अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 19 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 19/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - ईश्वरः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनिवारण सूक्त

    मा नो॑ विदन्विव्या॒धिनो॒ मो अ॑भिव्या॒धिनो॑ विदन्। आ॒राच्छ॑र॒व्या॑ अ॒स्मद्विषू॑चीरिन्द्र पातय ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मा । न॒: । वि॒द॒न् । वि॒ऽव्या॒धिन॑: । मो इति॑ । अ॒भि॒ऽव्या॒धिन॑: । वि॒द॒न् ।आ॒रात् । श॒र॒व्या: । अ॒स्मत् । विषू॑ची: । इ॒न्द्र॒ । पा॒त॒य॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मा नो विदन्विव्याधिनो मो अभिव्याधिनो विदन्। आराच्छरव्या अस्मद्विषूचीरिन्द्र पातय ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मा । न: । विदन् । विऽव्याधिन: । मो इति । अभिऽव्याधिन: । विदन् ।आरात् । शरव्या: । अस्मत् । विषूची: । इन्द्र । पातय ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 19; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (विव्याधिनः) अत्यन्त वेधनेहारे शत्रु (नः) हम तक (मा विदन्) न पहुँचें और (अभिव्याधिनः) चारों ओर से मारनेहारे (मो विदन्) कभी न पहुँचें। (इन्द्र) हे परम ऐश्वर्यवाले राजन् (विषूचीः) सब ओर फैले हुए (शरव्याः) बाणसमूहों को (अस्मत्) हमसे (आरात्) दूर (पातय) गिरा ॥१॥

    भावार्थ -
    सर्वरक्षक जगदीश्वर पर पूर्ण श्रद्धा करके चतुर सेनापति अपनी सेना को रणक्षेत्र में इस प्रकार खड़ा करे, कि शत्रु लोग पास न आ सकें और न उनके अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार किसी के लगें ॥१॥

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