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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 2/ मन्त्र 3
    ऋषि: - अथर्वा देवता - चन्द्रमा और पर्जन्य छन्दः - त्रिपदा विराड् गायत्री सूक्तम् - रोग उपशमन सूक्त
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    वृ॒क्षं यद्गावः॑ परिषस्वजा॒ना अ॑नुस्फु॒रं श॒रमर्च॑न्त्यृ॒भुम्। शरु॑म॒स्मद्या॑वय दि॒द्युमि॑न्द्र ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वृ॒क्षम् । यत् । गावः॑ । प॒रि॒ऽस॒ख॒जा॒नाः । अ॒नु॒ऽस्फु॒रम् । श॒रम् । अर्च॑न्ति । ॠ॒भुम् । शरु॑म् । अ॒स्मत् । य॒व॒य॒ । दि॒द्युम् । इ॒न्द्र॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वृक्षं यद्गावः परिषस्वजाना अनुस्फुरं शरमर्चन्त्यृभुम्। शरुमस्मद्यावय दिद्युमिन्द्र ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वृक्षम् । यत् । गावः । परिऽसखजानाः । अनुऽस्फुरम् । शरम् । अर्चन्ति । ॠभुम् । शरुम् । अस्मत् । यवय । दिद्युम् । इन्द्र ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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    पदार्थ -
    (यत्) जब (वृक्षम्) धनुष से (परि-सस्वजानाः) लिपटी हुयी (गावः) चिल्ले की डोरियाँ (अनुस्फुरम्) फुरती करते हुए (ऋभुम्) विस्तीर्ण ज्योतिवाले अथवा सत्य से प्रकाशमान वा वर्त्तमान, बड़े बुद्धिमान् (शरम्) बाणधारी शूरपुरुष की (अर्चन्ति) स्तुति करें। [तब] (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर ! [वा हे वायु !] (शरुम्) वाण और (दिद्युम्) वज्र को (अस्मत्) हमसे (यावय) तू अलग रख ॥३॥

    भावार्थ - जब दोनों ओर से (आध्यात्मिक वा आधिभौतिक) घोर संग्राम होता हो, बुद्धिमान् चतुर सेनापति ऐसा साहस करे कि सब योद्धा लोग उस की बड़ाई करें और वह परमेश्वर का सहारा लेकर और अपने प्राण वायु को साधकर शत्रुओं को निरुत्साह कर दे और जय प्राप्त करके आनन्द भोगे ॥३॥ निरुक्त अध्याय २, खण्ड ६ और ५ के अनुसार (वृक्ष) का अर्थ [धनुष] इस लिये है कि उससे शत्रु छेदा जाता है और (गौ) का नाम चिल्ला इसलिये है कि उससे वाणों को चलाते हैं ॥


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    Meaning -
    When the bow strings of the warriors, strung by the ends of the bow at optimum tension, shoot the sharp and deadly whizzing arrows, then, O mighty warrior, O commander, O Indra, intercept and throw off the enemy’s missiles far from us.


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