ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 40 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 40/ मन्त्र 1
    ऋषि: - नाभाकः काण्वः देवता - इन्द्राग्नी छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    (यः+अग्निः+सप्तमानुषः) जो सर्वाधार परमात्मा सप्तमनुष्यों का ईश्वर है (विश्वेषु+समुद्रेषु) निखिल नदियों समुद्रों, और आकाशों में (श्रितः) व्यापक है, (तम्+अग्निम्+आगन्म) उसको हम उपासकगण प्राप्त होवें। जो पुनः (त्रिपस्त्यम्) तीनों लोकों में स्थित है (मन्धातुः) और जो उपासकों के (दस्युहन्तमम्) निखिल विघ्नों का हननकर्त्ता है और (अग्निम्) सर्वाधार है और (यज्ञेषु+पूर्व्यम्) यज्ञों में प्रथम पूजनीय और परिपूर्ण है ॥८॥

    भावार्थ -

    सप्तमानुष=दो नयन, दो कर्ण, दो घ्राण और एक रसना ये ही सप्त मनुष्य हैं। अथवा पृथिवी पर सात प्रकार के मनुष्यवंश। त्रिपस्त्यं=पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक ये ही तीन लोक वा तीन गृह वा तीन स्थान हैं, अतः इनका शासक व्यापक जगदीश परमपूज्य है ॥८॥

    पदार्थ -

    योऽग्निः=य ईश्वरः। सप्तमानुषः=सप्तमानवेश्वरः। यश्च विश्वेषु=सर्वेषु। सिन्धुषु=नदीषु=समुद्रेषु आकाशेषु च। श्रितः=व्यापकोऽस्ति। तमग्निम्। वयमुपासकाः। आगन्म=प्राप्नुयाम। कीदृशम्। त्रिपस्त्यम्=त्रिषु लोकेषु स्थितम्। मन्धातुः=मान्धातुः=मामीश्वरं दधातीति मन्धाता=ईश्वरोपासकस्तस्य। दस्युहन्तमम्= दस्यूनामतिशयेन हन्तारम्। यज्ञेषु पूर्व्यम्=प्रथमं पूजनीयम्। शेषं पूर्ववत् ॥८॥

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