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ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 87 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 87/ मन्त्र 3
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - वरुणः छन्दः - आर्षीत्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    परि॒ स्पशो॒ वरु॑णस्य॒ स्मदि॑ष्टा उ॒भे प॑श्यन्ति॒ रोद॑सी सु॒मेके॑ । ऋ॒तावा॑नः क॒वयो॑ य॒ज्ञधी॑रा॒: प्रचे॑तसो॒ य इ॒षय॑न्त॒ मन्म॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    परि॑ । स्पशः॑ । वरु॑णस्य । स्मत्ऽइ॑ष्टाः । उ॒भे इति॑ । प॒श्य॒न्ति॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । सु॒मेके॒ इति॑ सु॒ऽमेके॑ । ऋ॒तऽवा॑नः । क॒वयः॑ । य॒ज्ञऽधी॑राः । प्रऽचे॑तसः । ये । इ॒षय॑न्त । मन्म॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परि स्पशो वरुणस्य स्मदिष्टा उभे पश्यन्ति रोदसी सुमेके । ऋतावानः कवयो यज्ञधीरा: प्रचेतसो य इषयन्त मन्म ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परि । स्पशः । वरुणस्य । स्मत्ऽइष्टाः । उभे इति । पश्यन्ति । रोदसी इति । सुमेके इति सुऽमेके । ऋतऽवानः । कवयः । यज्ञऽधीराः । प्रऽचेतसः । ये । इषयन्त । मन्म ॥ ७.८७.३

    ऋग्वेद - मण्डल » 7; सूक्त » 87; मन्त्र » 3
    अष्टक » 5; अध्याय » 6; वर्ग » 9; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (ये) ये जनाः (ऋतावानः) सत्यवादिनः (यज्ञधीराः) कर्मकाण्डिनः (प्रचेतसः) मेधाविनः (कवयः) विद्वांसः (मन्म, इषयन्त) परमात्मानं स्तुवन्ति, तान् (उभे, रोदसी) द्यावापृथिव्यावेते  उभे (पश्यन्ति) ईक्षेते, ये हि (सुमेके, परि) दृष्टिसुखदे दिव्यचक्षुत्वात् (वरुणस्य) ईश्वरस्य (स्मदिष्टाः) प्रशंसनीये (स्पशः) दूतिके स्तः ॥३॥

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    हिन्दी (2)

    पदार्थ

    (ये) जो (ऋतावानः) सत्यवादी (यज्ञधीराः) कर्मकाण्डी (प्रचेतसः) मेधावी (कवयः) विद्वान् (मन्म, इषयन्त) ईश्वर की स्तुति करते हैं, जो उनको (उभे, रोदसी) द्युलोक तथा पृथिवीलोक दोनों (पश्यन्ति) देखते हैं, जो (सुमेके, परि) देखने में सर्वोपरि सुन्दर अर्थात् दिव्यदृष्टिवाले होने से (वरुणस्य) परमात्मा के (स्मदिष्टाः) प्रशंसनीय (स्पशः) दूत हैं ॥३॥

    भावार्थ

    जो पुरुष परमात्मपरायण होते हैं, उनका यश पृथिवी तथा द्युलोक के मध्य में फैल जाता, इसी अभिप्राय से उक्त लोकों को साक्षीरूप से वर्णन किया है। लोकों का देखना यहाँ उपचार से वर्णन किया गया है, वास्तविक नहीं, क्योंकि वास्तव में देखने तथा साक्षी देने का धर्म पृथिवी तथा द्युलोक में न होने से तत्रस्थ मनुष्यों की लक्षणा कर लेनी चाहिए। पृथिवी तथा द्युलोक के मध्य में सब प्राणीवर्ग उन मनुष्यों की साक्षी देते हैं, जो सदाचारी तथा ईश्वरपरायण होते हैं अर्थात् वे कभी छिप नहीं सकते, इसलिए प्रत्येक पुरुष को उचित है कि वह ईश्वरपरायण होकर संसार में अपना यश विस्तृत करे ॥३॥

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    विषय

    परमेश्वर का व्यवस्थित शासन ।

    भावार्थ

    ( वरुणस्य स्पशः स्मदिष्टाः ) जिस प्रकार दुष्टों के निवारक राजा के 'स्पश्' – गुप्तचर सिपाही उत्तम अभिप्रायवान् होकर ( उभे सु-मेके पश्यन्ति ) ऊपर से देखने में अच्छे दोनों ही प्रकार के अच्छे और बुरे शास्य शासक वर्गों को देखते हैं इसी प्रकार ( ये ) जो ( प्र-चेतसः ) उत्तम चित्त वाले, उत्तम ज्ञानवान् पुरुष ( मन्म ) मनन करने योग्य ज्ञान की ( इषयन्त ) अन्नवत् चाहना करते और औरों को अन्नवत् प्रदान करना चाहते हैं वे (ऋतावानः ) सत्य ज्ञानमय वा वेदमय तप का सेवन करते हुए, ( यज्ञ-धीराः ) यज्ञ, त्यागयुक्त कर्म को करते और उसका अन्यों को उपदेश करते हुए वा, 'यज्ञ', परमोपास्य प्रभु की ओर अपनी बुद्धि और मन को प्रेरते और उसी को सर्वात्मना धारण करते हुए, (वरुणस्य स्पशः ) उस प्रभु के मानो सिपाहियों के समान उसकी बनाई सृष्टि और उसके नियम व्यवस्थाओं का साक्षात् करने वाले, वा उस प्रभु का सदा हुक्म बजाने में तत्पर प्रभु के सेवक, ( स्मदिष्टाः ) उत्तम आचारवान्, एक साथ समान इष्ट, याग वा समान एक साथ उत्तम लक्ष्य रख कर कार्य करने वाले होकर ( उभे ) दोनों इन ( सु-मेके ) सुखप्रद मेघादि युक्त ( रोदसी ) सूर्य और भूमि के समान ( सुमेके ) शुभ वीर्यसेचन में समर्थ उत्तम सन्तानोत्पादक माता पिता को ही सृष्टि का कारण यथावत् ( परि पश्यन्ति ) देखते हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसिष्ठ ऋषिः। वरुणो देवता॥ छन्द:– १ विराट् त्रिष्टुप् । २, ३, ५ आर्षी त्रिष्टुप्। ४, ६, ७ त्रिष्टुप्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Currents of cosmic intelligence which are observant forces of Varuna appointed to their task, together watch both heaven and earth and they also observe and inspire to thought and imaginative creation, poets, intellectuals and devotees constantly dedicated to yajna all of whom observe the laws of eternal truth and Dharma and celebrate the divinity of Varuna.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जे पुरुष परमात्मपरायण असतात त्यांचे यश पृथ्वी व द्युलोकामध्ये पसरते. याच अभिप्रायाने वरील लोकांचे साक्षीरूपाने वर्णन केलेले आहे. लोकांचे पाहणे येथे उपचाराने वर्णित आहे. वास्तविक नाही. कारण वास्तविक पाहणे व साक्ष देणे हा धर्म पृथ्वी व द्युलोकात नसल्यामुळे तेथे माणसांची लक्षणा केली पाहिजे. पृथ्वी व द्युलोकात सर्व प्राणिवर्ग त्या माणसांची साक्ष देतात जे सदाचारी व ईश्वरपरायण असतात. अर्थात, ते कधी लपू शकत नाहीत. त्यासाठी प्रत्येक पुरुषाने ईश्वर परायण बनून जगात आपले यश पसरवावे. ॥३॥

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