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॥ओ३म्॥

अथ यजुर्वेदभाष्यारम्भः क्रियते॥
यो जीवेषु दधाति सर्वसुकृतज्ञानं गुणैरीश्वरः
तं नत्वा क्रियते परोपकृतये सद्यः सुबोधाय च॥
ऋग्वेदस्य विधाय वै गुणगुणिज्ञानप्रदातुर्वरम्
भाष्यं काम्यमथो क्रियामययजुर्वेदस्य भाष्यं मया॥१॥
चतुस्त्र्यङ्कैरङ्कैरवनिसहितैर्विक्रमसरे
शुभे पौषे मासे सितदलभविश्वोन्मिततिथौ।
गुरोर्वारे प्रातः प्रतिपदमतीष्टं सुविदुषां
प्रमाणैर्निर्बद्धं शतपथनिरुक्तादिभिरपि॥२॥

ओ३म् विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव। यद्भ॒द्रं तन्न॒ऽआ सु॑व॥ यजु॰३०.३॥

ईश्वरेण जीवानां गुणगुणिविज्ञानोपदेशाय ह्यृग्वेदे सर्वान् पदार्थान् व्याख्यायेदानीं मनुष्यैस्तेभ्यो यथायथोपकारग्रहणाय क्रियाः कथं कर्त्तव्या इत्युपदिश्यते। तत्र यद्यदङ्गं यद्यत्साधनं चापेक्षितं तत्तदत्र यजुर्वेदे प्रकाश्यते। कुतः? यावत् क्रियानिष्ठं ज्ञानं न भवति नैव तावच्छ्रेष्ठं सुखं कदाचिज्जायते। विज्ञानस्य क्रियाहेतुत्वप्रकाशकारकत्वाविद्या-निवर्त्तकत्वाधर्माप्रवर्त्तकत्वैर्धर्मपुरुषार्थयोः संयोजकत्वात्। यद्यत्कर्म विज्ञाननिमित्तं भवति तत्तत्सुखजनकं संपद्यते। तस्मान्मनुष्यैर्विज्ञानपुरःसरमेव कर्मानुष्ठानं नित्यं कर्त्तव्यम्। कुतः? जीवस्य चेतनत्वादकर्मतया स्थातुमशक्यत्वात्। नैव कश्चिदात्ममनःप्राणेन्द्रियचालनेन विना क्षणमपि स्थातुमर्हति। यजुर्भिर्यजन्तीत्युक्तप्रामाण्यात्। येन मनुष्या ईश्वरं धार्मिकान् विदुषश्च पूजयन्ति सर्वचेष्टासाङ्गत्यं शिल्पविद्यासङ्गतिकरणं शुभविद्यागुणदानं यथायोग्यतया सर्वोपकारे शुभे व्यवहारे विद्वत्सु च द्रव्यादिव्ययं कुर्वन्ति तद्यजुः; अन्यत्सर्वं भूमिकायां प्रकाशितं तत्र द्रष्टव्यम्। सा भूमिका चतुर्णां वेदानामेकैव वर्त्तते॥
अस्मिन् यजुर्वेदे चत्वारिंशदध्यायाः सन्ति तत्रैकैकस्मिन्नध्याये मन्त्राः संख्यायन्ते॥
चत्वारिंशदध्यायस्थाः सर्वे मन्त्रा एतावन्तः १९७५(!) एकोनविंशतिः शतानि पञ्चसप्ततिश्च सन्ति॥

भाषार्थः—    
अब यजुर्वेद के भाष्य का आरम्भ किया जाता है॥
जो निर्गुण गुणपुञ्ज से देत सुकृत विज्ञान।
प्रणतपाल जगदीश्वरहि करि प्रणाम तिहि ध्यान॥१॥
ज्ञानदायि ऋग्वेद का भाष्याभीष्ट विधाय।
पर-उपकार विचारि करि शीघ्र सुबोध निधाय॥२॥
शतपथ ब्राह्मण आदि पुनि निघण्टु निरुक्त निहारि।
यजुर्वेद जो क्रियापर वर्नौ ताहि विचारि॥३॥
एक सहस्र नवशत अधिक विक्रमसर चौंतीस।
पौष शुक्ल तेरसि तिथि दिन अधीश वागीश॥४॥
विक्रम के संवत् १९३४ पौष सुदि १३ गुरुवार के दिन यजुर्वेद के भाष्य बनाने का आरम्भ किया जाता है। (विश्वानि॰) इस मन्त्र का अर्थ भूमिका में कर दिया है।
ईश्वर ने ऋग्वेद में गुण और गुणी के विज्ञान के प्रकाश के द्वारा सब पदार्थ प्रसिद्ध किये हैं, उन मनुष्यों को पदार्थों से जिस-जिस प्रकार यथायोग्य उपकार लेने के लिये क्रिया करनी चाहिये तथा उस क्रिया के जो-जो अङ्ग वा साधन हैं, सो-सो यजुर्वेद में प्रकाशित किये हैं, क्योंकि जबतक क्रिया करने का दृढ़ ज्ञान न हो, तब तक उस ज्ञान से श्रेष्ठ सुख कभी नहीं हो सकता और विज्ञान होने के ये हेतु हैं कि जो क्रिया [और] प्रकाश, अविद्या की निवृत्ति, अधर्म में अप्रवृत्ति तथा धर्म और पुरुषार्थ का संयोग करना है। जो कर्मकांड है, सो विज्ञान का निमित्त और जो विज्ञानकांड है, सो क्रिया से फल देने वाला होता है। कोई जीव ऐसा नहीं है कि जो मन, प्राण, वायु, इन्द्रिय और शरीर के चलाये बिना एक क्षण भर भी रह सके, क्योंकि जीव अल्पज्ञ एकदेशवर्त्ती चेतन है। इसलिये जो ईश्वर ने ऋग्वेद के मन्त्रों से सब पदार्थों के गुणगुणी का ज्ञान और यजुर्वेद के मन्त्रों से सब क्रिया करनी प्रसिद्ध की है, क्योंकि (ऋक्) और (यजुः) इन शब्दों का अर्थ भी यही है कि जिससे मनुष्य लोग ईश्वर से लेके पृथिवीपर्यन्त पदार्थों के ज्ञान से धार्मिक विद्वानों का संग, सब शिल्पक्रिया सहित विद्याओं की सिद्धि, श्रेष्ठ विद्या, श्रेष्ठ गुण वा विद्या का दान, यथायोग्य उक्त विद्या के व्यवहार से सर्वोपकार के अनुकूल द्रव्यादि पदार्थों का खर्च करें, इसलिये इसका नाम यजुर्वेद है। और भी इन शब्दों का अभिप्राय भूमिका में प्रकट कर दिया है, वहां देख लेना चाहिये, क्योंकि उक्त भूमिका चारों वेद की एक ही है॥
इस यजुर्वेद में सब चालीस अध्याय हैं, उन एक-एक अध्याय में कितने-कितने मन्त्र हैं, सो पूर्व संस्कृत में कोष्ठ बनाके सब लिख दिया है और चालीसों अध्याय के सब मिलके १९७५(!) (उन्नीस्सौ पचहत्तर) मन्त्र हैं॥

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