः । मा । वः॒ । यामे॑षु । म॒रु॒तः॒ । चि॒रम् । क॒र॒त् । प्र । तम् । रथे॑षु । चो॒द॒त॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत स्य वाज्यरुषस्तुविष्वणिरिह स्म धायि दर्शतः। मा वो यामेषु मरुतश्चिरं करत्प्र तं रथेषु चोदत ॥७॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत। स्यः। वाजी। अरुषः। तुविऽस्वनिः। इह। स्म। धायि। दर्शतः। मा। वः। यामेषु। मरुतः। चिरम्। करत्। प्र। तम्। रथेषु। चोदत ॥७॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 56; मन्त्र » 7
    अष्टक » 4; अध्याय » 3; वर्ग » 20; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे मरुतो ! यो वाजी इहाऽरुषस्तुविष्वणिर्दर्शतो धायि स्यो यामेषु वश्चिरं मा स्म करत्तमुत रथेषु प्र चोदत प्रेरयत ॥७॥

    पदार्थः

    (उत) (स्यः) सः (वाजी) वेगवान् (अरुषः) मर्मणः (तुविष्वणिः) बलसेवी (इह) अस्मिन् (स्म) (धायि) ध्रियते (दर्शतः) द्रष्टव्यः (मा) (वः) युष्मान् (यामेषु) यमादियुक्तशुभव्यवहारेषु प्रहरेषु वा (मरुतः) मानवाः (चिरम्) (करत्) कुर्यात् (प्र) (तम्) (रथेषु) (चोदत) ॥७॥

    भावार्थः

    येऽग्निविद्यां धरन्ति तान् सर्वदा सत्कुरुत ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (मरुतः) मनुष्यो ! जो (वाजी) वेगवान् (इह) इस में (अरुषः) मर्मस्थल के (तुविष्वणिः) बल का सेवी (दर्शतः) देखने योग्य (धायि) धारण किया जाता है (स्यः) वह (यामेषु) यम आदि से युक्त उत्तम व्यवहारों वा प्रहरों में (वः) आप लोगों को (चिरम्) बहुत कालपर्य्यन्त (मा) मत (स्म) ही (करत्) करे अर्थात् न निषेध करे (तम्, उत) उसी को (रथेषु) रथों में (प्र, चोदत) प्रेरित करो ॥७॥

    भावार्थ

    जो अग्निविद्या को धारण करते हैं, उनका सब समय में सत्कार करो ॥७॥

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    विषय

    उनके कर्त्तव्य और योग्य आदर ।

    भावार्थ

    भा०- ( उत ) और ( अरुष: ) तेजस्वी और रोष से रहित, अक्रोधी, (तुवि-स्वनिः ) बहुत उच्च ध्वनि करने में समर्थ, ( दर्शतः ) दर्शनीय रूप और गुणों वाला ( स्यः वाजी ) वह ज्ञान और शक्ति तथा ऐश्वर्य का स्वामी राजा वा प्रधान, बलवान् अश्व के समान समर्थ पुरुष ( इह धायि स्म ) इस कार्य में स्थापित किया जाय । हे ( मरुतः ) विद्वान् पुरुषो ! हे वैश्य जनो ! (वः) जो आप लोगों के (या मेषु ) आने जाने के मार्गों और प्रजा के नियन्त्रण के कार्यों में कोई नियुक्त पुरुष एवं रथ में जुता अश्वादि भी ( चिरं मा करत ) विलम्ब न किया करे । ( रथेषु ) रथों में लगे अश्व के समान आप लोग ( तं ) उसको ( रथेषु) रमण योग्य, एवं शीघ्रता से करने योग्य कार्यों में ( प्र चोदत ) अच्छी प्रकार प्रेरित करो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्यावाश्व आत्रेय ऋषिः ॥ मरुतो देवताः ॥ छन्दः- १, २, ५ निचृद् बृहती ४ विराड्बृहती । ८, ९ बृहती । ३ विराट् पंक्तिः । ६, ७ निचृत्पंक्ति: ॥ नवर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    प्राणसाधना

    पदार्थ

    [१] हे प्राणो ! (उत) = और (स्यः) = वह (वाजी) = शक्तिशाली, (अरुषः) = आरोचमान, (तुविष्वणिः) = महान् स्तुति शब्दोंवाला, (दर्शत:) = दर्शनीय यह अन्तःकरण (इह) = यहाँ इस शरीर में (स्म) = निश्चय से (धायि) = धारण किया जाता है। प्राणसाधना से ही वस्तुत: मन 'शक्तिशाली, ज्ञानदीप्त व प्रभु स्तवनवाला' बनता है। [२] हे (मरुतः) = प्राणो ! यह मन (वः यामेषु) = तुम्हारी गतियों के होने पर (मा चिरं करत्) = बाहर विषयों में देर तक भटकता न रहे। यह शीघ्र ही विषय-व्यावृत्त होकर शरीर में निरुद्ध हो । (तम्) = उस मन को आप (रथेषु) = इन शरीर-रथों में ही (प्रचोदत) = प्रकर्षेण प्रेरित करो। ये भटके नहीं ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्राणसाधना से मन शरीर में ही निरुद्ध होकर 'शक्तिशाली, आरोचमान व खूब स्तुतिवाला' बनता है।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ज्यांना अग्निविद्या येते त्यांचा सदैव सत्कार करा. ॥ ७ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    And now, O Maruts, adventurers and explorers of the earth, that volatile, wondrous and vociferous energy of red flames is here used in the chariot. It would not delay you any more in your advancement. Ignite and accelerate it in the chariots.

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