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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 11 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 11/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - पूषादयो मन्त्रोक्ताः छन्दः - पङ्क्तिः सूक्तम् - नारीसुखप्रसूति सूक्त
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    वष॑ट्ते पूषन्न॒स्मिन्त्सूता॑वर्य॒मा होता॑ कृणोतु वे॒धाः। सिस्र॑तां॒ नार्यृ॒तप्र॑जाता॒ वि पर्वा॑णि जिहतां सूत॒वा उ॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वष॑ट् । ते॒ । पू॒ष॒न् । अ॒स्मिन् । सूतौ॑ । अ॒र्य॒मा । होता॑ । कृ॒णो॒तु॒ । वे॒धा: । सिस्र॑ताम् । नारी॑ । ऋ॒तऽप्र॑जाता । वि । पर्वा॑णि । जि॒ह॒ता॒म् । सूत॒वै । ऊं इति॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वषट्ते पूषन्नस्मिन्त्सूतावर्यमा होता कृणोतु वेधाः। सिस्रतां नार्यृतप्रजाता वि पर्वाणि जिहतां सूतवा उ ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वषट् । ते । पूषन् । अस्मिन् । सूतौ । अर्यमा । होता । कृणोतु । वेधा: । सिस्रताम् । नारी । ऋतऽप्रजाता । वि । पर्वाणि । जिहताम् । सूतवै । ऊं इति ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 11; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (पूषन्) हे सर्वपोषक, परमेश्वर ! (ते) तेरे लिये (वषट्) यह आहुति [भक्ति] है। (अस्मिन्) इस समय पर (सूतौ) सन्तान के जन्म को (अर्यमा) न्यायकारी, (होता) दाता, (वेधाः) सबका रचनेवाला ईश्वर (कृणोतु) करे। (ऋतप्रजाता) पूरे गर्भवाली (नारी) नर का हित करनेहारी स्त्री (सिस्रताम्) सावधान रहे, (पर्वाणि) इस के सब अङ्ग (उ) भी (सूतवै) सन्तान उत्पन्न करने के लिये (विजिहताम्) कोमल हो जावें ॥१॥

    भावार्थ - प्रसव का समय होने पर पति आदि विद्वान् लोग परमेश्वर की भक्ति के साथ हवनादि कर्म प्रसूता स्त्री की प्रसन्नता के लिये करें और वह स्त्री सावधान होकर श्वास-प्रश्वास आदि द्वारा अपने अङ्गों को कोमल रक्खे, जिससे बालक सुखपूर्वक उत्पन्न होवे ॥१॥ टिप्पणी−इस सूक्त में माता से सन्तान उत्पन्न होने का उदाहरण देकर बताया गया है कि मनुष्य सृष्टि विद्या के ज्ञान से ईश्वर की अनन्त महिमा का विचार करके परस्पर उपकारी बनें ॥


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    Meaning -
    O Pusha, spirit of life’s procreation, for the expectant mother, may every thing be good and auspicious in this child birth. May Aryama, creative law of nature, hota, the father, Vedha, the specialist physician, all be good and helpful and auspicious. May the mother give birth to the baby comfortably. May she relax all over her body system.


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