यजुर्वेद - अध्याय 30/ मन्त्र 18
ऋषि: - नारायण ऋषिः
देवता - राजेश्वरौ देवते
छन्दः - निचृत्प्रकृतिः
स्वरः - धैवतः
94
अ॒क्ष॒रा॒जाय॑ कित॒वं कृ॒ताया॑दिनवद॒र्शं त्रेता॑यै क॒ल्पिनं॑ द्वा॒परा॑याधिक॒ल्पिन॑मास्क॒न्दाय॑ सभास्था॒णुं मृ॒त्यवे॑ गोव्य॒च्छमन्त॑काय गोघा॒तं क्षु॒धे यो गां वि॑कृ॒न्तन्तं॒ भिक्ष॑माणऽउप॒ तिष्ठ॑ति दुष्कृ॒ताय॒ चर॑काचार्यं पा॒प्मने॑ सैल॒गम्॥१८॥
स्वर सहित पद पाठअ॒क्ष॒रा॒जायेत्य॑क्षऽरा॒जाय॑। कि॒त॒वम्। कृ॒ताय॑। आ॒दि॒न॒व॒द॒र्शमित्या॑दिनवऽद॒र्शम्। त्रैता॑यै। क॒ल्पिन॑म्। द्वा॒परा॑य। अ॒धि॒क॒ल्पिन॒मित्य॑धिऽक॒ल्पिन॑म्। आ॒स्क॒न्दायेत्या॑ऽस्क॒न्दाय॑। स॒भा॒स्था॒णुमिति॑ सभाऽस्था॒णुम्। मृ॒त्यवे॑। गो॒व्य॒च्छमिति॑ गोऽव्य॒च्छम्। अन्त॑काय। गो॒घा॒तमिति॑ गोऽघा॒तम्। क्षु॒धे। यः। गाम्। वि॒कृ॒न्तन्त॒मिति॑ विऽकृ॒न्तन्त॑म्। भिक्ष॑माणः। उ॒प॒तिष्ठ॒तीत्यु॑प॒ऽतिष्ठ॑ति। दु॒ष्कृ॒ताय॑। दुः॒कृ॒तायेति॑ दुःऽकृ॒ताय॑। चर॑काचार्य्य॒मिति॒ चर॑कऽआचार्य्यम्। पा॒प्मने॑। सै॒ल॒गम् ॥१८ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अक्षराजाय कितवङ्कृतायादिनवदर्शन्त्रेतायै कल्पिनन्द्वापरायाधिकल्पिनमास्कन्दाय सभास्थाणुम्मृत्यवे गोव्यच्छमन्तकाय गोघातङ्क्षुधे यो गाँविकृन्तन्तम्भिक्षमाणऽउपतिष्ठति दुष्कृताय चरकाचार्यं पाप्मने सैलगम् ॥
स्वर रहित पद पाठ
अक्षराजायेत्यक्षऽराजाय। कितवम्। कृताय। आदिनवदर्शमित्यादिनवऽदर्शम्। त्रैतायै। कल्पिनम्। द्वापराय। अधिकपिल्पनमित्यधिऽकल्पिनम्। आस्कन्दायेत्याऽस्कन्दाय। सभास्थाणुमिति सभाऽस्थाणुम्। मृत्यवे। गोव्यच्छमिति गोऽव्यच्छम्। अन्तकाय। गोघातमिति गोऽघातम्। क्षुधे। यः। गाम्। विकृन्तन्तमिति विऽकृन्तन्तम्। भिक्षमाणः। उपतिष्ठतीत्युपऽतिष्ठति। दुष्कृताय। दुःकृतायेति दुःऽकृताय। चरकाचार्य्यमिति चरकऽआचार्य्यम्। पाप्मने। सैलगम्॥१८॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे जगदीश्वर वा राजन्! त्वमक्षराजाय कितवं मृत्यवे गोव्यच्छमन्तकाय गोघातं क्षुधे यो गां छिनत्ति तं विकृन्तन्तं यो भिक्षमाण उपतिष्ठति दुष्कृताय तं चरकाचार्य्यं पाप्मने सैलगं परासुव। कृतायाऽऽदिनवदर्शं त्रैतायै कल्पिनं द्वापरायाऽधिकल्पिनमास्कन्दाय सभास्थाणुमासुव॥१८॥
पदार्थः
(अक्षराजाय) येऽक्षैः क्रीडन्ति तेषां राजा तस्मै हितम् (कितवम्) द्यूतकारिणम् (कृताय) (आदिनवदर्शम्) य आदौ नवान् पश्यति तम् (त्रेतायै) त्रयाणां भवाय (कल्पिनम्) कल्पः प्रशस्तं सामर्थ्यं विद्यते यस्य तम् (द्वापराय) द्वावपरौ यस्मिन् तस्मै (अधिकल्पिनम्) अधिगतसामर्थ्ययुक्तम् (आस्कन्दाय) समन्ताच्छोषणाय (सभास्थाणुम्) सभायां स्थितम् (मृत्यवे) मारणाय (गोव्यच्छम्) गोषु विचेष्टितारम् (अन्तकाय) नाशाय (गोघातम्) गवां घातकम् (क्षुधे) (यः) (गाम्) धेनुम् (विकृन्तन्तम्) विच्छेदयन्तम् (भिक्षमाणः) (उपतिष्ठति) (दुष्कृताय) दुष्टाचाराय प्रवृत्तम् (चरकाचार्यम्) चरकाणां भक्षकाणामाचार्य्यम् (पाप्मने) पापात्मने हितम् (सैलगम्) सीलाङ्गस्य दुष्टस्यापत्यं सैलगम्॥१८॥
भावार्थः
ये ज्योतिर्विदादिसत्याचरणान् सत्कुर्वन्ति, दुष्टाचारान् गोघ्नादीन् ताडयन्ति, तेराज्यं कर्त्तुं शक्नुवन्ति॥१८॥
हिन्दी (1)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे जगदीश्वर वा राजन्! आप (अक्षराजाय) पासों से खेलने वालों के प्रधान के हितकारी (कितवम्) जुआ करने वाले को (मृत्यवे) मारने के अर्थ (गोव्यच्छम्) गौओं में बुरी चेष्टा करने वाले को (अन्तकाय) नाश के अर्थ (गोघातम्) गौओं के मारने वाले को (क्षुधे) क्षुधा के लिए (यः) जो (गाम्) गौ को मारता उस (विकृन्तन्तम्) काटते हुए को जो (भिक्षमाणाः) भीख मांगता हुआ (उपतिष्ठति) उपस्थित होता है (दुष्कृताय) दुष्ट आचरण के लिए प्रवृत्त हुए उस (चरकाचार्य्यम्) भक्षण करने वालों के गुरु को (पाप्मने) पापी के हितकारी (सैलगम्) दुष्ट के पुत्र को दूर कीजिए (कृताय) किये हुए के अर्थ (आदिनवदर्शम्) आदि में नवीनों को देखने वाले को (त्रेतायै) तीन के होने के अर्थ (कल्पिनम्) प्रशंसित सामर्थ्य वाले को (द्वापराय) दो जिस के इधर सम्बन्धी हों, उस के अर्थ (अधिकल्पिनम्) अधिकतर सामर्थ्ययुक्त को और (आस्कन्दाय) अच्छे प्रकार सुखाने के अर्थ (सभास्थाणुम्) सभा में स्थिर होने वाले को प्रकट वा उत्पन्न कीजिए॥१८॥
भावार्थ
जो मनुष्य ज्योतिषी आदि सत्याचारियों का सत्कार करते और दुष्टाचारी गोहत्यारे आदि को ताड़ना देते हैं, वे राज्य करने को समर्थ होते हैं॥१८॥
मराठी (1)
भावार्थ
जी माणसे ज्योतिषी वगैरे सत्याचे आचरण करणाऱ्या लोकांचा सन्मान करतात व दुष्टाचरणी गोहत्या वगैरे करणाऱ्यांची ताडना करतात ते राज्य करण्यास समर्थ ठरतात.
English (2)
Meaning
O God drive away a gambler, friend of the dice-king ; a person with evil designs for murdering cows ; a cow-killer for gallows , one who for hunger goes begging to a man who is cutting up a cow ; a leader of meat eaters bent on misdeed ; the son of a depraved person, befriending a sinner. O God create a wise person who soon realizes the shortcomings in the acts performed ; a person who is fit in childhood, youth and old age ; one endowed with capability for this world and the next ; a leader of the Assembly for drying up the resources of the enemy.
Meaning
Remove the gambler playing for his den-master, the tormenter of the cow to death, the butcher who slaughters the cow, the man who impairs the cow to satisfy hunger, the man who approaches the beef carver asking for food, the beggar serving his master of the den, and the robber out for sin and crime. Give us the man of original vision for the age of truth (Krita-yuga), the man of imagination for the age of thought and resolution (Treta-yuga), the man of imagination and resolution for the age of thought and passion (Dvapara-yuga), and the man-pillar of the council for speedy progress and development.
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Dhiman
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal