अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 26 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 26/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - देवा छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सुख प्राप्ति सूक्त

    आ॒रे॑३ ऽसा॑व॒स्मद॑स्तु हे॒तिर्दे॑वासो असत्। आ॒रे अश्मा॒ यमस्य॑थ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ॒रे । अ॒सौ । अ॒स्मत् । अ॒स्तु । हे॒ति: । दे॒वा॒स॒: । अ॒स॒त् । आ॒रे । अश्मा॑ । यम् । अस्य॑थ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आरे३ ऽसावस्मदस्तु हेतिर्देवासो असत्। आरे अश्मा यमस्यथ ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आरे । असौ । अस्मत् । अस्तु । हेति: । देवास: । असत् । आरे । अश्मा । यम् । अस्यथ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 26; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (देवासः) हे विजयी शूरवीरो ! (असौ) वह (हेतिः) साँग वा बरछी (अस्मत्) हमसे (आरे) दूर (अस्तु) रहे और (अश्मा) वह पत्थर (आरे) दूर (असत्) रहे (यम्) जिसे (अस्यथ) तुम फैंकते हो ॥१॥

    भावार्थ -
    युद्धकुशल सेनापति लोग चक्रव्यूह, पद्मव्यूह, मकरव्यूह, क्रौञ्चव्यूह, सूचीव्यूह आदि से अपनी सेना का विन्यास इस प्रकार करें कि शत्रु के अस्त्र-शस्त्र का प्रहार अपने प्रजा और सेना को न लगैं और न अपने अस्त्र-शस्त्र उलट कर अपने ही लगैं, किन्तु शत्रुओं का विध्वंस करैं ॥१॥

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