अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 14 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 14/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - भृग्वङ्गिराः देवता - वरुणो अथवा यमः छन्दः - ककुम्मत्यनुष्टुप् सूक्तम् - कुलपाकन्या सूक्त
    पदार्थ -

    (अस्याः) इस [वधू] से (भगम्) [अपने] ऐश्वर्य को और (वर्चः) तेज को (आ अदिषि) मैंने माना है, (इव) जैसे (वृक्षात् अधि) वृक्ष से (स्रजम्) फूलों की माला को। (महाबुध्नः) विशाल जड़वाले (पर्वतः इव) पर्वत के समान [यह वधू] (पितृषु) [मेरे] माता-पिता आदि बान्धवों में (ज्योक्) बहुत काल तक (आस्ताम्) रहे ॥१॥

    भावार्थ -

    यह वर का वचन है। विद्वान् पुरुष खोज कर अपने समान गुणवती स्त्री से विवाह करके संसार में ऐश्वर्य और शोभा पाता है, जैसे वृक्ष के सुन्दर फूलों से शोभा होती है। वधू अपने सास ससुर आदि माननीयों की सेवा और शिक्षा से दृढ़चित्त होकर घर के कामों का सुप्रबन्ध करके गृहलक्ष्मी की पक्की नेव जमावे और पति पुत्र आदि कुटुम्बियों में बड़ी आयु भोग कर आनन्द करे ॥१॥

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