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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 18 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 18/ मन्त्र 1
    ऋषि: - द्रविणोदाः देवता - विनायकः छन्दः - उपरिष्टाद्विराड्बृहती सूक्तम् - अलक्ष्मीनाशन सूक्त
    12

    निर्ल॒क्ष्म्यं॑ लला॒म्यं॑१ निररा॑तिं सुवामसि। अथ॒ या भ॒द्रा तानि॑ नः प्र॒जाया॒ अरा॑तिं नयामसि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ‍नि: । ल॒क्ष्म्यम् । ल॒ला॒म्यम् । नि: । अरा॑तिम् । सु॒वा॒म॒सि॒ ।अथ॑ । या । भ॒द्रा । तानि॑ । न॒: । प्र॒ऽजायै॑ । अरा॑तिम् । न॒या॒म॒सि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    निर्लक्ष्म्यं ललाम्यं१ निररातिं सुवामसि। अथ या भद्रा तानि नः प्रजाया अरातिं नयामसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ‍नि: । लक्ष्म्यम् । ललाम्यम् । नि: । अरातिम् । सुवामसि ।अथ । या । भद्रा । तानि । न: । प्रऽजायै । अरातिम् । नयामसि ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 18; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (ललाम्यम्=०-मीम्) [धर्म से] रुचि हटानेवाली (निर्लक्ष्म्यम्=०-क्ष्मीम्) अलक्ष्मी [निर्धनता] और (अरातिम्) शत्रुता को (निः सुवामसि=०-मः) हम निकाल देवें। (अथ) और (या=यानि) जो (भद्रा=भद्राणि) मङ्गल हैं (तानि) उनको (नः) अपनी (प्रजायै) प्रजा के लिये (अरातिम्) सुख न देनेहारे शत्रु से (नयामसि=०-मः) हम लावें ॥१॥

    भावार्थ - राजा अपने और प्रजा की निर्धनता आदि दुर्लक्षणों को मिटावे और शत्रु को दण्ड देकर प्रजा में आनन्द फैलावे ॥१॥ सायणभाष्य में (लक्ष्म्यम्) के स्थान में [लक्ष्यम्] पाठ है ॥१॥


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    Meaning -
    We uproot poverty, wantonness, malignity and adversity, and we procure all those things which are good for our children and future generations. Thus do we plan and manage our prosperity against adversity.


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