ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 64 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 64/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वसिष्ठः देवता - मित्रावरुणौ छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    (दिवि, क्षयन्ता) द्युलोक में क्षमता रखनेवाले (पृथिव्याम्) पृथिवीलोक में क्षमता रखनेवाले (रजसः) राजस भावों के जाननेवाले अध्यापक तथा उपदेशक राजा तथा प्रजा को सदुपदेशों द्वारा सुशिक्षित करें और (प्र, वां) उन अध्यापक तथा उपदेशकों के लिए प्रजा तथा राजा लोग (घृतस्य, निर्णिजः) प्रेमभाव का (ददीरन्) दान दें और (नः) हमारे (हव्यम्) राजसूय यज्ञ को (मित्रः) सब के मित्र (अर्य्यमा) न्यायशील (सुजातः) कुलीन (सुक्षत्रः) क्षात्रधर्म के जाननेवाले (वरुणः) सब को आश्रयण करने योग्य राजा लोग (जुषन्त) सेवन करें ॥१॥

    भावार्थ -

    परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यो ! तुम द्युलोक तथा पृथिवीलोक की विद्या जाननेवाले अध्यापक तथा उपदेशकों में प्रेमभाव धारण करो और राजसूय यज्ञ के रचयिता जो क्षत्रिय लोग हैं, उनका प्रीति से सेवन करो, ताकि तुम्हारे राजा का पृथिवी तथा द्युलोक के मध्य में सर्वत्र ऐश्वर्य विस्तृत हो, जिससे तुम सांसारिक अभ्युदय को प्राप्त होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो अर्थात् जो सब का मित्र न्यायकारी कुलीन और जो डाकू चोर तथा अन्यायकारियों के दुःखों से छुड़ानेवाला हो, ऐसे राजा की प्रेमलता को अपने स्नेह से सिञ्चन करो ॥१॥

    पदार्थ -

    परमात्मोपदिशति हे अध्यापकोपदेशकौ (दिवि क्षयन्ता) द्युलोकस्य स्वामिनौ भवन्तौ (पृथिव्याम्) पृथिवीलोके (रजसः) पदार्थविद्याया वेत्तारौ भवन्तौ (प्र, वां) युवाभ्यां प्रेरिता राजानः (घृतस्य) प्रेमभावस्य (निर्णिजः) स्नेहं (ददीरन्) प्रजाभ्यः प्रयच्छन्तु, अन्यच्च (नः) अस्माकं (हव्यम्) राजसूयाख्यं यज्ञं (मित्रः) सर्वप्रियः (अर्य्यमा) न्यायकारी (सुजातः) कुलीनः (राजा) दीप्तिमान् (सुक्षत्रः) क्षात्रधर्मवित् (वरुणः) वरणीयः एवंविधा राजानः राजसूयाख्यं यज्ञं (जुषन्त) सेवन्ताम् ॥१॥

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