Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 82 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 82/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कुसीदी काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    आ प्र द्र॑व परा॒वतो॑ऽर्वा॒वत॑श्च वृत्रहन् । मध्व॒: प्रति॒ प्रभ॑र्मणि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । प्र । द्र॒व॒ । प॒रा॒ऽवतः॑ । अ॒र्वा॒ऽवतः॑ । च॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । मध्वः॑ । प्रति॑ । प्रऽभ॑र्मणि ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ प्र द्रव परावतोऽर्वावतश्च वृत्रहन् । मध्व: प्रति प्रभर्मणि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । प्र । द्रव । पराऽवतः । अर्वाऽवतः । च । वृत्रऽहन् । मध्वः । प्रति । प्रऽभर्मणि ॥ ८.८२.१

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 82; मन्त्र » 1
    अष्टक » 6; अध्याय » 6; वर्ग » 1; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (वृत्रहन्) कार्यसिद्धि में आने वाले विघ्नों के विध्वंसक उपासक! (प्रभर्मणि) पुष्टि व सहायता अनुकूलता--अनुग्रह आदि के लिये (परावतः) दूर से (च) और (अर्वावतः) समीप से भी (मध्वः प्रति) आत्मा की ओर, अपने आत्मतत्त्व की ओर (आ प्र द्रव) दौड़ आ॥१॥ (आत्मा वै पुरुषस्य मधु-तै० सं० २-३-२-९)

    भावार्थ - जीवन में सब भाँति ऐश्वर्य प्राप्ति हेतु आवश्यक है कि साधक अपनी आत्मा को एक क्षणभर के लिये न भूले; आत्मतत्त्व को उसके यथार्थस्वरूप में जाने। इस साधना के बाधक कारणों को सदा नष्ट करे॥१॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    O destroyer of darkness, evil and ignorance, come rushing without delay, whether you are far or near, and join us in this vibrant yajnic economy of the divine order. (O man in search of the soul, rush in from roaming around and join the living systemic world within at the vibrant centre.)


    Bhashya Acknowledgment

    भावार्थ - जीवनात सर्व प्रकारच्या ऐश्वर्याच्या प्राप्तीसाठी हे आवश्यक आहे, की साधकाने आपल्या आत्म्याला एक क्षणही विसरू नये. आत्मतत्त्वाला त्याच्या यथार्थ स्वरूपामध्ये जाणावे व या साधनेच्या बाधक कारणांना सदैव नष्ट करावे. ॥१॥


    Bhashya Acknowledgment
    Top