अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 28 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 28/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - चातनः देवता - अग्निः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - रक्षोघ्न सूक्त
    पदार्थ -

    (रक्षोहा) राक्षसों का मार डालनेवाला (अमीवचातनः) दुःख मिटानेवाला (देवः) विजयी (अग्निः) अग्निरूप सेनापति (द्वयाविनः) दुमुखे कपटी, (यातुधानान्) पीडा देनेवाले (किमीदिनः) यह क्या है यह क्या है, ऐसा करनेवाले छली सूचकों वा लंपटों को (अप दहन्) मिटाकर भस्म करता हुआ (उप) हमारे समीप (प्र-अगात्) आ पहुँचा है ॥१॥

    भावार्थ -

    जब सेनापति अग्निरूप होकर शतघ्नी [तोप] भुशुण्डी [बन्दूक] धनुष् बाण तरवारि आदि अस्त्र-शस्त्रों से शत्रुओं का नाश करता है, तब राज्य में शान्ति रहती है ॥१॥

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