ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 68 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 68/ मन्त्र 1
    ऋषि: - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः देवता - इन्द्रावरुणौ छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    हे (इन्द्रावरुणौ) वायु और बिजुली के समान अध्यापक और उपदेशको ! (यः) जो (उद्यतः) उद्योगी (सजोषाः) अपने आत्मा के तुल्य औरों का प्रीति से सेवन करता (मनुष्यवत्) मनुष्य के तुल्य (वृक्तबर्हिषः) संक्षोभित किया जल जिसने उसका और (वाम्) तुम्हारा (यज्ञः) सङ्ग करने योग्य शिष्य (आ, यजध्यै) अच्छे प्रकार सङ्ग करने को (अद्य) आज (महे) महान् (सुम्नाय) सुख वा (महे) बहुत (इषे) विज्ञान वा अन्न के लिये (श्रुष्टी) शीघ्र (आववर्त्तत्) अच्छे प्रकार वर्त्तमान है, उसको तुम दोनों पढ़ाओ ॥१॥

    भावार्थ -

    हे पढ़ाने और उपदेश करनेवालो ! जो आप लोगों के सुख के लिये प्रयत्न करते हुए पुरुषार्थी, प्रीतिमान्, शीघ्रकारी वर्त्तमान हैं उन पवित्र, जितेन्द्रिय, धार्मिक विद्यार्थियों को निरन्तर सत्य का उपदेश करो ॥१॥

    अन्वय -

    हे इन्द्रावरुणौ ! य उद्यतस्सजोषा मनुष्यवद्वृक्तबर्हिषो वां यज्ञ आ यजध्या अद्य महे सुम्नाय मह इषे श्रुष्ट्याववर्त्ततं युवामध्यापयेतम् ॥१॥

    पदार्थ -

    (श्रुष्टी) सद्यः (वाम्) युवयोः (यज्ञः) सङ्गमनीयः शिष्यः (उद्यतः) उद्योगी (सजोषाः) स्वात्मवदन्येषां प्रीत्या सेवकः (मनुष्वत्) मनुष्येण तुल्यः (वृक्तबर्हिषः) वृक्तं छेदितं बर्हिरुदकं येन तस्य। बर्हिरित्युदकनाम। (निघं०१.१३) (यजध्यै) यष्टुं सङ्गन्तुम् (आ) (यः) (इन्द्रावरुणौ) वायुविद्युताविवाऽध्यापकोपदेशकौ (इषे) विज्ञानायाऽन्नाय वा (अद्य) इदानीम् (महे) महते (सुम्नाय) सुखाय (महे) महते (आववर्त्तत्) समन्ताद्वर्तते ॥१॥

    भावार्थ -

    हे अध्यापकोपदेशका ! ये भवतां सुखाय प्रयतमानाः पुरुषार्थिनः प्रीतिमन्त आशुकारिणो वर्त्तन्ते तान् पवित्राञ्जितेन्द्रियान् धार्मिकान् विद्यार्थिन सततं सत्यमुपदिशत ॥१॥

    भावार्थ -

    भावार्थ - हे अध्यापक व उपदेशकांनो ! जे तुमच्या सुखासाठी प्रयत्नशील, पुरुषार्थी, प्रिय व गतिमान असतात त्या पवित्र जितेंद्रिय, धार्मिक विद्यार्थ्यांना सतत सत्याचा उपदेश करा. ॥ १ ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top