ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 82 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 82/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कुसीदी काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    (उप+क्रमस्व) हे भगवन् ! सबके हृदय में विराजमान होओ (धृष्णो) हे निखिल विघ्नविनाशक ! (धृषता) परमोदार चित्त से (जनानाम्) मनुष्यों के हृदय को (आ+भर) पूर्ण कर, (अदाशूष्टरस्य) जो कभी दान प्रदान नहीं करता, उसके (वेदः) धन को छिन्न-भिन्न कर दे ॥७॥

    भावार्थ -

    धनसम्पन्न रहने पर भी जो असमर्थों को नहीं देता, उसका धन नष्ट हो जाय ॥७॥

    पदार्थ -

    हे इन्द्र ! उप+क्रमस्व=सर्वत्र विराजस्व। हे धृष्णो=विघ्नविनाशक ! धृषतः=परमोदारेण चेतसा। जनानाम्=चेतांसि आभर। अदाशूष्टरस्य=अत्यन्तम्= अत्यन्तमदातृतमस्य। वेदो धनं सं हरेति शेषः ॥७॥

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