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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 12 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 12/ मन्त्र 6
    ऋषि: - असितः काश्यपो देवलो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    प्र वाच॒मिन्दु॑रिष्यति समु॒द्रस्याधि॑ वि॒ष्टपि॑ । जिन्व॒न्कोशं॑ मधु॒श्चुत॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । वाच॑म् । इन्दुः॑ । इ॒ष्य॒ति॒ । स॒मु॒द्रस्य॑ । अधि॑ । वि॒ष्टपि॑ । जिन्व॑न् । कोश॑म् । म॒धु॒ऽश्चुत॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र वाचमिन्दुरिष्यति समुद्रस्याधि विष्टपि । जिन्वन्कोशं मधुश्चुतम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । वाचम् । इन्दुः । इष्यति । समुद्रस्य । अधि । विष्टपि । जिन्वन् । कोशम् । मधुऽश्चुतम् ॥ ९.१२.६

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 12; मन्त्र » 6
    अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 39; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (समुद्रस्य अधि विष्टपि) “समुद्रवन्ति यस्मादापः स समुद्रः” जो परमात्मा अन्तरिक्षलोक के मध्य में (मधुश्चुतम् कोशम्) सब प्रकार की मधुरताओं के सिञ्चन करनेवाले कोश को (जिन्वति) बढ़ाता है, (इन्दुः) वही परमैश्वर्यसम्पन्न परमात्मा (वाचम् प्र इष्यति) वेदवाणी की प्रेरणा करता है ॥६॥

    भावार्थ - परमात्मा के नियम से समुद्र अर्थात् अन्तरिक्ष में जलों का सञ्चय रहता है, क्योंकि समुद्र के अर्थ ये हैं, जिस में जलों का भली-भाँति सञ्चार हो अर्थात् इतस्ततः गमन हो, उसको समुद्र कहते हैं। अन्तरिक्षलोक में मेघों का इतस्ततः गमन होता है, इसलिये मुख्य नाम समुद्र इन्हीं का है। तात्पर्य ये है कि जिस परमात्मा ने इन विशाल नियमों को बनाया है, उसी परमात्मा ने वेदरूपी वाणी को प्रकट किया है ॥६॥


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    पदार्थः -
    (समुद्रस्य अधि विष्टपि) यः परमात्मा अन्तरिक्षमध्ये (मधुश्चुतम् कोशम्) सर्वविधमधुरताया वर्षितारं कोशं (जिन्वति) वर्धयति (इन्दुः) परमैश्वर्यवान् स एव (वाचम् प्र इष्यति) वेदवाणीः प्रेरयति ॥६॥


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    Meaning -
    Soma, self-refulgent lord of bliss who pervades unto the bounds of space, augments the treasure-hold of the honey sweets of nature, inspires the holy minds, and the voice of divinity overflows in poetry and ecstasy.


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    भावार्थ - परमेश्वराच्या नियमानुसार समुद्र अर्थात अंतरिक्षात जलाचा संचय असतो, समुद्राचा अर्थ असा की ज्यात चांगल्या प्रकारे जलाचा संचार व्हावा. इकडे तिकडे गमन व्हावे त्यास समुद्र म्हणतात. अंतरिक्षात मेघांचे इकडे तिकडे गमन होते त्यासाठी मुख्यत्वे त्यांचे नाव समुद्र आहे. तात्पर्य हे आहे की ज्या परमात्म्याने या विशाल नियमांना बनविलेले आहे त्याच परमात्म्याने वेदरूपी वाणी प्रकट केलेली आहे. ॥६॥


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