ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 83 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 83/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वसिष्ठः देवता - इन्द्रावरुणौ छन्दः - विराड्जगती स्वरः - निषादः
    पदार्थ -

    (इन्द्रावरुणा) हे शूरवीर योद्धाओ ! (युवां) तुम (आप्यं) सबको प्राप्त होने योग्य अर्थात् सबके रक्षक हो (पश्यमानासः) तुम्हारी वीरता देखकर (पृथुपर्शवः) सब ओर से हष्ट-पुष्ट वीर (नरा) मनुष्य (गव्यन्तः) अपना आत्मसमर्पण करते हुए (यजुः) तुम्हें प्राप्त होते हैं (च) और (प्राचा, दासा) प्राचीन सेवक (च) और (आर्याणि) आर्य्य पुरुष भी तुम्हारी शरण चाहते हैं, तुम (वृत्रा, हतं) शत्रुओं का हनन करके (अवसा) रक्षा करते हुए (अवतं, सुदासं) दयावान् राजा को प्राप्त हो ॥१॥

    भावार्थ -

    परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे शूरवीर विद्वानों ! तुम दास=शूद्र और आर्य्य=कर्मानुष्ठानपरायण पुरुषों की रक्षा करो, तुम इनके शत्रुओं का हनन करके इन्हें अभयदान दो, क्योंकि इनके होने से प्रजाजन वैदिक मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करते, सब अपनी मर्यादा में रह कर धर्म का पालन करते हैं और हृष्ट-पुष्ट शूरवीर तुम्हें प्राप्त होकर युद्ध द्वारा आत्मसमर्पण करते हुए तुम्हारे उत्साह को बढ़ाते हैं, इसलिए इन्हें भी सुरक्षित रखो, क्योंकि शूरवीरों के अभाव से भी प्रजा में अनेक प्रकार के अनर्थ फैल जाते हैं, जिससे मनुष्यों के जीवन में पवित्रता नहीं रहती ॥१॥

    पदार्थ -

    (इन्द्रावरुणा) भो शूरा योद्धारः ! (युवाम्) यूयं (आप्यम्) सर्वेषां सुलभा अर्थात् रक्षका भवत (पश्यमानासः) युष्मद्वीरतां प्रेक्षमाणाः (पृथुपर्शवः) सर्वतः पुष्टशरीराः (नरा) जनाः (गव्यन्तः) स्वं स्वमात्मानं समर्पयन्तः (ययुः) युष्मान् प्राप्नुवन्ति (च) तथा च (प्राचा, दासा) प्राचीनसेवकाः (च) तथा (आर्याणि) आर्यजनाश्च युष्मान् शरणमन्विच्छन्ति (वृत्रा, हतम्) यूयं शत्रूनपनीय (अवसा) रक्षन्तः (अवतम्, सुदासम्) दयालुं नृपं प्राप्नुत ॥१॥

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