ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 42 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 42/ मन्त्र 1
    ऋषि: - नाभाकः काण्वः देवता - वरुणः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    पुनः वरुण का वर्णन करते हैं, (सः) वह वरुण (समुद्रः) समुद्र है अर्थात् जिससे समस्त प्राणी उत्पन्न हों, वह समुद्र। यद्यपि सकल जगद्योगि वह है, तथापि प्रत्यक्ष नहीं, किन्तु (अपीच्यः) सबके मध्य में स्थित है, पुनः (तुरः) सर्व सूर्य्यादि देवों से शीघ्रगामी है पुनः (द्याम्+इव) जैसे सूर्य आकाश में क्रमशः चढ़ता है, तद्वत् वह सबके हृदय में आरूढ़ है। (यद्) जो वरुण (आसु) इन प्रजाओं में (यजुः) दान (नि+दधे) देता है और (सः) वह (मायाः) दुष्टों की कपटताओं को (अर्चिना) ज्वालायुक्त (पदा) पद से (अस्तृणात्) नष्ट कर देता है। वह भगवान् (नाकम्) सुखमय स्थान में (आरुहत्) रहता है ॥८॥

    भावार्थ -

    जिस कारण वह कपटता नहीं चाहता, अतः निष्कपट होकर उसकी उपासना करो और उसको अपने-२ हृदय में देखो ॥८॥

    पदार्थ -

    स वरुणः। समुद्रोऽस्ति=यस्मात् समभिद्रवन्ति भूतानि। तथापि सः। अपीच्यः=सर्वेषां पदार्थानामन्तर्हितोऽस्ति। पुनः। तुरः सर्वेभ्यः शीघ्रतरगामी। सूर्य्या द्यामिव। स सर्वत्र। रोहति। यद्=यश्च पुनः। आसु=प्रजासु। यजुर्दानम्। निदधे। पुनः। सः। माया दुष्टानां कापटानि। अर्चिना=अर्चिष्मता तेजस्विना। पदा=चरणेन। अस्तृणात्=हिनस्ति। स नाकं सुखमयस्थानम्। आरुहत्=प्राप्तोऽस्ति। व्याख्यातमन्यत् ॥८॥

    Meanings -

    Varuna, lord of light and energy, omniscient and omnipotent ruler of the universe, makes and sustains the heaven of light and the wide earth. The glorious lord and ruler rules all regions of the universe and they all observe the laws of Varuna, infinite they are, beyond description.

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