ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 78 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 78/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वसिष्ठः देवता - उषाः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    हे परमात्मन् ! (अस्याः) आपकी इस महती शक्ति के (प्रथमाः) पहले (केतवः) अनेक हेतु (ऊर्ध्वाः) सबसे ऊँचे (प्रति) हमारे प्रति (अञ्जयः) प्रसिद्ध (अदृश्रन्) देखे जाते हैं अर्थात् हमें स्पष्ट दिखाई देते हैं, जो (विश्रयन्ते) विस्तारपूर्वक फैले हुए हैं। (उषः) हे ज्योतिस्वरूप भगवन् ! (अर्वाचा) आप हमारे सम्मुख आयें अर्थात् हमें अपने दर्शन का पात्र बनायें और (ज्योतिष्मता) अपने तेजस्वी (बृहता) बड़े (रथेन) ज्ञान से (अस्मभ्यं) हमको (वामं) ज्ञानरूप धन (वक्षि) प्रदान करें ॥१॥

    भावार्थ -

    जब इस संसार में दृष्टि फैलाकर देखते हैं, तो सबसे पहले परमात्मस्वरूप को बोधन करनेवाले अनन्त हेतु इस संसार में हमारे दृष्टिगत होते हैं, जो सब से उच्च परमात्मस्वरूप को दर्शा रहे हैं, जैसा कि संसार की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और यह अद्भुत रचना आदि चिह्नों से स्पष्टतया परमात्मा के स्वरूप का बोधन होता है। हे सर्वशक्तिसम्पन्न भगवन् ! आप अपने बड़े तेजस्वी स्वरूप का हमें ज्ञान करायें, जिससे हम अपने आपको पवित्र करें ॥१॥

    पदार्थ -

    हे परमात्मन् ! (अस्याः) अस्या भवदीयमहाशक्तेः (प्रथमाः) आद्याः (केतवः) अनेकहेतवः (ऊर्ध्वाः) अत्युच्चाः (प्रति) मां प्रति (अञ्जयः) प्रसिद्धाः (अदृश्रन्) दृश्यन्ते अर्थान्मया सुस्पष्टा दृश्यन्ते ये (वि श्रयन्ते) विस्तीर्य प्रसृताः (उषः) हे ज्योतिःस्वरूपभगवन् ! (अर्वाचा) भवान् मत्सम्मुखो भवतु अर्थान्मां स्वदर्शनपात्रं विदधातु (ज्योतिष्मता) तथा च स्वतेजस्विना (बृहता) महता (रथेन) ज्ञानेन (अस्मभ्यम्) अस्मभ्यं (वामम्) ज्ञानात्मकधनं (वक्षि) ब्रवीतु–प्रददातु ॥१॥

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