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ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 32/ मन्त्र 1
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - इन्द्र: छन्दः - विराड्बृहती स्वरः - मध्यमः

    मो षु त्वा॑ वा॒घत॑श्च॒नारे अ॒स्मन्नि री॑रमन्। आ॒रात्ता॑च्चित्सध॒मादं॑ न॒ आ ग॑ही॒ह वा॒ सन्नुप॑ श्रुधि ॥१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मो इति॑ । सु । त्वा॒ । वा॒घतः॑ । च॒न । आ॒रे । अ॒स्मत् । नि । री॒र॒म॒न् । आ॒रात्ता॑त् । चि॒त् । स॒ध॒ऽमाद॑म् । नः॒ । आ । ग॒हि॒ । इ॒ह । वा॒ । सन् । उप॑ । श्रु॒धि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मो षु त्वा वाघतश्चनारे अस्मन्नि रीरमन्। आरात्ताच्चित्सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि ॥१॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मो इति। सु। त्वा। वाघतः। चन। आरे। अस्मत्। नि। रीरमन्। आरात्तात्। चित्। सधऽमादम्। नः। आ। गहि। इह। वा। सन्। उप। श्रुधि ॥१॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 32; मन्त्र » 1
    अष्टक » 5; अध्याय » 3; वर्ग » 17; मन्त्र » 1
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ के दूरे समीपे च रक्षणीया इत्याह ॥

    अन्वयः

    हे विद्वन् राजन् ! वाघतस्तवारे चनाप्यस्मदारे मो सुरीरमन्। सततं तवारे सन्तस्त्वा रमयन्तु। आरात्ताच्चित्वं नः सधमादमा गहीह वा प्रसन्नः सन्नस्माकं वचांसि न्युप श्रुधि ॥१॥

    पदार्थः

    (मो) निषेधे (सु) (त्वा) त्वाम् (वाघतः) मेधाविनः। वाघत इति मेधाविनाम। (निघं०३.१५)(चन) अपि (आरे) समीपे दूरे वा (अस्मत्) (नि) (रीरमन्) रमन्ताम् (आरात्तात्) दूरे (चित्) अपि (सधमादम्) यत्र सह माद्यन्त्यानन्दन्ति तम् (नः) अस्माकम् (आ) (गहि) आगच्छ प्राप्नुहि वा (इह) (वा) (सन्) (उप) (श्रुधि) ॥१॥

    भावार्थः

    येषां मनुष्याणां समीपे मेधाविनो धार्मिका विद्वांसो वसन्ति दुष्टांश्च दूरे तिष्ठन्ति ते सदैव सुखं लभन्ते ॥१॥

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    हिन्दी (2)

    विषय

    अब सत्ताईस ऋचावाले बत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में कौन दूर और समीप में रक्षा करने योग्य होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे विद्वान् राजा ! (वाघतः) मेधावी जन आपके (आरे) दूर (चन) और (अस्मत्) हम से दूर (मो, सु, रीरमन्) मत रमें। निरन्तर आपके समीप होते हुए (त्वा) आपको रमावें। (आरात्तात्) दूर में (चित्) भी आप (नः) हमारे (सधमादम्) उस स्थान को कि जिसमें एक साथ आनन्द करते हैं (आ, गहि) आओ (इह, वा) यहाँ प्रसन्न (सन्) होते हुए हमारे वचनों को (नि, उप, श्रुधि) समीप में सुनो ॥१॥

    भावार्थ

    जिन मनुष्यों के समीप बुद्धिमान् धार्मिक, विद्वान्जन और दूर में दुष्ट जन हैं, वे सदैव सुख पाते हैं ॥१॥

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    विषय

    राजा के कर्तव्य । वह विषयविलास में रत न होकर प्रजा के सुखों में सुखी रहे ।

    भावार्थ

    हे राजन् ! ( वाघतः ) विद्वान् लोग भी ( अस्मत् आरे ) हम से दूर ( त्वा मो सु निरीरमन् ) तुझे आनन्द विनोद में न रमने दें । ( आरात्तात् चित् ) दूर रहता हुआ भी तू ( नः सधमादं आ गहि ) हमारे साथ आनन्द हर्ष करने के निमित्त प्राप्त हो । ( इह वा) और इस राष्ट्र वा जगत् में ( सन् ) रहकर (नः उप श्रुधि) हमारे वचन श्रवण कर ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसिष्ठः । २६ वसिष्ठः शक्तिर्वा ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ।। छन्दः – १, ४, २४ विराड् बृहती । ६, ८,१२,१६,१८,२६ निचृद् बृहती । ११, २७ बृहती । १७, २५ भुरिग्बृहती २१ स्वराड् बृहती । २, ६ पंक्तिः । ५, १३,१५,१६,२३ निचृत्पांक्ति: । ३ साम्नी पंक्तिः । ७ विराट् पंक्तिः । १०, १४ भुरिगनुष्टुप् । २०, २२ स्वराडनुष्टुप्॥ सप्तविंशत्यूचं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    विषय

    या सूक्तात इंद्र, मेधावी, धन, विद्येची कामना करणारे, रक्षक, राजा, ईश्वर, जीव, धनसंचय, ईश्वर व नौकानयन करणाऱ्यांच्या गुण कर्माचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

    भावार्थ

    ज्या माणसांजवळ बुद्धिमान, धार्मिक, विद्वान लोक असतात व दुष्ट लोक दूर असतात ती सदैव सुखी असतात. ॥ १ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Let not your worshippers be far away from us, nor let them detain you. Come to our house of celebration from the farthest distance even, and when you are here, listen to our songs of celebration and divine adoration.

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