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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 6 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 6/ मन्त्र 8
    ऋषि: - असितः काश्यपो देवलो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - विराड्गायत्री स्वरः - षड्जः

    आ॒त्मा य॒ज्ञस्य॒ रंह्या॑ सुष्वा॒णः प॑वते सु॒तः । प्र॒त्नं नि पा॑ति॒ काव्य॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ॒त्मा । य॒ज्ञस्य॑ । रंह्या॑ । सु॒स्वा॒णः । प॒व॒ते॒ । सु॒तः । प्र॒त्नम् । नि । पा॒ति॒ । काव्य॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आत्मा यज्ञस्य रंह्या सुष्वाणः पवते सुतः । प्रत्नं नि पाति काव्यम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आत्मा । यज्ञस्य । रंह्या । सुस्वाणः । पवते । सुतः । प्रत्नम् । नि । पाति । काव्यम् ॥ ९.६.८

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 6; मन्त्र » 8
    अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 27; मन्त्र » 3
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    पदार्थ -
    पूर्वोक्त परमात्मा (यज्ञस्य आत्मा) यज्ञ का आत्मा है (सुष्वाणः) सर्वप्रेरक और (सुतः) आनन्द का आविर्भावक (रंह्या) सर्वत्र गतिरूप से (पवते) पवित्र करता है, वही परमात्मा (प्रत्नं काव्यम्) प्राचीन काव्य की (निपाति) रक्षा करता है ॥

    भावार्थ - परमात्मा सब यज्ञों का आत्मा है अर्थात् ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, ध्यानयज्ञ, ज्ञानयज्ञ इत्यादि कोई यज्ञ भी उसकी सत्ता के विना नहीं हो सकता। इसी अभिप्राय से ब्रह्मज्ञान की कई पुस्तकों में परमात्मा को अधियज्ञरूप से वर्णन किया है। जो इस मन्त्र में काव्य शब्द आया है, वह ‘कवते इति कवि:’ इस व्युत्पत्ति से ज्ञानी का अभिधायक है और ‘कवेः कर्म काव्यम्’ इस प्रकार सर्वज्ञ परमात्मा की रचनारूप वेद का नाम यहाँ काव्य है, किसी आधुनिक काव्य का नहीं। तात्पर्य यह है कि वह अपने ज्ञानरूपी वेद-काव्य द्वारा उपदेश करके सृष्टि की रक्षा करता है ॥८॥


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    पदार्थः -
    पूर्वोक्तः परमात्मा (यज्ञस्य आत्मा) यज्ञस्य आत्माऽस्ति (सुष्वाणः) सर्वस्य प्रेरकः तथा (सुतः) आनन्दस्य आविर्भावयिता (रंह्या) सर्वत्र गत्या (पवते) पुनाति स एवं (प्रत्नं काव्यम्) प्राचीनं काव्यं (निपाति) निरन्तरं रक्षति ॥८॥


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    Meaning -
    The divine lord of joy and pure bliss, Soma, is the soul of yajna and, all inspiring creator of bliss, pervades and vibrates with power, fulfilling the seeker’s desire, and thus the lord protects and promotes the eternal beauty and poetry of life.


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    भावार्थ - परमात्मा सर्व यज्ञांचा आत्मा आहे. अर्थात ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, ध्यानयज्ञ, ज्ञानयज्ञ इत्यादी कोणताही यज्ञ त्याच्या सत्तेशिवाय होऊ शकत नाही. याच अभिप्रायाने ब्रह्मज्ञानाच्या कित्येक पुस्तकात परमात्म्याचे अधियज्ञाच्या रूपाने वर्णन केलेले आहे. जो या मंत्रात काव्य शब्द आलेला आहे तो ‘‘कवते इति कवि’’ या उत्पत्तीने ज्ञानीचा अभिधायक आहे व ‘‘कवे ; कर्म काव्यम्’’ या प्रमाणे सर्वज्ञ परमेश्वराच्या रचनारूपी वेदाचे नाव येथे काव्य आहे. एखादे आधुनिक काव्य नाही. तात्पर्य हे की तो आपल्या ज्ञानरूपी वेद काव्याद्वारे उपदेश करून सृष्टीचे रक्षण करतो ॥८॥


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