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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 20 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 20/ मन्त्र 4
    ऋषि: - अथर्वा देवता - इन्द्रः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनिवारण सूक्त
    30

    शा॒स इ॒त्था म॒हाँ अ॑स्यमित्रसा॒हो अ॑स्तृ॒तः। न यस्य॑ ह॒न्यते॒ सखा॒ न जी॒यते॑ क॒दा च॒न ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    शा॒स: । इ॒त्था । म॒हान् । अ॒सि॒ । अ॒मि॒त्र॒ऽस॒ह: । अ॒स्तृ॒त: ।न । यस्य॑ । ह॒न्यते॑ । सखा॑ । न । जी॒यते॑ । क॒दा । च॒न ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    शास इत्था महाँ अस्यमित्रसाहो अस्तृतः। न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदा चन ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    शास: । इत्था । महान् । असि । अमित्रऽसह: । अस्तृत: ।न । यस्य । हन्यते । सखा । न । जीयते । कदा । चन ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 20; मन्त्र » 4
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    पदार्थ -
    (इत्था) सत्य-सत्य (महान्) बड़ा (शासः) शासनकर्ता (अमित्रसाः) शत्रुओं को हरानेहारा और (अस्तृतः) कभी न हारनेहारा (असि) तू है। (यस्य) जिसका (सखा) मित्र (कदा चन) कभी भी (न)(हन्यते) मारा जाता है और (न)(जीयते) जीता जाता है ॥४॥

    भावार्थ - वह परमात्मा (वरुण) सर्वशक्तिमान् शत्रुनाशक है, इस प्रकार श्रद्धा करके जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक, आत्मिक, शारीरिक और सामाजिक बल बढ़ाते रहते हैं, वे ईश्वर के भक्त दृढ़विश्वासी अपने शत्रुओं पर सदा जय प्राप्त करते हैं ॥४॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋ० १०।१५२।१ में है ॥


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    Meaning -
    Indra, ruler supreme, you are so great, destroyer of unfriendly powers and assailants, unconquered and inviolable whose friend and ally is never hurt, never defeated, never destroyed.


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