अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 24 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 24/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - आसुरी वनस्पतिः छन्दः - निचृत्पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - श्वेत कुष्ठ नाशन सूक्त
    पदार्थ -

    (सुपर्णः) उत्तम रीति से पालन करनेहारा, वा अति पूर्ण परमेश्वर (प्रथमः) सबका आदि (जातः) प्रसिद्ध है। (तस्य) उस [परमेश्वर] के (पित्तम्) पित्त [बल] को, [हे औषधि !] (त्वम्) तूने (आसिथ) पाया था। (तत्) तब (युधा) संग्राम से (जिता) जीती हुयी (आसुरी) असुर [प्रकाशमय परमेश्वर] की माया [प्रज्ञा वा बुद्धि] ने (वनस्पतीन्) सेवा करनेवालों के रक्षा करनेहारे वृक्षों को (रूपम्) रूप (चक्रे) किया था ॥१॥

    भावार्थ -

    सृष्टि से पहिले वर्त्तमान परमेश्वर की नित्य शक्ति से ओषधि-अन्न आदि में पोषणसामर्थ्य रहता है। वह (आसुरी) परमेश्वर की शक्ति (युधा जिता) युद्ध अर्थात् प्रलय के अन्धकार के उपरान्त प्रकाशित होती है, जैसे अन्न और घास-पात आदि का बीज शीत और ग्रीष्म ऋतुओं में भूमि के भीतर पड़ा रहता और वृष्टि का जल पाकर हरा हो जाता है ॥१॥

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