अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 20 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 20/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - सोमो मरुद्गणः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनिवारण सूक्त

    अदा॑रसृद्भवतु देव सोमा॒स्मिन्य॒ज्ञे म॑रुतो मृ॒डता॑ नः। मा नो॑ विददभि॒भा मो अश॑स्ति॒र्मा नो॑ विदद्वृजि॒ना द्वेष्या॒ या ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अदा॑रऽसृत् । भ॒व॒तु॒ । दे॒व॒ । सो॒म॒ । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे । म॒रु॒त॒: । मृ॒डत॑ । न॒: । मा । न॒: । वि॒द॒त् । अ॒भि॒ऽभा: । मो इति॑ । अश॑स्ति: । मा । न॒: । वि॒द॒त् । वृ॒जि॒ना । द्वेष्या॑ । या ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अदारसृद्भवतु देव सोमास्मिन्यज्ञे मरुतो मृडता नः। मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मा नो विदद्वृजिना द्वेष्या या ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अदारऽसृत् । भवतु । देव । सोम । अस्मिन् । यज्ञे । मरुत: । मृडत । न: । मा । न: । विदत् । अभिऽभा: । मो इति । अशस्ति: । मा । न: । विदत् । वृजिना । द्वेष्या । या ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 20; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (देव) हे प्रकाशमय, (सोम) उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर ! [वह शत्रु] (अदारसृत्) डर का न पहुँचानेवाला अथवा अपने स्त्री आदि के पास न पहुँचनेवाला (भवतु) होवे, (मरुतः) हे [शत्रुओं के] मारनेवाले देवताओं ! (अस्मिन्) इस (यज्ञे) पूजनीय काम में (नः) हम पर (मृडत) अनुग्रह करो। (अभिभाः) सन्मुख चमकती हुई, आपत्ति (नः) हम पर (मा विदत्) न आ पड़े और (मो=माउ) न कभी (अशस्तिः) अपकीर्ति और (या) जो (द्वेष्या) द्वेषयुक्त (वृजिना) पापबुद्धि है [वह भी] (नः) हम पर (मा विदत्) न आ पड़े ॥१॥

    भावार्थ -
    सब मनुष्य परमेश्वर के सहाय से शत्रुओं को निर्बल कर दें अथवा घरवालों से अलग रक्खें और विद्वान् शूरवीरों से भी सम्मति लेवें, जिससे प्रत्येक विपत्ति, अपकीर्त्ति और कुमति हट जाय और निर्विघ्न अभीष्ट सिद्ध होवे ॥१॥ मरुत् देवताओं के बिजुली आदि के विमान हैं, इस पर वैज्ञानिकों को विशेष ध्यान देना चाहिये−ऋग्वेद १।८८।१। में वर्णन है ॥ आ वि॒द्युन्म॑द्भिर्मरुतः स्व॒र्कैः रथे॑भिर्यात ऋष्टि॒मद्भि॒रश्व॑पर्णैः। आवर्षि॑ष्ठया न इ॒षा वयो न प॑प्तता सुमायाः ॥१॥ (मरुतः) हे शूर महात्माओ ! (विद्युन्मद्भिः) बिजुलीवाले, (स्वर्कैः) अच्छी ज्वालावाले [वा अच्छे विचारों से बनाये गये] (ऋष्टिमद्भिः) दो-धारा तलवारोंवाले [आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे चलाने की कलाओंवाले] (रथेभिः) रथों से (आयात) तुम आओ और (सुमायाः) हे उत्तम बुद्धिवाले ! (नः) हमारे लिये (वर्षिष्ठया) अति उत्तम (इषा) अन्न के साथ (वयो न) पक्षियों के समान (आपप्तत) उड़ कर चले आओ ॥

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