ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 81 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 81/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कुसीदी काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    आ तू न॑ इन्द्र क्षु॒मन्तं॑ चि॒त्रं ग्रा॒भं सं गृ॑भाय । म॒हा॒ह॒स्ती दक्षि॑णेन ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । तु । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । क्षु॒ऽमन्त॑म् । चि॒त्रम् । ग्रा॒भम् । सम् । गृ॒भ॒य॒ । म॒हा॒ऽह॒स्ती । दक्षि॑णेन ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ तू न इन्द्र क्षुमन्तं चित्रं ग्राभं सं गृभाय । महाहस्ती दक्षिणेन ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । तु । नः । इन्द्र । क्षुऽमन्तम् । चित्रम् । ग्राभम् । सम् । गृभय । महाऽहस्ती । दक्षिणेन ॥ ८.८१.१

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 81; मन्त्र » 1
    अष्टक » 6; अध्याय » 5; वर्ग » 37; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    हे भगवन् ! आपकी कृपा से हम लोगों को (अवद्ये) निन्दा, अपयश, ईर्ष्या आदि दुर्गुण (सीम्) किसी प्रकार (मा+भाक्) प्राप्त न हों, (काष्ठा) जीवन की अन्तिम दशा (उर्वी) बहुत विस्तीर्ण है अर्थात् जीवन के दिन अभी बहुत हैं, अतः हम लोगों को कोई अपकीर्ति प्राप्त न हो। हे ईश ! (धनं+हितम्) आपने इस जगत् में बहुत धन स्थापित किया है, (अरत्नयः) जगत् के असुखकारी जन (अपावृक्ता) जन-समाज से पृथक् होवें ॥८॥

    भावार्थ -
    प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि किसी स्वार्थवश किसी की निन्दा वा स्तुति न करे, अन्यथा संसार में अनेक अशान्तियाँ फैलती हैं ॥८॥

    पदार्थः -
    हे भगवन् ! तव कृपया। अस्मान्। अवद्ये=अवद्या=निन्दा। सीम्=सर्वतः। मा भाक्। काष्ठा=अन्तिमा दशा। उर्वी=विस्तृता। धनं=सर्वत्र। हितं=निहितम्। अरत्नयः=अरममाणाः शत्रवः। अपावृक्ता अस्मत्तः पृथग्भूता भवन्तु ॥८॥

    Meaning -
    Lord of mighty arms, Indra, gather by your expert right hand abundant riches for us which may be full of nourishment, energy, wonderful beauty and grace worth having as a prize possession.

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