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यजुर्वेद अध्याय - 12

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  • यजुर्वेद - अध्याय 12/ मन्त्र 1
    ऋषिः - वत्सप्रीर्ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - भुरिक्पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः
    379

    दृ॒शा॒नो रु॒क्मऽउ॒र्व्या व्य॑द्यौद् दु॒र्मर्ष॒मायुः॑ श्रि॒ये रु॑चा॒नः। अ॒ग्निर॒मृतो॑ऽअभव॒द् वयो॑भि॒र्यदे॑नं॒ द्यौरज॑नयत् सु॒रेताः॑॥१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दृ॒शा॒नः। रु॒क्मः। उ॒र्व्या। वि। अ॒द्यौ॒त्। दु॒र्मर्ष॒मिति॑ दुः॒ऽमर्ष॑म्। आयुः॑। श्रि॒ये। रु॒चा॒नः। अ॒ग्निः। अ॒मृतः॑। अ॒भ॒व॒त्। वयो॑भि॒रिति॒ वयः॑ऽभिः। यत्। ए॒न॒म्। द्यौः। अज॑नयत्। सु॒रेता॒ इति॑ सु॒ऽरेताः॑ ॥१ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दृशानो रुक्म उर्व्या व्यद्यौद्दुर्मर्षमायुः श्रिये रुचानः । अग्निरमृतोऽअभवद्वयोभिर्यदेनन्द्यौर्जनयत्सुरेताः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    दृशानः। रुक्मः। उर्व्या। वि। अद्यौत्। दुर्मर्षमिति दुःऽमर्षम्। आयुः। श्रिये। रुचानः। अग्निः। अमृतः। अभवत्। वयोभिरिति वयःऽभिः। यत्। एनम्। द्यौः। अजनयत्। सुरेता इति सुऽरेताः॥१॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 12; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्रादौ विद्वद्गुणानाह॥

    अन्वयः

    हे मनुष्याः! यथा दृशानो द्यौरग्निः सूर्य उर्व्या सह सर्वान् मूर्तान् पदार्थान् व्यद्यौत्, तथा यः श्रिये रुचानो रुक्मो जनोऽभवद् यश्च सुरेता अमृतो दुर्मषमायुरजनयद् वयोभिः सह यदेनं विद्वांसमजनयत् तं यूयं सततं सेवध्वम्॥१॥

    पदार्थः

    (दृशानः) दर्शकः (रुक्मः) दीप्तिमान् (उर्व्या) महत्या पृथिव्या सह (वि) (अद्यौत्) द्योतयति (दुर्मर्षम्) दुःखेन मर्षितुं सोढ़ुं शीलम् (आयुः) अन्नम्। आयुरित्यन्ननामसु पठितम्॥ (निघं॰२.७) (श्रिये) शोभायै (रुचानः) रोचकः (अग्निः) कारणाख्यः पावकः (अमृतः) नाशरहितः (अभवत्) भवति (वयोभिः) यावज्जीवनैः (यत्) यम् (एनम्) (द्यौः) विज्ञानादिभिः प्रकाशमानः (अजनयत्) जनयति (सुरेताः) शोभनानि रेतांसि वीर्याणि यस्य सः। [अयं मन्त्रः शत॰६.७.२.१-२ व्याख्यातः]॥१॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथाऽस्मिन् जगति सूर्यादयः सर्वे पदार्थाः स्वदृष्टान्तैः परमेश्वरं निश्चाययन्ति, तथा मनुष्या अपि भवेयुः॥१॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब बारहवें अध्याय का आरम्भ किया जाता है, उस के प्रथम मन्त्र में विद्वानों के गुणों का उपदेश किया है॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो! जैसे (दृशानः) दिखलाने हारा (द्यौः) स्वयं प्रकाशस्वरूप (अग्निः) सूर्यरूप अग्नि (उर्व्या) अति स्थूल भूमि के साथ सब मूर्त्तिमान् पदार्थों को (व्यद्यौत्) विविध प्रकार से प्रकाशित करता है, वैसे जो (श्रिये) सौभाग्यलक्ष्मी के अर्थ (रुचानः) रुचिकर्त्ता (रुक्मः) सुशोभित जन (अभवत्) होता और (यत्) जो (सुरेताः) उत्तम वीर्ययुक्त (अमृतः) नाशरहित (दुर्मर्षम्) शत्रुओं के दुःख से निवारण के योग्य (आयुः) जीवन को (अजनयत्) प्रकट करता है, (वयोभिः) अवस्थाओं के साथ (एनम्) इस विद्वान् पुरुष को प्रकट करता हो, उसको तुम सदा निरन्तर सेवन करो॥१॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इस जगत् में सूर्य आदि सब पदार्थ अपने-अपने दृष्टान्त से परमेश्वर को निश्चय कराते हैं, वैसे ही मनुष्यों को होना चाहिये॥१॥

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    विषय

    द्यौः-सुरेताः

    पदार्थ

    १. पिछले अध्याय की समाप्ति पर उत्तम सात्त्विक अन्न के सेवन का उपदेश है। ‘उस अन्न के सेवन से मनुष्य का जीवन किस प्रकार उत्तम बनता है’ इस बात के प्रतिपादन से यह अध्याय प्रारम्भ होता है। अन्न बीज है और माता-पिता व आचार्य भूमि व खाद आदि हैं। जीवन-निर्माण में बीज का भी स्थान है और भूमि का भी। अन्न का वर्णन पिछले मन्त्र में हुआ है, प्रस्तुत मन्त्र में आचार्य के लिए ‘द्यौः और सुरेताः’—इन शब्दों का प्रयोग हुआ है। आचार्य प्रकाशमय जीवनवाला तथा उत्तम रेतस्वाला हो। ऐसा ही आचार्य विद्यार्थी के जीवन का विकास करता है। २. यह विकसित जीवनवाला ( दृशानः ) = सब वस्तुओं को ठीक रूप में देखता है, अतः यह संसार में उलझता नहीं। ३. ( रुक्मः ) = विषयों में न उलझनेवाला यह [ रुच दीप्तौ ] चमकता है। इसका स्वास्थ्य ठीक रहता है। यह स्वास्थ्य की चमक से चमकता है। ४. ( उर्व्या ) = विशालता से ( व्यद्यौत् ) = यह दीप्त होता है। इसका हृदय विशाल होता है। ५. ( आयुः ) = इसका जीवन ( दुर्मर्षम् ) = विषयों से न कुचला जाने योग्य होता है। ६. ( श्रिये रुचानः ) = श्री के लिए यह रुचिवाला होता है। यह प्रत्येक कार्य को शोभा से करता है। ७. ( अग्निः ) = यह निरन्तर प्रगतिशील होता है। ८. ( अमृतः अभवत् ) = यह अमृत होता है, रोग इसकी मृत्यु का कारण नहीं बनते। ( यत् ) = क्योंकि ( एनम् ) = इसे ( सुरेताः ) = उत्तम रेतस्वाला, अर्थात् बह्मचारी ( द्यौः ) = ज्योतिर्मय मस्तिष्कवाला आचार्य ( वयोभिः ) = उत्तम अन्नों से ( अजनयत् ) = विकसित करता है। आचार्य इस बात का बड़ा ध्यान रखता है कि उसके विद्यार्थी का अन्न सात्त्विक हो, जिससे उसकी वृत्ति भी सात्त्विक ही बने। ९. इस प्रकार उत्तम जीवनवाला यह ‘वत्सप्री’ कहलाता है। इसका जीवन वेदप्रतिपादित बातों को क्रियान्वित किये हुए है और पवित्र कर्मों से वह अपने पिता प्रभु को प्रीणित करनेवाला होता है।

    भावार्थ

    भावार्थ — हम उत्तम अन्न के सेवन से उत्तम जीवनवाले बनें।

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    विषय

    सूर्य समान राजा का वर्णन ।

    भावार्थ

    ( दृशान : ) साक्षात् स्वयं दीखता हुआ, और समस्त पदार्थों का दिखाने वाला स्वयंद्रष्टा, ( रुक्मः ) दीप्तिमान् ( उर्व्या ) बड़ी भारी कान्ति से या विशाल इस पृथ्वी सहित ( श्रिये ) अपने परम कान्ति से ( रुचानः ) प्रकाशित होता हुआ, सूर्य जिस प्रकार ( दुर्भर्षम् आयुः) अविनाशी, जीवन सामर्थ्य, अन्नादि को (व्यद्यौत्) विविध प्रकार से प्रकाशित करता है । उसी प्रकार ( दृशानः ) सर्व पदार्थों को विज्ञान द्वारा दर्शाने वाला, ( श्रिये रुचानः ) महान् लक्ष्मी की इच्छा करता हुआ, (रुक्मः) कान्तिमानू, तेजस्वी, ऐश्वर्यवान्, विद्वान् राजा (दुर्मर्षम्) शत्रुओं और बाधक कारणों से अपराजित जीवन को ( उर्व्या) इस विशाल पृथ्वी पर ( व्यद्यन् ) नाना तेजों से प्रकट करता है और अपना तेज दिखाता है । (अग्निः) अग्नि, दीप्तिमान् सूर्य जिस प्रकार ( वयोभिः ) अपनी शक्तियों, तेजों, किरणों से(अमृतः ) अमृत, अमर ( अभवत् ) है उसी प्रकार (अग्निः ) विद्वान ज्ञानी एवं अग्रणी के समान तेजस्वी राजा भी ( व्योभिः अमृतः अभवत् ) अपने ज्ञान-बलों से और अन्न द्वारा अपने वयोवृद्ध सहायकों से अमृत, अमर, अख- डित होकर रहता है । ( यत् ) क्योंकि ( एनं ) उस सूर्य को (सुरेताः ) उत्तम वीर्य वाला, समस्त ब्रह्माण्ड के उत्पादन सामर्थ्य से युक्त, ( द्यौः ) तेजोयुक्त, महान् हिरण्यगर्भ ( अजनयत् ) उत्पन्न करता है . इसी प्रकार ( एनं ) इस विद्वान् को और तेजस्वी राजा को भी ( सुरेताः द्यौः ) उत्कृष्ट वीर्यवान् तेजस्वी पिता और आचार्य ( अजनयत ) उत्पन्न करता है । पराक्रमी, तेजस्वी पुरुष को तेजस्वी पिता माता ही उत्पन्न करते हैं । शत० ६।७।२।१॥

    टिप्पणी

    अतः परंमुखाधारणम् ( १---४५ )

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वत्सप्रीर्ऋषिः । अग्निर्देवता । भुरिक् पंक्तिः । पञ्चमः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. या जगातील सूर्य इत्यादी पदार्थ परमेश्वराच्या अस्तित्वाची साक्ष देणारे असतात. ते निश्चयात्मक रीतीने जाणून माणसांनी त्यासंबंधी ज्ञान प्राप्त केले पाहिजे.

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    विषय

    आता बाराव्या अध्यायाच्या आरंभ होत आहे. त्याच्या प्रथम मंत्रात विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन केले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो (लोकहो) ज्याप्रमाणे (हृशान:) सर्व काही दाखविणारा (सर्व पदार्थांना पाहणे शक्य करणारा) आणि (द्यौ:) स्वयं प्रकाशमान हा सूर्य (उर्व्या) अतिविशाल भूमीबरोबरच त्यावरील सर्व पदार्थांना (व्यचौत्‌) अनेक प्रकारे प्रकाशित करतो, त्याप्रमाणे (श्रिये) (रुचान:) सौभाग्य आणि संपत्ती विषयी प्रेम निर्माण करणारा (रुक्म:) जो शोभायमान मनुष्य (अभवत्‌) आहे आणि जो (सुरेता:) उत्तम पराक्रमयुक्त, (अमृत:) नाशरहित आणि (दुर्मर्षम्‌) शत्रूंपासून होणाऱ्या दु:खापासून दूर असणारे (आयु:) जीवन (अजनयत्‌) आम्हांसाठी प्रकट करतो, (वयोभि:) सर्वदशांमधे (सनम्‌च्या) अशा विद्वानाच्या (पराक्रम, मोक्षदशा, दु:खनिवारक अशा पुरुषाच्या) संगतीत तुम्ही लोक सदैव रहा ॥1॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. ज्याप्रमाणे या जगात सूर्य आदी सर्व पदार्थ आपल्यासमोर आपल्यापरीने परमेश्‍वराच्या अस्तित्वाची जाणीव करून देतात, त्याप्रमाणे सर्व लोकांनीदेखील व्हायला हवे (आपल्यातील सद्गुण, विद्या आदींचा लाभ सर्व लोकांना करून दिले पाहिजे ॥1॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Just as the shining beaming sun, exhibits the diverse material objects on this vast solid earth, so does a man, desirous of wealth, extremely lovely, full of vitality, enjoy undaunted life, free from the injury of foes, in his long life, and beget this learned offspring.

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    Meaning

    Agni, Lord of Light, Light Itself, the Sun, explodes into light and illuminates the earth and reveals all the objects on the earth. The self-luminous lord, Himself the immortal seed of life, for His own glory and joy of the creatures, creates forms of indestructible life with foods as means and support of life. And He it is who creates the man of knowledge and vision (to show the divine path of life to others).

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    Translation

    Looking attractive, the fire divine shines on earth, slowing to bestow indomitable and glorious life. This fire divine, by his vital powers, has become immortal as the vigourful heaven has begot him. (1)

    Notes

    The sacrificer puts on his neck a circular piece of gold with twenty one knobs sewn in a black buck’s skin and hanging down to his navel in a hempen string of three strands. The gold piece is the symbol of the sun, which is Agni also. The twentyone knobs symbolize 12 months, six seasons and three worlds (bhümi, antariksa and dyauh). The mantra is from Rgveda, X. 45. 8. Uvata and Mahidhara have interpreted this mantra as praise of gold in the name of Agni or the sun. But it is distorting the meaning as the mantra is in the praise of Agni. Interpretation of Agni may be different by different commentators. Rukma, from रुच् दीप्तौ, to shine. That which shines or is radiant; gold; a certain ornament made of gold; a gold chain. Also, lustrous, radiant. Rucanah, attractive, beautiful. Durmarsam, दु:खेन मर्थितुं योग्यम्, difficult to oppose or dominate; indomitable. Vayobhih, by vital powers; वयोभिरन्नै:, with food. (Mahidhara). Interpretations of Uvata and Mahidhara tend to incline towards food and victuals, much desired by priests. Suretüh, vigourful; prolific; one with semen of good quality.

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    बंगाली (1)

    विषय

    ॥ ও৩ম্ ॥
    অথ দ্বাদশাऽধ্যায়ারম্ভঃ
    ও৩ম্ বিশ্বা॑নি দেব সবিতর্দুরি॒তানি॒ পরা॑ সুব । য়দ্ভ॒দ্রং তন্ন॒ऽআ সু॑ব ॥ য়জুঃ৩০.৩ ॥
    তত্রাদৌ বিদ্বদ্গুণানাহ ॥
    এখন দ্বাদশ অধ্যায়ের আরম্ভ করা হইতেছে । তাহার প্রথম মন্ত্রে বিদ্বান্দিগের গুণের উপদেশ করা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যেমন (দৃশানঃ) দর্শনীয় (দ্যৌঃ) স্বয়ং প্রকাশস্বরূপ (অগ্নিঃ) সূর্য্যরূপ অগ্নি (উর্ব্যা) অতি স্থূল ভূমি সহ সব মূর্ত্তিমান পদার্থসকলকে (ব্যদ্যৌৎ) বিবিধ প্রকারে প্রকাশিত করে সেইরূপ যে (শ্রিয়ে) (রুচানঃ) সৌভাগ্যলক্ষ্মীর অর্থ রুচিকর্ত্তা (রুক্মঃ) সুশোভিত জন (অভবৎ) হইয়া থাকে এবং (য়ৎ) যে (সুরেতাঃ) উত্তম বীর্য্যযুক্ত (অমৃতঃ) নাশরহিত (দুর্মর্ষম্) শত্রুদিগের দুঃখ হইতে নিবারণযোগ্য (আয়ুঃ) জীবনকে (অজনয়ৎ) প্রকট করে, (বয়োভিঃ) অবস্থা সহ (এনম্) এই বিদ্বান্ পুরুষকে প্রকট করে তাহাকে তুমি নিরন্তর সেবন কর ॥ ১ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যেমন এই জগতে সূর্য্যাদি সকল পদার্থ স্বীয় দৃষ্টান্ত দ্বারা পরমেশ্বরকে নিশ্চয় করায় সেইরূপই মনুষ্যদিগকে হইতে হইবে ॥ ১ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    দৃ॒শা॒নো রু॒ক্মऽউ॒র্ব্যা ব্য॑দ্যৌদ্ দু॒র্মর্ষ॒মায়ুঃ॑ শ্রি॒য়ে র॑ুচা॒নঃ ।
    অ॒গ্নির॒মৃতো॑ऽঅভব॒দ্ বয়ো॑ভি॒র্য়দে॑নং॒ দ্যৌরজ॑নয়ৎ সু॒রেতাঃ॑ ॥ ১ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    দৃশান ইত্যস্য বৎসপ্রীর্ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । ভুরিক্পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
    পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥

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